•  सुदीप सोहनी
    •  29 April 2020
    •  1557

    “आर्टिस्ट, आई लाइक आर्टिस्ट, तुमको याद रक्खेंगे गुरु... ”

    जाना इरफ़ान खान का - एक लेखक का सलाम एक अभिनेता को!

    आज एक उदास दिन था। उन सबके लिए जो हिन्दी सिनेमा से प्यार करते हैं। इरफ़ान खान उन सभी लोगों के सपनों के संसार की एक कड़ी थे। वो सभी जो अपने जीवन में कभी न इरफ़ान बन पाते न ही उनसे मिल पाते। मगर उनके यूँ अचानक चले जाने से उनका दुख और उदासी भी बढ़ गए। मैं इन सभी लोगों में से एक हूँ जो कभी इरफ़ान से नहीं मिला। पर उदासी मुझ पर भी तारी है। सुबह से। हम सब कहीं न कहीं ऊर्जा और तरंगों से जुड़े हुए हैं, यह आज फिर महसूस हुआ। अमूमन, दिन की शुरुआत जल्दी हो जाती है और सूरज सर पर चढ़ने को हो तब तक केवल लंच बाक़ी रहता है कि इसके बाद दोपहर से लेकर देर शाम तक कंप्यूटर और मैं ही केवल साथ रहें। पर आज दोपहर तक सुस्ती थी। ‘एक और चाय पी ली जाये तब आगे बढ़ेंगे’ को सोच ही रहा था और अचानक एक न्यूज़ वेबसाइट पर यह खबर दिखी। एक पल को तो विश्वास ही नहीं हुआ। इरफ़ान खान .....! ओह यह क्या ! हालाँकि, उनके अस्पताल में आईसीयू में होने वाली खबर तो पता थी और शायद भीतर-भीतर यह भी मान लिया था कि इरफ़ान नहीं रहेंगे! पर आज ही?....

    और पता नहीं मुझे बहुत दुख के साथ बहुत गुस्सा आने लगा। ऐसा लगा कि एक-एक करके हम सब चले जाएँगे लेकिन हमारे साथ हमारे स्वार्थ, अहं, अवसरवादिता और नकलीपन रह जाएगा। इरफ़ान वो व्यक्ति थे जिनके निभाए किरदारों से हमारे सपने, एक दूसरी दुनिया के सपने बनते थे। वो आदमी चला गया और हमारे भीतर क्या कुछ नहीं बदलेगा? क्या हमारे भीतर कुछ बदलना नहीं चाहिए? बस इसी सवाल ने मुझे भीतर से हिला दिया। मैं अपने इमोशन पर काबू ही नहीं कर पा रहा था। मृत्यु एक सदमा तो देती है। पर उसके साथ ही वो और मनुष्यतर होने का एक और अवसर भी देती है।

    मेरे सवाल और गुस्सा, जो मेरे भीतर कुछ दरक जाने की ही ताकीद कर रहे थे, उन्हें तब भी कोई कंधा न मिला। मैं अपनी उदासी में इरफ़ान के जाने का दुख और उनके जाने से उपजे सवालों को लेकर चुप हो गया। फेसबुक और जगह-जगह अपने जैसे लोगों, दोस्तों, टूट जाने वालों को खोजता रहा, देखता रहा पढ़ता रहा। अधिकतर वो भी हैं जो सिनेमा-थिएटर की दुनिया में रेगुलर दर्शक भी नहीं पर इरफ़ान उनके भीतर ज़रूर किसी न किसी रूप में रहे होंगे। कला का यही असर होता है। उसकी पहुँच बहुत दूर होती है। उस अंधेरी गुफा की तरह जहाँ उगी हुई किसी पत्ती को भी नहीं पता कि जाने किस सुराग से उसके हिस्से की धूप उसे मिल रही। इरफ़ान के किरदार रचने वाले लेखक या उनकी फिल्में रचने वाले निर्देशक या खुद इरफ़ान को भी कभी यह अंदाज़ नहीं होगा कि उन्हें कौन-कौन, कहाँ-कहाँ कितनी शिद्दत से चाह रहा है। यह भी कि किरदार निभा देने के बाद इरफ़ान कितनी सारी शक्लों में उन लोगों के भीतर बैठे होंगे।

    निश्चित ही उनके चाहने वालों के लिए यह दुखदायी खबर थी! निर्मल वर्मा की कहानी ‘धूप का एक टुकड़ा’ में किरदार कहती है, “हमें दूसरों के मरने पर जो दुख होता है, वह थोड़ा-बहुत स्वार्थी क़िस्म का दुख है, क्योंकि हमें लगता है कि इसके साथ हमारा एक हिस्सा भी हमेशा के लिए ख़त्म हो गया है। हम सब अपने-अपने कामों में लग ही जाएँगे। क्योंकि हमारी भी सीमाएँ हैं। पर यह भी है कि इरफ़ान के जाने के साथ उनके तमाम चाहने वालों के भीतर के अपने-अपने इरफ़ान भी आज चले गए! दुख सबसे ज़्यादा इस बात का है। तकलीफ भी यही। और कुछ दिनों तक तो यह तकलीफ जाने से रही।

    मगर इरफ़ान के खुद के लिए उनकी रवानगी क्या उस बीमारी के साथ ही शुरू नहीं हो गई थी? दो साल पहले! इन दो सालों में वो कितनी तकलीफ़ों से गुजरे होंगे। कितने सारे खयाल उनसे होकर गुजरे होंगे। दौलत, शोहरत, इज्ज़त के शिखर पर बैठ कर दुनिया उन्हें कैसी लगती होगी। यकीनन, गुजरे दो साल भयानक पीड़ा वाले होंगे। एक झटके में वो दुनिया उन्हें झूठी लगने लगी होगी जिसने उन्हें आसमान की ऊँचाइयों पर बैठाया था। और फिर क्या उसी दुनिया में वापस आने की तड़प का अंदाज़ हममें से कोई लगा सकता है? चार दिन पहले ही उनकी माँ की मृत्यु हुई! एक कलाकार जो किरदार की रूह में समा जाता था। जिसकी आवाज़ में किरदार की आत्मा बोलती थी, उसके भीतर के जज़्बात भला और कोई कैसे बयां कर सकता है। हम सब जानते हैं कि कला का अपना एक सच होता है जिसकी बुनियाद में हजारों दुख और त्रास और तकलीफ़े और विडंबनाएं होती हैं। इतिहास उठा कर देख लो एक असाधारण आदमी के हिस्से तमाम असाधारण तकलीफ़ें ही आईं। उसका सच तहखाने के सात तालों में दबा रह जाता है। इस लड़ाई से हार की घोषणा करते इरफ़ान जाते हुए अपनी माँ को याद करते रहे। इस खबर ने लड़ाई का वह दृश्य दिखाया जिसमें वे अकेले जूझ रहे थे। हम किसी भी सच को पूरा कभी नहीं जान सकते। इसलिए हमेशा यह उम्मीद थी कि इलाज करवा कर वे वापसी करेंगे।

    लेकिन इस लड़ाई का एक और दुखद हिस्सा हम सबने ‘अँग्रेजी मीडियम’ के प्रमोशन के दौरान उनकी आवाज़ में सुना। उस काँपती हुई आवाज़ ने भीतर तक डरा दिया था तभी। वो इरफ़ान जिसकी आवाज़ और अंदाज़ ने ऐसा जादू किया था कि अपने यार-दोस्तों से बात करने के लिए ‘हासिल’ के संवाद और हाव-भाव मेरी पीढ़ी के लोगों के पास आज भी हैं। नहीं कुछ तो ‘हच’ के छोटे रिचार्ज और ‘सिस्का’ की एलईडी ने उनकी आवाज़ में छिपे जादू से तो सबको जोड़ा ही होगा। उसी आवाज़ में एक कमज़ोरी, दर्द और बेबसी को सुनना संभव नहीं था। इरफ़ान अपने मन की ही बात तो कर रहे थे नींबू से लेमनेड बना लेने वाली बात कहावत में ही अच्छी लगती है ...। ऊँट जिस करवट भी बैठेगा, आपको इत्तेला कर दिया जाएगा ....! 

    वोंग कार वाई की ‘हैप्पी टुगेदर’ नाम की चाइनीज़ फ़िल्म में दो किरदारों का संवाद याद आया। वो कहता है, ‘‘कभी-कभी मुझे लगता है कान ज़्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं। तुम अपने ‘कानों’ से बेहतर ढंग से देख सकते हो। अपने चेहरे पर नकली ख़ुशी ओढ़े तो तुम खुश दिख सकते हो लेकिन तुम्हारी आवाज़ सब सच बयां कर देती है इरफ़ान की आवाज़ शायद छुपाने की कोशिश भी नहीं कर सकी।

    मैं उनसे कभी नहीं मिला। लेकिन उनकी आँखों में जो गहराई थी, वो मुझ जैसे उनके हजारों चाहने वालों को अपनी ही लगती थीं। ‘हासिल’ के बनने की कहानी और इरफ़ान के ज़िक्र को कुछ समय पहले मैंने तिगमांशु धूलिया से सुना था तो लगा कि जैसे मैं भी वहीं कहीं पहुँच गया हूँ। उनके कितने सारे क़िस्से सुन पा रहा था। और वहीं तिगमांशु ने कहा था ‘यार, उसकी तबीयत बहुत खराब है

    आज इरफ़ान खान चले गए। तब भी लग रहा जैसे उनके चाहने वालों के लिए उनकी आवाज़ आएगी, ’’अबे तुम लोग गुरिल्ला हो। गुरिल्ला वार किया जाएगा’’ उनके जाने के साथ कितनी सारी तस्वीरें, किस्से, कहानियाँ, सपने भी चले गए जिनमें वे रहा करते थे। वो समय अब इतिहास बन गया। अपने समय का इतिहास बन जाना तकलीफ़देह है। बहुत।

    फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे, से पटकथा-लेखन में स्नातक। लेखक, निर्देशक, कॉलमिस्ट, कवि, गायक, प्रशिक्षक, संपादक के रूप में सुदीप का कार्यक्षेत्र सिनेमा, नाटक, पत्रकारिता, कविता एवं आयोजनधर्मी के रूप में फैला है। भोपाल से प्रकाशित दैनिक ‘सुबह सवेरे’ में विश्व-सिनेमा पर साप्ताहिक कॉलम ‘सिनेमा के बहाने’ और इन्स्टाग्राम पर विशिष्ट गद्य लेखन के कारण भी पहचान।