•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  05 June 2020
    •  475

    "कला और कॉमर्स का सुन्दर संतुलन है बासु दा की फिल्मों में।" - अशोक मिश्र

    लेखक-निर्देशक बासु चटर्जी को श्रद्धांजलि (संकलन: अजय ब्रह्मात्मज)

    दो बार सर्वश्रेष्ठ स्क्रीनप्ले का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त करने वाले वरिष्ठ स्क्रीनराइटर अशोक मिश्र से बासु दा के निधन के बाद बात हुई। मिश्र ने बासु दा के लिए फ़िल्म की कहानियाँ लिखीं और इस दौरान काफ़ी वक़्त साथ बिताया। इसमें 1992 में परिवार कल्याण पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने वाली फिल्म 'दुर्गा' भी है जो मिश्र की ही कहानी पर आधारित थी। प्रस्तुत है, बातचीत के कुछ अंश:

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    "बासु दा (चटर्जी) से पहला परिचय फिल्मों के जरिये ही हुआ। मैंने पाया कि उनकी फ़िल्में मध्यवर्ग के मामूली लोगों को लेकर होती हैं। मुझे उनकी फ़िल्में बहुत प्रभावित करती थीं। उनकी फ़िल्में कलात्मक होने के साथ व्यवसायिक भी होती थीं। कला और कॉमर्स का बहुत अच्छा संतुलन रहता था उनकी फिल्मों में। जैसे गाने बहुत अच्छे होते थे। अभिनय के लिहाज़  से भी उनकी फ़िल्में महत्वपूर्ण हैं। वे फिल्मों की कहानियों पर बहुत ध्यान देते थे। खुद साहित्यप्रेमी थे। उनकी फ़िल्में पारिवारिक होती थीं। बंगाली भावचेतना और सौन्दर्यबोध उनकी फिल्मों में है। साहित्य और मध्यवर्ग का ऐसा अनुरागी फ़िल्मकार हमारे बीच से चला गया। आज एक खालीपन महसूस हो रहा है।

     

    मुंबई आने के बाद मैंने कुंदन शाह के साथ एक स्क्रिप्ट पर काम करना शुरू किया था। उन्हें एनएफ़डीसी का एक प्रोजेक्ट समाज कल्याण मंत्रालय से मिला था। वह फिल्म परिवार नियोजन पर थी। मैंने एक कहानी सुझाई और कहा कि परिवार नियोजन की कहानी स्त्री के नज़रिए से लिखते हैं, क्योंकि यह तकलीफ़ स्त्री को ज्यादा होती है। बाद में कुंदन पर दवाब आया कि आपने परिवार नियोजन की बात सांकेतिक रूप से कही है। आप थोड़ा डायरैक्ट तरीके से कहिये। ज्यादा स्पष्ट और सीधे बात कही जाये ताकि आसानी से समझ में आये। कुंदन का मन नहीं माना तो उन्होंने मना कर दिया।

     

    वह स्क्रिप्ट एनएफ़डीसी में पड़ी थी। बासु दा कभी गए होंगे तो वहां के अधिकारियों ने बताई होगी। उन्होंने कुंदन से पूछा कि तुम नहीं बना रहे हो तो मैं बनाता हूँ। कुंदन ने उन्हें हाँ कह दिया। बासु दा ने उनसे लेखक को भेजने के लिए कहा। मैं तो बहुत खुश हो गया। इस तरह मेरी पहली मुलाक़ात हुई। उनका ऑफिस तब कमालिस्तान में था। उन्होंने कहा कि आप की कहानी मुझे पसंद आई है। आप कितने पैसे लोगे? मैंने कहा आप बताएं? उन्होंने फिर कहा कि सुना कुंदन ने कुछ पैसे दिए थे। फिर उन्होंने एक राशि बताई तो मैंने सहमति जाहिर कर दी। उन्होंने तुरंत एक चेक काट कर एडवांस दे दिया। मैं सोचने लगा कि पहली ही मुलाक़ात में कोई कैसे इतना भरोसा कर सकता है? निश्चित ही अनुभवों ने उन्हें पारखी बना दिया था।  फिर उन्होंने पूछा कि इसमें जिस बेरला गाँव का ज़िक्र है,वह वास्तविक गाँव है कि तुम्हारा दिया नाम है। मैंने बताया कि यह गाँव है। उन्हें वह नाम अच्छा लगा था तो गाँव का पूरा डिटेल पूछा। मेरे विस्तार से बताने पर उन्होंने कहा कि  मैं इस गाँव को देखना चाहूँगा। कहाँ है यह गाँव? मैंने छत्तीसगढ़ बताया तो वह चलने के लिए राजी हो गए।

     

    अगले ही दिन हमलोग बेरला गाँव पहुँच गए। तब रायपुर की फ्लाइट नहीं थी तो पहले नागपुर और फिर बेरला जाना हुआ। बेरला दुर्ग और रायपुर से लगभग समान दूरी पर है। हम लोग दुर्ग होकर गए। मैंने देखा कि उन्होंने नागपुर एअरपोर्ट पट टैक्सी ड्राईवर से अच्छा मोलभाव किया। उन्हें मोलभाव करने आता था।

     

    बेरला में मेरे अभिनेता दोस्त सोमेश अग्रवाल का घर था। वहां उनके पिता डॉक्टर थे। उनके पास ही हमलोग रुके। बासु दा को तेज़ भूख लगी थी। उन्होंने खाना बनाने के लिए कहा। दाल-चावल और सब्जी बनाने में बहुत समय लग रहा था। वह जल्दीबाजी दिखा रहे थे। उन्होंने पूछा कि क्यों इतनी देर हो रही है? मैंने कहा दादा यहाँ मुंबई की स्पीड से खाना नहीं बन पायेगा। वक़्त लगेगा, लकड़ी के चूल्हे पर बटलोही में दाल-चावल बनाने में टाइम लगेगा। इंतजार कीजिये। गाँव देखने के बाद वे मुंबई आ गए। मुंबई में दो दिनों के बाद उन्होंने कहा कि मैं बेरला में ही शूटिंग करूंगा। जाओ, जरा इंतजाम करो। प्रोडक्शन मेनेजर के साथ उन्होंने मुझे भेज दिया।

     

    मैंने वहां रायपुर में इंतजाम किया। शूटिंग शुरू हो गयी। एक दिन शूटिंग से लौटते समय दादा ने कहा कि तुम ने रायपुर ठहरने का गलत इंतजाम किया। हमें दुर्ग में ठहरना था। मैंने कारण जानना चाहा, क्योंकि दोनों शहर कमोबेश समान दूरी पर थे। उन्होंने बताया कि पिछली बार हम लोग दुर्ग से बेरला गए थे। वह रास्ता अच्छा था। यह रास्ता ख़राब है,इसलिए 20-30 मिनट ज्यादा समय लगता है। अब रोज़ का इतना समय जोड़ लो। कितने समय की बर्बादी हो गयी। पैसे भी ज़्यादा ख़र्च हो रहे हैं। मेरे लिए वह एक सबक था। वह बहुत किफ़ायती और मितव्ययी व्यक्ति थे। फ़िज़ूलख़र्च नहीं करते थे। खैर,हमारी शूटिंग पूरी हो गयी और हम मुंबई वापस आ गए।  यह 'दुर्गा’ फिल्म की शूटिंग का किस्सा है। इस फिल्म को नैशनल अवार्ड मिला था।

     

    इसके बाद उन्होंने अगली फिल्म के लिए बुलाया। मैंने पूछा कि बासु दा मेरे पैसे बढ़ाइएगा ना? मेरे लिखने से फिल्म को अवार्ड मिला। उन्होंने हँसते हुए बताया कि उस श्रेणी में एक ही फिल्म थी, इसलिए उसी को अवार्ड मिला। वह मुंहफट थे। कोई भी बात सीधे मुंह पर कहते थे। उनसे यह चीज़  सीखी मैंने।

     

    बहरहाल, उनके साथ मेरी अगली फिल्म शिवमूर्ति की कहानी ‘त्रियाचरित्र’ थी। इस फिल्म के संवाद लिखे थे मैंने। फिर ‘सरिता की शर्तें’  फिल्म मैंने लिखीं। उनके लिए लिखी मेरी फ़िल्में गुमनामी में चली गयीं। ये उनके उत्तरार्ध की फ़िल्में थीं। ‘दुर्गा’ के लिए मैंने एक छतीसगढ़ी गाना लिखा था ‘तिरिया जनम जनि देह’ मतलब मुझे औरत का जन्म मत देना। एक दिन बासु दा के घर पहुंचा तो वहां सलिल चौधरी बैठे हुए थे। बासु दा ने मेरा परिचय करवाया और बताया कि ‘दुर्गा’ में दादा संगीत देंगे। सलिल दा ने मुझ से पूछा कि किस धुन पर लिखा है? मैंने छतीसगढ़ी लोकगीत गाकर सुनाया। सलिल दा ने उस गाने को संगीतबद्ध किया। मेरे लिए गौरव की बात है।

     

    बाद में मैंने टीवी ‘रजनी’ धारावाहिक के कुछ एपिसोड लिखे। उन्होंने मुझ से ‘ब्योमकेश बख्शी’ में अभिनय करवाया। मर्डरर का रोले दिया। मैंने पूछा कि मैं तो कहीं से हत्यारा नहीं लगूंगा। उन्होंने हँसते हुए कहा कि इसीलिए तो दे रहा हूँ। दर्शकों को भी अंदाजा नहीं होगा कि तुम हत्यारे हो सकते हो। उनका ‘सेंस ऑफ़ ह्यूमर’ भी ज़बरदस्त था।

     

    बासु दा आप से लिखवाने के बाद फिर से पूरा लिखते थे। स्क्रिप्ट को अपनी शैली और रंग देते थे। वह स्क्रिप्ट का पुनर्लेखन करते थे। उनसे मेरी अच्छी ट्यूनिंग हो गयी थी। एक संस्कारी निर्देशक हमारे बीच से चला गया। बंगाली ‘भद्रलोक’ थे बासु दा...  उन्हें नमन।"

    अजय ब्रह्मात्मज जाने-माने फिल्म पत्रकार हैं। पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।