•  डॉ. मनीष कुमार जैसल
    •  03 July 2020
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    "राईटर को उसका क्रेडिट बिना माँगे ही मिलना चाहिए।"

    गीतकार पुनीत शर्मा से एसडबल्यूए की ख़ास बातचीत

    हाल फ़िलहाल में जूही चतुर्वेदी लिखित और सुजित सरकार निर्देशित फ़िल्म गुलाबो सिताबो ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर रिलीज़ हुई। फ़िल्म कई मायनों में अहम है। किसी भी स्टार की यह पहली ऐसी फ़िल्म है जो डायरेक्ट ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर रिलीज़ हुई है। साथ ही आने वाले समय में ऐसी अन्य फ़िल्में जो इन माध्यमों में रिलीज़ होने वाली है उनके लिए मील का पत्थर साबित हो सकती है। फ़िल्म की कमियों ख़ामियों से इतर हमने फ़िल्म से जुड़े एक ऐसे गीतकार से उनके मुंबई तक के सफ़र को जाना जिन्होंने एक छोटे से शहर इंदौर से ख़ुद को सँवारा और आज इस ऐतिहासिक फ़िल्मी सफ़र का हिस्सा बने।

    इंदौर में जन्में पुनीत शर्मा युवा कवि, पटकथा लेखक, गीतकार और संवाद लेखक हैं। फ़िल्म औरंगज़ेब का गाना बर्बादी, रिवॉल्वर रानी का टाइटल ट्रैक, बरेली की बर्फ़ी का बैरागी, फ़िल्म संजू का मशहूर गीत मैं भी बढ़िया तू भी बढ़िया और बाबा बोलता है - इनके लिखे ऐसे गीत हैं जो इन्हें हिंदी सिने संगीत में अपनी पहचान देते हैं। फ़िल्मी गीतों के अलावा यूट्यूब पर 'तुम कौन हो बे' कविता के लिए मशहूर हुए पुनीत खड़ी बोली और लहजे से अलग छाप अपने दर्शकों में छोड़ते हैं। एक ऐसे माहौल में जब कोई भी, कुछ भी लिखने और दिखाने की अंधाधुन कोशिश में लगातार लगा हुआ है वहाँ पुनीत भीड़ से अलग दिखते हैं। गीतकार पुनीत शर्मा से हमने विस्तार से चर्चा की। उनकी यात्रा के कई पड़ाव हैं जिन्हें एक भावी लेखक को ज़रूर जानना चाहिए । 

     

    इंदौर से मुंबई की यात्रा के बारे में बताइए।

    मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र से ताल्लुक़ रखता हूँ। इंदौर के एक क़स्बे में मिडिल क्लास फ़ैमिली में जन्म हुआ, जहाँ साहित्य सिनेमा और कला  का दूर दूर तक किसी का कोई नाता नही था। पिता जी और ताऊ जी को अच्छे गाने सुनने का शौक़ था, उसी शौक़ ने मुझे गाने सुनने और फ़िल्में देखने पर मजबूर किया। और यह कहूँ कि साहित्य और समाज की जो मेरी समझ बनी है वह फ़िल्में देखकर ही बनी तो भी ग़लत नही होगा। साइंस में ग्रेजुएशन किया और स्कूल से कॉलेज तक जो कुछ लिखा उसके लिए एप्रिशिएशन मिला, फिर इंदौर में  5 साल थिएटर और रेडियो में 3 साल कॉपी राईटर की नौकरी करने के बाद सोचा कि मुंबई की तरफ़ चलते हैं। और 2012 में आ गए इस समंदर में।

     

    एक गीतकार के तौर पर आठ वर्षों से आप मुंबई में हैं, बता पाएँगे कि संगीत के क्षेत्र में क्या नए ट्रेंड अभी चल रहे हैं?

    संगीत के क्षेत्र में क्या ट्रेंड होने चाहिए ये अलग सवाल है, क्या हो सकता है यह अलग सवाल है, लेकिन ट्रेंड क्या चल रहा है इस पर मैं बात करूँ तो मामला खपत पर टिका हुआ है। कितने लोग देखेंगे और क्या पसंद करेंगे इसको ध्यान में रखकर गाने बनाए जा रही हैं। ये चल रहा है बाज़ार में तो इसी तरह का कुछ और बनाया जाए वाला ट्रेंड आप देख सकते हैं। लेकिन इसके इतर मेरी अपनी अलग सोच है। आप देखिए किसी भी एरा में जब एक ही टाइप का कुछ बनाया जाता है तो 75 फ़ीसदी लोग बोर होने लगते हैं। इसीलिए मैं अलग तरह का काम करना पसंद करता हूँ। भीड़ से अलग और अपनी सोच को क्रियेटिव अन्दाज़ में कहना मेरा मूल उद्देश्य रहा है। नए शब्द, नई भाषा, नई फ़ीलिंग्स, अलग सा लहजा और किसी भी तरह का दोहराव का ना होना किसी भी गीतकार को इंडिविजुअल पहचान देता है। ऐसे गीतकार हर दशक में आपको देखने को भी मिलेंगे। मैं वैसा ही काम करना चाहता हूँ। आने वाले समय में मुझे लगता है ऐसे गीतकार आएँगे जो अपनी अलग पहचान के साथ पहचाने जाएँगे। जिन्हें यूट्यूब जैसे अन्य प्लेटफ़ॉर्म मदद भी कर रहे हैं।

     

    एक गीतकार क्या लेखन मात्र से जीवन यापन कर सकता है?

    इसका सीधा जवाब नहीं है। जिस जिस दौर में कंटेंट का लेवल बहुत निचले स्तर पर चला जाता है वहाँ लोगों को लगने लगता है कि ये तो मैं भी लिख सकता हूँ। ऐसे में इंडस्ट्री उन्ही लोगों से काम लेने लगती है जो औसत लिख रहे है। यह मामला पूरी तरह इंडस्ट्री पर निर्भर है कि वो क्या बना रही है। क़ाबिलियत को तरजीह अगर नही दी गई और कुछ भी बनाने की होड़ रही तो लिखने वाले तमाम हो जाएँगे और फिर एक गीतकार को उसका पर्याप्त मानदेय नही मिलेगा जिससे वो जीवन यापन कर सके। इससे इंडस्ट्री और लेखक दोनों का व्यक्तिगत नुक़सान तो है ही। जिस पर ध्यान देने की ज़रूरत है।

     

    हिंदी और उर्दू के गीत जहाँ कविता और शायरी को शामिल किया जाता रहा है वहीं पंजाबी, हिंगलिश और रैंप लिरिक्स आज लोगों को ख़ूब पसंद आ रहा है। दोनों की आप कैसे तुलना करते हैं?

    हर भाषा का अपना महत्व है उसकी अपनी पहचान है, लेकिन किसी भी चीज़ की अति ख़तरनाक है। फ़िल्म अगर यूपी एमपी के बैकग्राउंड में सैट है तो उसमें पंजाबी का मसला कहीं से भी सही नहीं। यह ऐसा इसलिए भी होता रहा है कि पंजाबी चल रहा है तो हर जगह पंजाबी गीतों को डाल देते हैं निर्माता, जो ग़लत है। उड़ता पंजाब में पंजाबी चल सकती है,गली बॉय में रैप चल सकता है लेकिन ज़बरन हम हिंगलिश और तमाम प्रयोग करने लगे तो उसका मूल नष्ट हो जाता है। मैं इससे बचता हूँ। किरदार और समय क्या कहता है इस पर ध्यान देकर लिखा जाना बेहतर है।

     

    नए गीतकारों को ऐसा क्या करना चाहिए जिससे वो सफल हो सके? उनकी लेखनी और क्राफ़्ट में बदलाव कैसे आए?

    एक इंसान जहाँ से आता है, जिस मिट्टी से उसका रिश्ता है उसको ध्यान में रखकर गीतकार बनने की शुरुआत करे तो मुझे लगता है उसे पहचान और सफलता ज़रूर मिलेगी। अपनी आवाज़ और लहजे पर काम करना चाहिए। संगीत का ज्ञान बहुत ज़रूरी है। धुनें कैसे बनती हैं, उन्हें पहचानने के साथ उनमें फेरबदल की गुंजाइश हो सके ऐसी तैयारी करके ही मुंबई या किसी भी इंडस्ट्री में जाना चाहिए। इसके साथ ही इस पर हमेशा काम करना चाहिए कि उनकी व्यक्तिगत पहचान क्या है और कैसे बनी रहेगी। ऐसे में ही सफल होने की सम्भावना हो सकती है।

     

    पुराने गानो का रीमेक बनना क्या आज के गीतकारों की कमतर क्वालिटी की ओर इशारा करता है?

    गानों का रीमेक बनाना मार्केट का काम है। एक ऐसी पीढ़ी जिसके दिमाग़ में उन पुराने गानों की लिरिक्स चढ़ी हुई है उसे नया कलेवर देते हुए उनको उपभोक्ता बनाया जा रहा है। उन गानों की रिकॉल वैल्यूहै और कम ख़र्च में उन्हें रिक्रिएट किया जा सकता है। कह सकते हैं कि उन गानों का इस्तेमाल भर किया जा रहा है। लेकिन यहाँ यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि उन पुराने गानों को रीमेक करते समय कितनी ज़िम्मेदारी से उस पर काम किया जा रहा है यह देखना बेहद ज़रूरी है। कई रीमेक गानों का फ़िल्मी संस्करण अपने आप में फूहड़ है। जिससे बचना चाहिए।

     

    इस दौर में जब एक राईटर को सोशल मीडिया जैसे माध्यम मिले है जिसमें सेंसरशिप नहीं है, तो लिखते समय उसे किस तरह की सावधानी बरतनी चाहिए?

    मैं जब भी व्यक्तिगत रूप में कविताएँ लिखता हूँ तो यह सोचता हूँ कि मेरे अंदर जो सवाल चल रहे हैं वह उस कविता के ज़रिए ज़्यादा लोगों तक पहुँचे। उनके जवाब की तलाश में वह कविता भिन्न प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए टहलती है। लोगों का प्यार भी मिल रहा है लोग पसंद भी कर रहे हैं इसीलिए नया और बेहतर लिखने की कोशिश जारी है। लेकिन लिखते समय अगर मैंने एक दायरा बाँध दिया तो हो सकता है मैं वह ना लिख पाऊँ जो मेरी दिल की आवाज़ कह रही है। ‘तुम कौन हो बे’ जब लिखा तो इन्हीं बातों का उत्तर भी आपको वहाँ मिल जाएगा। कविता हो या फ़िल्मी गीत जब भी मैं लिख रहा होता हूँ तो मुझे पता होता है कि मैं आख़िर लिख क्या रहा हूँ। यही एक गीतकार को करना भी चाहिए।

     

    फ़िल्म गुलाबों सिताबो रिलीज़ हो चुकी है। इसके दो गाने (कंजूस और जूतम फेंक) आपने लिखे। कहाँ से निकले ये गाने?

    जब हम जूतम फेंक की धुन का फ़र्स्ट ड्राफ़्ट अभिषेक अरोरा (गायक) के साथ बना रहे थे तब मेरे पास एक बेसिक आइडिया था कि फ़िल्म में अमिताभ और आयुष्मान खुरानाके बीच की जो खटपट और कैमिस्ट्री है वह कैसी है। मुझे अलग ढंग से और अपनी अलग पहचान के साथ इसमें कुछ कहना था। बाँके और मिर्ज़ा के बीच कितनी भी खटपट हो लेकिन वह दर्शकों को पसंद आने वाली है। मैंने सोचा कि हर एक आदमी यहाँ टॉम एंड जैरी टाइप है। ऊपर वाले ने हर चूहे के लिए एक बिल्ली बनाई है। इसे अपने गीत में शामिल किया। उर्दू का एक मुहावरा है जूतम पैजार। इसी का हिंदी संस्करण मैंने तैयार किया जूतम फेंक। जो पूरी तरह किरदार और फ़िल्म की कहानी से मेल खाता हुआ दिखता है। दूसरा गाना जो कंजूस है वह पूरी तरह अमिताभ बच्चन जी के फ़िल्मी किरदार मिर्ज़ा पर आधारित है। मिर्ज़ा जो एक बहुत ही कंजूस वृद्ध है उसके लिए लिखा मैंने कि ‘चाय में जो मक्खी जो गिरे, मक्खी चूस के निकाले, चाहे किसी और की हो चाय रे’। कह सकते है मेरे सामने एक चुनौती थी कि मुझे एक्स्ट्रीम लेवल की कंजूसी को शब्दों में वयाँ करना था। मिर्ज़ा के किरदार को और भी जीवंत बनाना था। दर्शक और श्रोत्रा ही अब बता पाएँगे मैं उसमें कितना सफल हुआ। क्योंकि मैंने यह गीत किसी एक ख़ास वर्ग तक सीमित नही रखा। आप देखेंगे कि "Okay वाले text को भी k में ही निपटाए आँसू बचाने के लिए करे नहीं cry" जैसी बातें हमारे ही आस पास से निकली है। हम सबकी कहानी है जिसे मैंने बस एक माध्यम के जरिए ज़्यादा लोगों तक पहुँचाने की कोशिश की है।

     

    बड़े स्टार द्वारा निभाए जा रहे किरदार पर लिखना कितना चुनौती पूर्ण है?

    मेरी नज़र में जो लोग स्टार को ध्यान में रखकर लिखते हैं उन्हें ऐसा करने से बचना चाहिए। मैं हमेशा किरदार पर ही लिखने की कोशिश करता हूँ। गुलाबों सिताबों में भी अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना की जगह मिर्ज़ा और बाँके के आपसी रिश्ते पर लिखा है। एक लेखक को स्टार या किसी भी अभिनेता या अभिनेत्री के बजाय किरदारों और फ़िल्म में उनकी स्थिति को ध्यान में रखकर लिखना चाहिए।

     

    ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर लेखकों के क्रेडिट को लेकर स्पष्ट स्थिति नही दिखती। एक लेखक को क्या उसके नाम से कोई प्यार नहीं रहता?

    ये स्थिति वैब सीरीज़ में देखने को ज़्यादा मिलती है। जब आप कोई सीरीज़ देख रहे होते हैं तो उसमें रोलिंग क्रेडिट को स्किप करने का ऑप्शन क्यों दिया जाता है यह मेरी समझ से परे है। राईटर आर द फ़र्स्ट क्रियेटर्स ऑफ़ एनीथिंग। हमें माँग कर क्रेडिट लेना पड़े और इसके बारे में बात भी करनी पड़रही है यह दुखद है। किसी भी फ़ॉर्मैट के राईटर को उसका क्रेडिट बिना माँगे ही मिलना चाहिए। उसकी क्रियेटिविटी को बचाए रखने के लिए यह क़दम उठाया जाना बेहद ज़रूरी है।

     

    एक गीतकार और लेखक के रूप में पुनीत शर्मा अपनी मिट्टी से किस तरह जुड़े हैं ?

    एक इंसान अपने अनुभवों से ही जाना पहचाना जाता है। मेरी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा इंदौर और मालवा क्षेत्र में गुज़रा है। यहाँ की बोली भाषा, खान पान, कल्चर, लहजा, सामाजिक ज्ञान को लेखनी में शामिल करने की कोशिश भी रही है। यक़ीन मानियें हर व्यक्ति के कैरियर की शुरुआत में ये सभी तत्व उसके व्यक्तित्व निर्माण में सहभागी होते हैं। 2014 में रिवॉल्वर रानी के लिए जब मुझे गीत लिखने ऑफ़र मिला तो मैं बुंदेली टच देने के लिए अपनी नानी के घर गया और वहाँ रहकर काफ़ी कुछ सीखा। खड़ी बोली, भाषाई रूप से स्पष्टता और देश समाज काल की परिघटना को गीतों में उकेरना मुझे इसी इंदौर और मालवा से जोड़े रखता है। कह सकता हूँ दूर रहकर भी पास हूँ अपनी मिट्टी से। आप देखिए देश भर से सबसे सही और सटीक हिंदी बोलने वाला प्रदेश मध्य प्रदेश है, इंदौर में खड़ी बोली जिस तरह की बोली जाती है, यही सब माहौल मुझे मुंबई में और सर्वाइव करने में मदद कर रहा है।

     

    आपके 'रोल मॉडल' कौन हैं?

    मेरे प्रिय गीतकारों में शैलेंद्र साहब, साहिर लुधियानवी, मजरूह साहब हैं। वे जिस तरह धुनों पर काम करते थे उसे मैं हमेशा फ़ॉलो करता रहूँगा। इंदौर में जब थिएटर करता था पीयूष मिश्रा को भी ख़ूब पढ़ा सुना।

     

    इन दिनों क्या नया कर रहे हैं? लॉकडाउन और कोरोना महामारी से परेशान हुए नागरिकों की व्यथा पर कुछ लिखा या लिखेंगे?

    मैं इन दिनों तिग्मांशु धूलिया के लिए वैब सीरीज़ लिख रहा हूँ। जहाँ तक आपका दूसरा सवाल है कि लॉकडाउन और कोरोना महामारी पर क्या लिखेंगे तो इस समय को थोड़ा बीतने देना चाहिए। इतनी जल्दबाज़ी में कुछ भी नही लिखना चाहिए। मनोवैज्ञानिक रूप से हर व्यक्ति पर यह ज़रूर असर करता है कि वो 70 -80 दिनों से घरों की चारदीवारी में बंद है लेकिन इससे त्वरित निष्कर्ष नही निकाल सकते। इसके लिए समय देना होगा। साल डेढ़ साल बाद इस पर मेरी तरफ़ से कुछ लिखा जाएगा। अभी इसी समय में जी रहे हैं तो जीने की जद्दोजहद में मैं ख़ुद भी शामिल हूँ।

     

    छोटे शहरों से ताल्लुक़ रखने वाले भावी लेखकों के लिए क्या संदेश है ?

    पूरी तैयारी, शब्दों के भंडार, सामाजिक सांस्कृतिक समझ और अपनी अभिन्न पहचान के साथ इस शहर में आइए। यहाँ मौक़े बहुत हैं बस समय के साथ उसे पाने के तरीक़े आने चाहिए।

    जनसंचार एवं पत्रकारिता के सहायक प्रोफेसर। नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी नई दिल्ली के बुक फ़ेलो और सहपीडिया यूनेस्को के रिसर्च फ़ेलो भी रह चुके हैं। फ़िल्मकार मुजफ्फर अली पर किताब 'फिल्मों का अंजुमन: मुजफ्फर अली' प्रकाशित। सेंसरशिप और सिनेमा पर पीएचडी। नियमित आलेख और संगोष्ठियों में वाचन। संपर्क: mjaisal2@gmail.com