•  डॉ ज़ेबा फ़िज़ा
    •  15 August 2020
    •  499

    ये चंद लोग जो बस्ती में सबसे अच्छे हैं

    डॉ राहत इन्दौरी (1 जनवरी 1950 – 11 अगस्त 2020 ) को एक सलाम!

    मैंने अपने Primary Academics में किसी कहानी में पढ़ा था कि मीदास नाम का राजा था। वो जिस चीज़ को हाथ लगाता था वो सोना बन जाती थी। उसी तरह जब डॉ राहत इन्दौरी शेर पढ़ते थे तो अपनी आवाज़ से हर सुनने वाले का मेयार बढ़ा देते थे।

    कल का क़ारी (पाठक) जब तारीख़ (इतिहास) की वरक़-गिरदानी (अध्ययन) करेगा तो डॉ राहत इन्दौरी पर उसकी नज़र ज़रूर ठहरेगी जिनकी पैदाइश साल 1950 के पहले दिन यानी 1 जनवरी को इंदौर में ही हुई थी। यहीं उन्होंने तालीम पूरी की और तक़रीबन 16 साल तक इंदौर यूनिवर्सिटी में उर्दू पढ़ाई और अदबी रिसाले 'शाख़े' की दस साल तक इदारत (सम्पादन) भी की। मगर राहत को सबसे ज़्यादा पहचान मिली मुशाइरों से। वो हिन्दोस्तान के हर बड़े शहर में, मुल्क के बाहर भी गए और अपनी शाइरी और अदायगी के झण्डे गाड़ने के अलावा फ़िल्मों में भी गाने लिखते रहे और तक़रीबन 50 से ज़्यादा फ़िल्मों में उन्होंने अपने क़लम से त'आवुन (सहयोग) किया। इतना सब होते हुए भी डॉ राहत इन्दौरी के अतरी सफ़र में उनकी स्टेज की कामयाबी का अहम रोल है।

    डॉ राहत इन्दौरी की शाइरी को हिन्दी या उर्दू शाइरी के ख़ैमों में बाँटा नहीं जा सकता। उनकी शाइरी ख़ालिस हिन्दोस्तानी ज़बान की शाइरी है मगर उन्होंने अपने मे'यार से कभी समझौता नहीं किया।

    तभी वो कहते हैं -

    ले तो आए शायरी बाज़ार में 'राहत' मियां

    ये ज़रुरी तो नहीं लहजा भी बाज़ारी रखो।

     

    राहत इंदौरी का लहजा एक मख़सूस लहजा है जिसे लाखों की भीड़ में भी पहचाना जा सकता है।

    न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा

    हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा।

     

    राहत की शाइरी रवायती, तरक़्क़ी पसन्द या जदीद शाइरी से अलग हट कर थी। राहत की शाइरी में एक गुस्सा ज़रूर था और वो गुस्सा जायज़ था।

    अपने एक शेर में वो कहते भी हैं -

    ये चंद लोग जो बस्ती में सबसे अच्छे हैं

    इन्हीं का हाथ है मुझको बुरा बनाने में।

     

    ऐसा नहीं कि राहत ने सिर्फ़ अपने रंग में या अपने दौर की शाइरी की। उन्होंने रिवायती मूड की शराब भी अपने क़लम को पिलाई और कहा -

    उसकी याद आई है सांसो जरा आहिस्ता चलो

    धड़कनों से भी इबादत में खलल पड़ता है।

     

    राहत की नज़र दौरे-हाज़िर पर हर वक़्त टिकी रही और इसीलिए शायद उनकी शाइरी में एक सुक़रातीपन था, जो हर चीज़ को अपनी फ़लसफ़ाना सलाहियात से देखा करते थे।

    नए किरदार आते जा रहे हैं

    मगर नाटक पुराना चल रहा है।

     

    राहत की शाइरी में गुस्सा तो था ही एक ज़िद और एक एतमाद (आत्मविश्वास) भी था।

     

    वो चाहता था कि कासा ख़रीद ले मेरा

    मैं उस के ताज की क़ीमत लगा के लौट आया।

     

    दर्जबाला( उपरोक्त) शेर में शायद उनकी वही ज़िद झलकती है।

    उनके इसी मूड की अक्कासी करता उनका ये शेर भी क़ारी को मुत'आस्सिर (प्रभावित) करता है -

    मैंने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया

    इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए।

     

    डॉ राहत इन्दौरी की शाइरी का न तो रंग किसी से मिलता है और न ही लहजा। दुनिया दूरबीन का इस्तेमाल दूर की चीज़ को क़रीब देखने के लिए इस्तेमाल करती है। या यूँ समझ लें कि मंज़र और आँखों का फ़ासला कम कर देती है। मगर राहत इसके बरअक्स (विपरीत) इसी दूरबीन को उल्टा कर के पास की चीज़ों को दूर कर के देखने का तजरिबा हासिल करने के शौक़ीन हैं और इसी चाह में वो ऐसा शेर कह देते हैं -

    आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो

    ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो।

     

    या फिर उनका ये शेर देख लें -

    मैं पर्बतों से लड़ता रहा और चंद लोग

    गीली ज़मीन खोद के फ़रहाद हो गए।

     

    राहत इन्दौरी की ये खासियत है कि वो नए-नए इस्तेआरात और तश्बीह (बिम्ब एवं प्रतीक) का इस्तेमाल करने से नहीं चूकते और इसमें उनकी भरपूर मदद करती है उनकी कुछ नया करने की ललक।

    शहर क्या देखें कि हर मंज़र में जाले पड़ गए

    ऐसी गर्मी है कि पीले फूल काले पड़ गए।

     

    राहत सिर्फ़ ग़ज़ल के ही शाइर नहीं थे। उनकी शाइरी हम्द, ना'त, मनक़बत जैसे अल्मास (जवाहरात) से आरास्ता (सुसज्जित) थी। वो किछौछा शरीफ़ में बहुत शौक़ से सुने जाते थे। तो दरगाह हज़रत अब्बास अलमदार में होने वाले 'अब्बास डे' में भी उसी तरह मकबूल थे जितने ग़ज़ल के मुशाइरों में।

    उनकी नज़रें एक दरवेश की नज़रें थीं जिसकी चश्मे-ज़दन में क़ज़ा (मौत) भी रहा करती थी। उनकी शाइरी में कई बार मौत को पेश किया गया।

    रोज वही इक कोशिश जिंदा रहने की

    मरने की भी कुछ तैयारी किया कर।

     

    जनाजे पर मेरे लिख देना यारों

    मोहब्बत करने वाला जा रहा है।

     

    इससे पहले कि हवा शोर मचाने लग जाए

    मेरे अल्लाह मेरी ख़ाक ठिकाने लग जाए।

     

    दर्जबाला अशआर का मुतालेआ(अध्ययन) किया जाए तो लगता है कि राहत की एक नज़र ज़िन्दगी के सबसे बड़े सच यानी मौत पर भी थी। या वो अपनी मौत की आहट लम्बे वक़्त से सुन रहे थे? वजह कुछ हो मगर डॉ राहत इन्दौरी का जाना अदब का एक ऐसा नुकसान है जो कभी भरा नहीं जा सकता।

    अपने कई चाहने वालों को उदास छोड़ कर राहत चले गए उस जगह जहां से कोई न पलटा।

    बिखर बिखर सी गई है किताब सांसो की

    ये क़ागज़ात ख़ुदा जाने कब कहां उड़ जाए।

     

    डॉ राहत इन्दौरी की ज़िन्दगी के औराक़ उड़े ज़रुर। मगर उड़ने से पहले वो ख़ुद पर छपे तमाम मत्न (अक्षर) छोड़ गए हैं।

    अदब के सीने और अपने चाहने वालों के दिलों पर।

     

    मेरी जानिब से उनको ख़िराजे-अक़ीदत, इस मज़मून का इख़्तेताम मेरे अपने शेर से -

    रवाना हुए वो तो महफ़िल से कब के

    मगर महफ़िलें आरज़ू की जवां हैं।

    डॉ ज़ेबा फ़िज़ा शायरा और कवयित्री हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में सतत प्रकाशन। देश के बड़े मंचों,आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर मुशायरों में शिरकत। किताब 'फ़स्ले गुल' (ग़ज़ल, हम्द,नात,मनाकिब)। काव्य कलश सम्मान, चंद्रविभू राजश्री सम्मान, हिंदी सेवी सम्मान, सृजन एवं तख़लीक़ द्वारा सम्मानित एवं विभिन्न अन्य सम्मान। संपर्क: drzebafiza@gmail.com