•  दिनकर शर्मा
    •  20 February 2020
    •  1776

    पैरासाइट: असरदार कहानी, अनूठा अन्दाज़

    ऑस्कर में धूम मचाने वाली दक्षिण कोरियाई फ़िल्म पर एक नज़र

    इस साल 9 फ़रवरी को 92वें ऑस्कर पुरस्कारों में एक नया इतिहास लिखा गया है। पहली बार एक ग़ैर-अंग्रेज़ी फ़िल्म को ‘सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म’ का शिखर सम्मान मिला है। जीती है दक्षिण कोरियाई फ़िल्म ‘पैरासाइट’ (2019) जिसे एक नहीं बल्कि चार सबसे ख़ास ऑस्कर पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। ‘सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म’, ‘सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म’, ‘सर्वश्रेष्ठ निर्देशक’ और ‘सर्वश्रेष्ठ स्क्रीनप्ले’ के ऑस्कर अवार्ड जीतने वाली इस फ़िल्म के निर्देशक हैं बॉंग जून-हो। इसके पहले उनके द्वारा लिखी और निर्देशित की गयी ‘मेमोरीज़ ऑफ़ मर्डर’ (2003), ‘द होस्ट’ (2006), ‘मदर’ (2009) और ‘ओक्जा’ (2017), जैसी कई फ़िल्में काफ़ी चर्चित रहीं। पैरासाइट का स्क्रीनप्ले बॉंग जून-हो (तस्वीर में बाएँ) ने हान जिन-वॉन (दाएँ) के साथ मिलकर लिखा है, जबकि कहानी जून-हो की ही रही। सबसे पहले यह फ़िल्म मई 2019 में काँस फ़िल्म महोत्सव में दिखायी गयी जहाँ यह समारोह का सबसे बड़ा यानी पैम डॉ (Palme d’Or) पुरस्कार जीतने वाली पहली दक्षिण कोरियाई फ़िल्म बनी। इसके साथ ही पैरासाइट को विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का गोल्डन ग्लोब और सर्वश्रेष्ठ ग़ैर-अंग्रेज़ी फ़िल्म का बाफ़्टा (BAFTA, ब्रिटिश अकैडमी ऑफ़ फ़िल्म एंड टेलेविजन आर्ट्स) पुरस्कार भी मिला।

    समझा जा सकता है कि पैरासाइट ख़ास फ़िल्म है। इस फ़िल्म ने अपनी एक अलग ही लहर पैदा की है। आम दर्शक के मन में एक उत्सुकता जागती है कि आख़िर क्यों ये फ़िल्म इतनी तारीफ़ें बटोर रही है। क्यों इसे मास्टरपीस कहा जा रहा है। यह लेख इस फ़िल्म के सिनेमाई और लेखन के तत्वों को समझने और उनकी ख़ूबियों को पहचानने की एक कोशिश है। मेरी नज़र में पैरासाइट में ऐसा काफ़ी कुछ है जो स्क्रीनराइटिंग और फ़िल्म निर्माण के शिल्प के लिहाज़ से सीखने योग्य है।

     

    *** आगे बढ़ने से पहले ध्यान दें कि इस लेख के कुछ अंश फ़िल्म ‘पैरासाइट’ की कहानी के राज़ खोल सकते हैं और जिन्होंने फ़िल्म नहीं देखी है उनका मज़ा किरकिरा कर सकते हैं। ***

     

    जौन्रे

    सबसे पहले इसी की बात करते हैं। सिनेमा में जौन्रे शब्द का इस्तेमाल फ़िल्म के प्रमुख भाव को परिभाषित करने के लिए किया जाता है, जैसे थ्रिलर, कॉमेडी, ड्रामा, रोमांस वग़ैराह। जौन्रे तय होने से साफ़ हो जाता है कि किस आयु और वर्ग का दर्शक फ़िल्म से किस प्रकार के मनोरंजन की अपेक्षा रख सकता है। अक्सर देखा गया है कि जौन्रे के साथ कुछ प्रयोग करने से नए क़िस्म की कहानियाँ मिलती हैं। गम्भीर विषय पर हास्य फ़िल्म बन सकती है। रोमांटिक-कॉमेडी को पारिवारिक माहौल के बीच भी गढ़ा जा सकता है। इसी तरह पैरासाइट, अलग अलग जौन्रे के बीच समन्वय बनाती है। यह ब्लैक या डार्क कॉमेडी भी है। एक परिवार की कहानी भी। इसमें थ्रिल भी पैदा होता है। जबकि इसका अंत विचलित कर देता है। इसे ट्रैजिकॉमेडी भी कह सकते है और इंटेंस (बेहद संजीदा) ड्रामा भी। लेकिन सीखने वाली बात ये है कि निर्देशक और कथाकार को इन सभी जौन्रे के मूल तत्वों को परदे पर लाने में महारत है। उसे पूरी स्पष्टता से पता है कि कहानी कब क्या कह रही है। जिस सीन में जो भाव हावी है आप उसी के साथ बहते हैं। यह नहीं कि गम्भीर सीन में आप हंस पड़ें। या हास्य की परिस्थिति आपको गम्भीर बना रहने दे। स्क्रीनप्ले में अलग अलग भावों के बीच बेहतरीन जुगलबंदी दिखती है। दूसरी बात ये, और इसी कारण से मैंने जौन्रे की बात छेड़ी कि, जौन्रे के मिश्रण से फ़िल्म प्रिडक्टिबल नहीं होती। आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते कि कहानी किस दिशा में आगे बढ़ेगी। इसके उलट, अगर फ़िल्मकार पूरी तरह से जौन्रे के सैट पैटर्न को समर्पित हो जाए और प्रयोग ना करे तो फ़िल्म ऊबाऊ हो सकती है, जैसा कई मुख्यधारा की हॉलीवुड फ़िल्मों के साथ होता है। तो इसीलिए जौन्रे के नियम या शिल्प को समझना ज़रूरी हो जाता है ताकि उन्हें अक़्लमंदी से इस्तेमाल किया जा सकते, तोड़ा या बदला जा सके और इस तरह कुछ नया किया जा सके। पैरासाइट इसका एक अच्छा उदाहरण है।

     

    कहानी, किरदार और स्क्रीनप्ले

    एक ग़रीब परिवार के चार सदस्य हैं, युवा भाई-बहिन और उनके माँ-बाप; जो तिकड़मों और झूठ के सहारे एक-एक करके एक अमीर परिवार के घर में नौकरियों पर लग जाते हैं। अमीर परिवार में भी चार सदस्य हैं; अपेक्षाकृत युवा माँ-बाप, किशोरवय बेटी और छोटा-सा बेटा। ग़रीब परिवार के लोग अपने मालिक-मालकिन को नहीं बताते कि वे चारों ख़ुद भी एक ही परिवार हैं, बल्कि उनके सामने एक दूसरे से अनजान बने रहते हैं। यह फ़िल्म का फ़र्स्ट एक्ट है। इसके बाद फ़िल्म में कुछ ऐसे ख़ुलासे होते हैं कि कहानी अलग ही स्तर पर चली जाती है। दुविधाएँ सामने आती है। परिस्थितियाँ गम्भीर होती चली जाती है।

    किरदार मेहनत से रचे गए हैं। सबकी अपनी अपनी ख़ूबियाँ और कमियाँ हैं। ग़रीब परिवार के चारों किरदार, अमीर परिवार के किरदारों के आगे एक गहरे विरोधाभास को दर्शक के सामने लाते हैं। हर किरदार की फ़िल्म के प्लॉट में अपनी अलग अहमियत है। कहानी की ज़रूरत के हिसाब से नए किरदारों की एंट्री होती है। फ़िल्म की कहानी अनोखी तो है ही, रिलेटेबल भी है यानी आम दर्शक फ़िल्म की शुरुआती परिस्थितयों से जुड़ाव महसूस करेगा। अंत तक आते आते वह विकट परिस्थियों को बेहतर समझने लगेगा।

    कहानी का बहाव कमाल है! परत दर परत, प्याज़ के छिलके की तरह चीज़ें उघड़ती हैं और लेखक जो बातें कहना चाह रहा है, उसे ताक़त देती है। स्क्रीनप्ले बेहद किफ़ायती है। हर सीन में कहानी आगे बढ़ती है, या कुछ नया घटित होता है। ‘सैट-अप’ और ‘पे-ऑफ़’ का बढ़िया इस्तेमाल है। मोंटाज का बेहतरीन उपयोग है। संवाद न्यूनतम हैं और सभी फ़िल्म के ड्रामा को गति देते हैं। एक अच्छी बात यह है कि फ़िल्म की मूल बात कहने के लिए कहीं भी ‘स्पीच’ या भाषणबाज़ी का सहारा नहीं लिया गया है। निर्देशक यहाँ सिनेमाई तत्वों से खेल रहा है, और वो भी एक जीनियस खिलाड़ी की तरह! इसके बारे में आगे और बात करते हैं। पहले बात करते हैं फ़िल्म की एक और बड़ी ताक़त की, इसकी थीम या विषयवस्तु।

     

    थीम

    थीम कहानी का वो सब-टैक्स्ट या सबक, या संदेश, होती है जिसे कहने के लिए ही कहानीकार कहानी रचने की पूरी क़वायद करता है। पैरासाइट की सोशल कॉमेंट्री में निर्देशक ने अभिभूत कर दिया है। समीक्षकों को अनेकों भावार्थ दिख रहे हैं। सरल शब्दों में कहूँ तो फ़िल्म अमीर और ग़रीब की बात करती है। अमीरी और ग़रीबी की भी। ग़रीब और, बेहद ग़रीब की भी। एक आधुनिक समाज, जिस पर अमरीकी पूँजीवाद का गहरा प्रभाव है, में आर्थिक विषमतायें किस तरह की परिस्थियाँ पैदा करती हैं; पैरासाइट उसका महत्वपूर्व दस्तावेज़ है। निर्देशक ने सामाजिक यथार्थ को देखने की अपनी इन्साइट यानी अंतर्दृष्टि का लोहा मनवा लिया है। कहानी बताती है कि कैसे ग़रीब और बेहद ग़रीब के बीच में संघर्ष जन्मता है। किस तरह अमीर के लिए ग़रीब को पूरी तरह अपनाना, या उसे अपनी तरह इंसान मान लेना, लगभग असम्भव है। किस तरह रात भर की बरसात ग़रीब का घर डुबो देती है, जबकि अमीर ख़ुश है कि अगले दिन आसमान साफ़-सुथरा और चमकदार है! आर्थिक असमानताओं के सामाजिक ढाँचे में ग़रीब का लालच अपराध है, लेकिन अमीर का लालच एक प्रकार की लाइफ़-स्टाइल है। पैरासाइट यानी परजीवी कौन है? ग़रीब, बेहद ग़रीब या फिर वो अमीर, जिसका घर ग़रीब नौकरों के बिना एक दिन नहीं चल सकता और जो उन्हीं ग़रीब सहायकों के जिस्म की गन्ध को एक सैकिंड भी सहन नहीं कर सकता! ग़रीब आदमी अपनी ज़रूरतों के लिए अमीर पर आश्रित है जबकि अमीर अपने ऐशो-आराम के लिए ग़रीबों के हवा-पानी-आसमान-ख़ून-पसीने पर क़ब्ज़ा किए बैठा है। पूरी फ़िल्म इसकी थीम के अनुरूप समानांतर यथार्थ की परिस्थितियों को यूँ उघाड़ चलती है जैसे किसी ऊँचे महँगे रेस्तराँ के ठीक सामने किसी ने बड़ा सा कूड़ेदान उँडेल दिया हो। इसी उदाहरण से याद आती है पैरासाइट की सबसे बड़ी ख़ासियत, प्रतीकात्मक सिनेमाई भाषा।

     

    पैरासाइट का सिंबॉलिज़्म

    पैरासाइट में निर्देशक पूरी तरह सचेत है कि उसे किस सीन में, कहानी के किस मोड़ क्या कहना है। थीम उसके मन-मस्तिष्क में साफ़ है। और उसके पास कहने को कई सारी बातें हैं। लेकिन कमाल यही है कि वो ये सब कहता कैसे है। जैसा कि ऊपर मैंने कहा, पैरासाइट का लेखक-निर्दशक किसी किरदार के मुँह से भाषण नहीं दिलवाता। बल्कि वो कैमेरा के एंगल, फ़्रेमिंग, मूवमेंट, लोकेशन के लुक, सैट डिज़ाइन, प्रॉप्स इत्यादि के इस्तेमाल से सिनेमाई तरीक़े से अपनी बात कहता है। फ़िल्म प्रतीकों और डीटेलिंग से लबरेज़ है। वाई-फ़ाई की ज़रूरत, पिज्ज़ा के डब्बे, अंग्रेज़ी जानने का महत्व, इंस्टैंट नूडल्स, अमरीकी कैम्पिंग टैंट, उत्तर अमरीकी मूलनिवासियों (रैड इंडियंस) के तौर-तरीक़ों की नक़ल, मोर्स कोड (संदेश के गुप्त पुनर्लेखन की एक पद्धति) जैसी चीज़ें अमरीकी जीवन शैली से प्रभावित भौतिकतावाद को रेखांकित करती हैं। इंसान की कॉकरोच से तुलना और फ़िल्म के सैट्स में ऊँचाई-निचलापन और सीढ़ियों का रचनात्मक इस्तेमाल अमीर-गरीब के बीच की खाई को उभारता है। ग़रीब परिवार का घर सेमी-बेसमेंट में है, यानी आधा ज़मीन के नीचे, आधा ऊपर। यही उनका सामाजिक स्तर भी है। वें इससे ऊपर उठना चाहते हैं। लेकिन क्या वें ऊपर आएँगे या और नीचे भी गिर सकते हैं? पूरे बेसमेंट में, जहाँ सूर्य की रोशनी भी ना पहुँचे? क्यूँकि सूर्य की रोशनी तो सिर्फ़ अमीर आदमी के बग़ीचे में ही आती है। बरसात का पानी भी वहाँ से नीचे की ओर बहता है, ग़रीब के मुहल्ले की तरफ़। एक महत्वपूर्ण दृश्य के बाद जब ग़रीब परिवार के सदस्य छिपते-छिपाते अपने घर लौटते हैं तो सीढ़ी दर सीढ़ी नीचे उतरते चले जाते हैं। ऊँचे पुलों से नीचे उतरती हुई लम्बी सीढ़ियाँ हैं। मानों वें सामाजिक क्रम में अपने नियत स्थान की ओर जा रहे हैं। बारिश भी हो रही है और पानी भी नीचे ही उतर रहा है। ग़रीब परिवार ने जितने झूठ बोले वो भी इस पानी के साथ बह रहे हैं। जीवन की कटु सच्चाई उलटे बहते गटर की तरह उफ़न रही है। थोड़ा है थोड़े की ज़रूरत वाला उनका डेढ़ कमरे का सेमी-बेसमेंट तहस-नहस है। यह पूरा स्वीक्वेंस सिरहन पैदा करता है।
     

    पैरासाइट बारीकी से महसूस किए गए यथार्थ की फ़िल्म है। जिसके शिल्प में मास्टरी का स्तर है। यह साबित करती है कि सिनेमा की कहानियाँ अपने आस-पास देखी गयी जीवन की विषमताओं से निकले, तो बहुत दूर तक जा सकती हैं। बॉंग जून-हो के शब्दों में - “मैं जब से सिनेमा का अध्ययन कर रहा हूँ, तब से मेरे ऊपर (हॉलीवुड निर्देशक मार्टिन स्कॉरसैसी के) एक कथन का गहरा प्रभाव रहा है; दी मोस्ट पर्सनल इज़ द मोस्ट क्रिएटिव।”

       

    दिनकर शर्मा फ़्रीलांस लेखक-निर्देशक हैं। उन्होंने एफ़टीआइआइ (पुणे) से पटकथा लेखन की पढ़ाई की और बाद में, विस्लिंगवुड्स इंटरनैशनल में स्क्रीनराइटिंग फ़ैकल्टी के बतौर कार्य किया। वे एफ़टीआइआइ और डबल्यूडबल्यूआइ पर गैस्ट स्क्रिप्ट-मेंटर तथा एफ़टीआइआइ के शॉर्ट-टर्म स्क्रीनराइटिंग कोर्स में गैस्ट-फ़ैकल्टी भी हैं।