•  डॉ. मनीष कुमार जैसल
    •  09 May 2020
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    “बहुत कम लोग हैं जो केवल संस्कृति और परंपरा के विस्तार के लिए फिल्में बना रहे हैं।“

    असम की राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त लेखक-निर्देशक डॉ. सांत्वना बोरडोलोई से ख़ास बातचीत

    हम सभी हिंदी सिनेमा से ख़ासे परिचित हैं लेकिन पूर्वोत्तर (नॉर्थ-ईस्ट) के सिनेमा से गैर-पूर्वोत्तर राज्यों के आम दर्शक अनजान ही रहते हैं। वो पूर्वोत्तर जो अपनी खूबसूरती, संस्कृति और सभ्यता के लिए जाना जाता है। स्क्रीनराइटर्स ऐसोसिएशन की इस ख़ास सीरीज़ में, डॉक्टर मनीष कुमार जैसल समाज का अक्स दिखाने वाले मीडियम सिनेमा के जरिये आपको पूर्वोत्तर राज्यों की यात्रा कराएंगे। जानु बरुआ, मंजु बोरा, रीमा दास, जतिन बोरा, ज़ुबिन जैसे नाम आपने देश की चर्चित मीडिया में ज़रूर सुने होंगे। इनकी फिल्मों को भी आपने किसी फिल्म फेस्टिवल में देखा होगा। लेकिन भारत के पूर्वोत्तर में बसे आठ राज्यों के फ़िल्मकारों, पटकथा लेखकों, निर्माताओं, और खासकर यहाँ के सिनेमा के भूत, भविष्य और वर्तमान को लेकर जानकारी जुटाना मुश्किल रहता है। कैसा है इन राज्यों का सिनेमा, किस तरह की चुनौतियों का सामना करता है? इसी को ध्यान में रखते हुए हम यह सीरीज अपने पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़े फिल्म विधा के सशक्त हस्ताक्षरों से आपको रूबरू कराया जायेगा।

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    भाग 1: डॉ. सांत्वना बोरडोलोई

    पेशे से शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. सांत्वना बोरडोलोई  (Dr. Santwana Bordoloi) असमिया सिनेमा की प्रमुख फ़िल्मकार भी हैं। भारतीय सिनेमा में असम कहाँ है यह सोच उनकी फिल्मों में दिखाई देती है। 2 बच्चों की  माँ होने के साथ अपने डॉक्टरी के पेशे से लगातार जुड़ी रही सांत्वना बोरडोलोई को अपनी फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है। “365 दिन मैं डॉक्टर हूँ और अगर 30 दिनों के लिए कुछ अलग करना चाहती हूँ तो मुझे हक है”, जैसे स्त्री पक्ष को अपनी फिल्मों में भी उठाने वाली फ़िल्मकार को पूर्वोत्तर का दर्शक खूब पसंद करता है। मोमोनी गोस्वामी के उपन्यास Dontal Haatir Uiye Khuwa Haoda पर आधारित 1996 में बनी फिल्म Adajya से असमिया फिल्मों की  शुरुआत करने वाली डॉ. सांत्वना ने अब तक सिर्फ 2 फीचर फिल्मों और 2 लघु फिल्मों का ही निर्माण किया है । लेकिन दोनों में उन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई है। 2016 में बनाई फिल्म Maj Rati Keteki उनकी 20 साल बाद बनाई दूसरी फिल्म है लेकिन फिल्म की यह खासियत पूरे असमिया सिने उद्योग को गौरवान्वित करती है कि उसे नेटफ्लिक्स जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म में जगह मिली और असमिया भाषा के सिनेमा का विषय देशव्यापी और आम जनमानस के लिए खुला। फिल्म को  64वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में ‘स्पेशल मेंशन’ (फीचर फिल्म) से नवाजा जा चुका है। पहली फिल्म Adajya में जहां एक जवान विधवा महिला की यात्रा बताई है वही दूसरी फिल्म Maj Rati Keteki एक नामी साहित्यकार के सफल होने पर वापस अपने घर आने  की उसकी यात्रा का वर्णन करती है। पूर्वोत्तर राज्यों की फिल्मों में विषय की स्पष्ट भूमिका और कलाकारों का अच्छा चयन जहां दिखता है वही भाषाई रूप से अपने समाज और संस्कृति को वीडियो फॉर्मेट मे सहेजने का जो प्रयास किया जा रहा है उसमे डॉ. सांत्वना का योगदान सराहनीय है। अपनी फिल्मों से असमिया साहित्य और सिनेमा को एक विस्तार देने वाली फ़िल्मकार से हमने पूर्वोत्तर राज्यों के सिनेमा के साथ उनकी अपनी कहानी को जानने का प्रयास किया। पेश हैं उनसे बातचीत के कुछ अंश:

    असमिया फिल्म उद्योग में अपने सफर के बारे में हमें बताइए।

    अभी तक मैंने 2 फिल्में बनाई है। मेरी पहली फिल्म 1996 में बनी अदजया (Adyaja) थी। जो ममोनी रायसोम गोस्वामी के उपन्यास पर आधारित थी। (Dr. Mamomi Raisom Goswami) असमिया साहित्य की हस्ताक्षर हैं। उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिल चुका है। दर्शकों का ही प्यार था कि इसे कई सारे फिल्म फेस्टिवल में आमंत्रित किया गया और दर्शकों द्वारा सराहना की गई। दुनिया भर में अब तक यह कई अवार्ड जीत चुकी है। उसके 20 साल बाद मैंने अपनी दूसरी फिल्म MaJ Reti Keteki बनाई। जिसकी कहानी मैंने खुद लिखी थी। इसके अलावा 2 और लघु फिल्में दूरदर्शन के लिए बनाई थी।

    पेशे से डॉक्टर हूँ। 365 दिन मरीजो की सेवा करती हूँ। मुझे लगा 30 दिन मैं कुछ अलग कर सकती हूँ तो मैंने फ़िल्मकार होना चुना। हालांकि जो लोग मुझे फेमिनिस्ट फिल्ममेकर समझते  हैं उन्हें समझना चाहिए कि मैं मानवतावादी फ़िल्मकार हूँ। क्योकि मैंने मानव के दर्द को अपने डॉक्टरी के पेशे से महसूस किया है। आप देखिये पुरुष सिर्फ एक बार दर्द झेलता है कष्ट सहता है लेकिन महिला को दो बार कष्ट सहना होता है पहला औरत होने के लिए दूसरा इंसानियत के नाते।

     

    लेखक-निर्देशक बनने की प्रेरणा कैसे मिली ?

    इसका जवाब यही है कि जब ममोनी गोस्वामी के उपन्यास को मैंने पढ़ा तो मुझे उसके किरदार काफी पसंद आए। मुझे उस उपन्यास का मुख्य किरदार काफी पसंद आया। फिल्म की नायिका गिरिबाला जो कि एक जवान विधवा लड़की है, उसको केंद्र में रखा । उपन्यास में जहां तीन विधवा स्त्रियों की कहानी है उसे दिखाने का प्रयास किया। आप देखेंगे कि उसमे तीनों विधवाएँ अपने अपने ढंग से विधवा जीवन का सामना कर रही हैं। जिसमें से एक वृद्ध विधवा के जीवन का एक मात्र सपना है कि वह काशी जाए और अपने पति की अंतिम इच्छा को पूरा करे। इसके बाद उसे खुद की कोई चिंता नहीं होगी कि उसे ससुराल में किस तरह की यातनाएं दी जाएगी या अपनी बाकी ज़िंदगी कैसे जिएगी । दूसरी विधवा अपने घर परिवार की जमीन संपत्ति की देखरेख करने की कोशिश करती है लेकिन असफल होती है। क्योकि 1945 का समय है जहां लड़कियों का घर से बाहर निकलना मुश्किलों भरा है। उसे एक नौकर पर आश्रित रहना पड़ता है, जो उसे बाद में धोखा भी देता है। मुख्यतः मैं इसी पर फिल्म बनाना चाहती थी लेकिन मुझे लगा कि यह मेरे लिए मुश्किल होगा इसीलिए मैंने तीसरी कहानी को चुना जिसमें एक लड़की जिसकी हाल ही में शादी हुई थी, वह विधवा बनकर अपने घर आ जाती है। उसे विधवा की तरह जीवन यापन करना पड़ता है। समाज में जैसे चलन है कि विधवा को मांस नहीं खाना, सफ़ेद वस्त्र पहनने हैं। अनेक कायदों का कड़ाई से पालन करना है। यह सब देख उसे आश्चर्य होता है। क्योकि वह खुद अपने घर में ही आई हुई है। पिता का घर जहां एक ओर माना जाता है कि वहाँ स्वतन्त्रता होती है। लेकिन विधवा होने की वजह से वह सारी स्वतन्त्रता उससे छीन ली जाती है।  मेरे लिए यह कहानी मेरी एक फ़िल्मकार के रूप में आगे आने की प्रेरणा बनी।

    दूसरी फिल्म जो मैंने बनाई वह इससे बहुत अलग विषय है। Maj Rati Keteki में पृवेंडु हजारिका नाम का एक नामी साहित्यकार सफल होने के 10 वर्ष बाद बाद अपने घर वापस आता है जहां उसका जीवन बीता है। उसे अपने जीवन में क्या खोया क्या पाया याद आने लगता है। जो वह देखता है सोचता है वही मेरी फिल्म का दर्शक देखता है।

     

    पूर्वोत्तर राज्यों के सिनेमा में क्या फिल्म जॉनर दिखता है? फिल्मों के विषयों में किस तरह की विविधता है? क्या दलित, महिला, बाल प्रधान फिल्मों का रूप वहाँ देखा जा सकता है?

    पूर्वोत्तर में समाज और फिल्मों दोनों में महिलाओं का स्थान ऊपर है। देश के राज्यों के मुक़ाबले स्थिति बेहतर है। मणिपुरी फ़िल्मकर अरिबम श्याम शर्मा की फिल्म ISHANOU (1990) आप देखें तो पता चलता है कि यह फिल्म मातृत्व पर आधारित है। वहीं जानु बरुआ की फिल्म अपरूपा (1982) भी एक जवान महिला की कहानी है। इसके बाद भवेन्द्र साइकिया की पहली फिल्म संध्याराग भी महिला किरदार पर ही आधारित थी। एक नौकरानी के जीवन पर आधारित फिल्म के जरिये अमीरी-गरीबी का बेहतर चित्रण उन्होने इस फिल्म में किया था। पदम बरुआ की निर्देशित इकलौती फिल्म Gonga Chilonir Pakhi 1976 भी एक महिला की कहानी थी। जिसे उन्होने बड़ी खूबसूरती से पर्दे पर चित्रित किया था। असम के अलावा भी अन्य राज्यों में ऐसी फिल्में बन रही है। उनाता को ही आप उदाहरण के रूप ले सकते हैं।

     

    पूर्वोत्तर राज्यों के फ़िल्मकारों के सामने क्या क्या चुनौतियाँ रहती है?

    पैसा और दर्शक सबसे बड़ी चुनौती है। इससे निपटना ही सबसे बड़ा चैलेंज मुझे नज़र आ रहा है। हालांकि हर कोई पैसे के लिए फिल्म नहीं बना रहा। नए फिल्म मेकर्स के पास अच्छी स्क्रिप्ट है लेकिन उनके पास पैसे नहीं है जिससे वो फिल्म बना सके । यही सबसे बड़ी चुनौती है। इसी तरह, फिल्म स्क्रीनिंग के लिए थियेटर का न होना भी एक बड़ा संकट है। गुवाहाटी में कुछ सिनेमाघर थे अब उनकी संख्या कम हो गई, कुछ गोदाम में तब्दील हो गए। जो दुखद है।

     

    क्या पूर्वोत्तर राज्यों के फ़िल्मकार के दिमाग में उसका दर्शक निर्धारित रहता है ?

    हाँ, उसे अपना दर्शक तो पता रहता है। लेकिन आजकल व्यावसायिक सिनेमा के आने से बदलाव आया है कि वह दर्शको को पसंद आएगा या नहीं। हर फ़िल्मकार चाहता है कि उसकी फिल्म से पैसा भी वापस आए, और उसे अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भी जगह मिले और उसकी फिल्म को कोई सम्मान मिल जाए। इसके लिए फ़िल्मकारों को अच्छी फिल्में बनानी ही पड़ेगी।

     

    पूर्वोत्तर के कलाकारों, फिल्म से जुड़े टेकनीशियन का मुंबई और तमिल तेलगु सिनेमा में पलायन देखा जा रहा है। इसके पीछे क्या कारण  हैं?

    फिल्ममेकिंग से लोग प्रभावित होते हैं। साथ ही इससे ज्यादा से ज्यादा पैसा भी कमाना चाहते हैं। ऐसे लोग बहुत कम है जो केवल संस्कृति और परंपरा के विस्तार के लिए फिल्में बना रहे हैं। चूंकि यह महंगा मीडियम है ऐसे में उन्हें फिल्म में लगा पैसा वापस मिलना भी जरूरी हो जाता है। फ़िल्मकारों को अब ज्यादा पैसा चाहिए इसीलिए उन्हें वहाँ जाना ज्यादा उचित लगता है। हिन्दी फिल्में ज्यादा लागत में बनती हैं इसीलिए वहाँ स्कोप दिखता है।

     

    पूर्वोत्तर के सिनेमा के विस्तार में राष्ट्रीय मीडिया की क्या भूमिका है?

    जितने भी पूर्वोत्तर के राज्य हैं उसकी कोई भी खबर मेनस्ट्रीम मीडिया में नहीं रखी जाती। जब कोई फिल्म नेशनल अवार्ड प्राप्त करती है तो पत्रकार उसे खोजना शुरू करते हैं। विलेज रॉकस्टार को आप इन्टरनेट पर खोजिए तो मुश्किल से 4 से 6 आर्टिकल आपको देखने को मिलेंगे। या हो सकता है कि आज ये फिल्म आपको नेट फ्लिक्स पर भी मिल जाए। लेकिन वहीं दूसरी तरफ कुछ अन्य राज्यों में कोई साधारण फिल्म भी बनती है तो उससे जुड़े 10 से 15 आर्टिकल आपको देखने पढ़ने को मिल सकते हैं। ऐसे में मीडिया पर सवाल तो बनता है। जब तक कोई हत्या या आतंक से जुड़ी खबर न हो तब तक इसे नेशनल मीडिया में जगह नहीं मिलती। असम में बाढ़ आने पर उसकी खबर आती है लेकिन बाढ़ से परेशान हुए नागरिकों की कहानियां सामने नहीं आती।

     

    ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म (OTT) के आने से किस तरह के बदलाव आपको एक फ़िल्मकार और दर्शक के रूप में नज़र आते हैं?

    यह बात सही है कि जब आप अच्छी फिल्में बना रहे हैं तो इन प्लेटफॉर्म के जरिये आपको एक और माध्यम मिलता है खुद की प्रतिभा को पेश करने का। लेकिन इन प्लेटफॉर्म के आने से अभी कोई खास बदलाव नहीं दिख रहा है। न ही आगे आने वाले वर्षों में दिखेगा। पहले दूरदर्शन पर तमिल, कन्नड, मलयालम,असमिया आदि क्षेत्रीय भाषाओं की अवार्ड विनिंग फिल्में दिखाई जाती थी। लेकिन अब उसका भी प्रसारण बहुत सीमित हो गया है। दर्शक अपनी भाषा की फिल्में देखना चाहता है लेकिन उसे सही समय पर सही प्लेटफॉर्म मिलना चाहिए। यह हम सब की भी ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि अपने क्षेत्रीय भाषा और संस्कृति का मिलजुल कर विस्तार करें। हम दर्शको की भी कमी है कि जब क्षेत्रीय चैनल पर कुछ आ रहा होता है तो उसे बेमन से देखते हैं। इस दिशा में सरकारों को नई पॉलिसी के तहत भी कार्य करने की जरूरत है। राज्य  अपनी अलग संस्कृति, सभ्यता और परंपरा को लेकर जाने पहचाने जाते हैं। जिसमें सिनेमा भी एक रोल प्ले करता है। हमारे यहाँ की फिल्में सामान्य होती हैं। हिंसा की गुंजाइश बहुत कम होती है। मेघालय और अन्य पूर्वोत्तर के राज्यों के लोग बहुत सामान्य है जो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के कंटेन्ट को शायद कभी पसंद नहीं करेंगे ।

     

    पूर्वोत्तर राज्यों के सिनेमा का भविष्य कैसा होगा ?

    मुझे नई पीढ़ी पर पूरा भरोषा है। रीमा दास, जतिन बोरा, ज़ुबिन गर्ग जैसे फ़िल्मकार बहुत ही सराहनीय और अच्छी स्क्रिप्ट के साथ काम कर रहे हैं। ये वाकई अपने काम को लेकर दृढ़ निश्चयी है। व्यावसायिक फिल्मों को लेकर ही सिर्फ उनका प्रयास नहीं जारी - वे अपने कल्चर और ट्रैडीशन को लेकर भी आगे चल रहे हैं। फिल्म क्लब भी यहाँ के सिनेमा को प्रोत्साहित करने में मदद कर रहा है। फिल्म फेस्टिवल और दुनिया के बड़े फिल्म जगत के लोग हमारी फिल्मों को देख रहे हैं। नैशनल फिल्म कॉर्पोरेशन भी फिल्म निर्माण में जो मदद कर रहा है वह नई राहें खोलने जैसा है। भविष्य का पूर्वोत्तर का सिनेमा प्रगति के पथ पर मुझे दिखता है।  

    जनसंचार एवं पत्रकारिता के सहायक प्रोफेसर। नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी नई दिल्ली के बुक फ़ेलो और सहपीडिया यूनेस्को के रिसर्च फ़ेलो भी रह चुके हैं। फ़िल्मकार मुजफ्फर अली पर किताब 'फिल्मों का अंजुमन: मुजफ्फर अली' प्रकाशित। सेंसरशिप और सिनेमा पर पीएचडी। नियमित आलेख और संगोष्ठियों में वाचन। संपर्क: mjaisal2@gmail.com