•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  15 August 2020
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    यह गलत धारणा है कि लेखक को पैसों से परहेज होता है।

    अजय ब्रह्मात्मज के सवाल, लेखकों के जवाब: हिमांशु शर्मा

    हिमांशु शर्मा पिछले दशक में तेज़ी से उभरे सफल लेखक हैं। ‘तनु वेड्स मनु’ से 'ज़ीरो’ तक में उनकी प्रतिभा दिखी। हिंदी फिल्मों में छोटे शहरों की कहानियां लाने का श्रेय उन्हें मिलना ही चाहिए। वे फिलहाल ‘अतरंगी रे’ और ‘रक्षाबंधन’ लिख रहे हैं।


      
    - जन्मस्थान
    पैदाइश दिल्ली की, लेकिन बचपन लखनऊ में बीता।

    - जन्मतिथि 
    20 अगस्त 1980

    - शिक्षा-दीक्षा
    12वीं तक लखनऊ में। स्नातक (हिंदी ऑनर्स) किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली से।

    - लेखन प्रशिक्षण और अभ्यास? 
    कोई प्रशिक्षण नहीं लिया। लेखन में इसलिए आया कि मैं बहुत बुरा असिस्टेंट डायरेक्टर था। मुझे अपने निर्देशकों पर तरस आता था कि वे क्यों मेरे साथ काम कर रहे हैं।

    - मुंबई कब पहुंचे?
    2005 में। मेरा स्नातक 2002 में पूरा हुआ। उसके बाद मैंने कुछ समय एनडीटीवी में काम किया। एक स्पांसर्ड शो लिखता था।

    - कहानी लिखने का विचार कैसे आया? पहली कहानी कब लिखी थी? वह कहीं छपी थी या कोई और उपयोग हुआ था?
    लिखने में मेरी पहली कोशिश ‘तनु वेड्स मनु’ ही है। साहित्य का छात्र होने के नाते पढ़ता रहता था। उसके पहले यशराज फिल्म्स में विक्टर आचार्य का सहायक था ‘टशन’ के समय। 2008 में ‘तनु वेड्स मनु’ लिखी। वह 2011 की फ़रवरी में रिलीज़ हुई। इस दरम्यान अलग-अलग काम किए। 

    - आरंभिक दिनों में किस लेखक ने प्रभावित लिया? कोई कहानी या रचना, जिसका ज़बरदस्त असर रहा? 
    मुझे धर्मवीर भारती और निर्मल वर्मा बहुत पसंद हैं। मेरी पसंदीदा कृति है धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों का देवता’ और निर्मल वर्मा की ‘चीड़ों पर चांदनी’।

    - पहली फिल्म या नाटक या कोई शो, जिसकी कहानी ने सम्मोहित कर लिया?
    कॉलेज में ‘प्लेयर्स’ थिएटर ग्रुप के साथ काम करते समय हम लोग लिखे हुए नाटक उठाते थे या खुद अडैप्ट करते थे। अडैप्टेशन का बहुत काम किया है। जी पी देशपांडे के नाटक ‘रास्ते’ का गहरा असर रहा। उसे एनएसडी में देखा था। बैरी कीफ के नाटकों का भी असर रहा।

    - ज़िन्दगी के कैसे अनुभवों से आप के चरित्र बनते और प्रभावित होते हैं?
    मुझे लगता है कि मैं एक-दो घटनाएं या व्यक्ति नहीं बता सकता। मुझ पर पूरी छाप लखनऊ की रही। उसी ने मुझे गढ़ा। पहली फिल्म लिखते समय तक छोटे शहरों की कहानियां जैसा कोई टर्म था ही नहीं। तब पंजाब का वर्चस्व था और नायक भी कपूर, चड्ढा या कुमार होते थे। मैं अपने अनुभवों की ही कहानियां लेकर आया। उसी दुनिया की मुझे जानकारी थी।

    - चरित्र गढ़ने की प्रक्रिया पर कुछ बताएं?
    तनु तीन-चार लड़कियों को लेकर लिखी गयी थी और राजा अवस्थी लखनऊ विश्वविद्यालय के दो-तीन लड़कों के मेल से बना। मेरे लिए हर किरदार नया ताला होता है, जिसे खोलने के लिए नयी चाभी ढूंढनी पड़ती है। बहुत सोचता हूँ। फिर लिखता हूँ। मेरे किरदार चुनौती देते हैं तो रास्ते खोजने में मज़ा आता है। चरित्रों का गढ़ना रफ़ हैं। उन्हें आंसर शीट से नहीं जोड़ना चाहिए।

    - क्या आप अपने चरित्रों की जीवनी भी लिखते हैं?
    बिल्कुल नहीं। शुरू में उन्हें बहुत थोड़ा जानता हूँ। फिर वे धीरे-धीरे खुलते हैं। अगर पहले ही पत्थर की लकीर खींच देंगे तो वे नासूर बन जायेंगे। पहले से उनका जीवन तय नहीं होता।

    - अपने चरित्रों के साथ आप का इमोशनल रिश्ता कैसा होता है?
    ‘राँझना’ का कुंदन जो मैंने सोचा और लिखा था, वह फिल्म के अन्दर अलग हो गया था। मैंने आनंद से कहा था कि मेरा कुंदन परदे के कुंदन से जुदा था। आनंद और धनुष ने उसे कुछ और बना दिया था, जो कि बेहतर था। मेरा कुंदन अभी तक जिंदा है। मैं उसके लिए कहानी ढूंढ रहा हूँ।

    - क्या कभी आप के चरित्र खुद ही बोलने लगते हैं?
    ऐसा कभी नहीं होता। यह सबसे बड़ा मिथक है। यह झूठ है। मुझे नहीं लगता कि वे ख़ुद बोलते हैं। अगर वे ऐसा करते तो मुझ जैसा आलसी लेखक खुश रहता। 

    - क्या किरदारों की भाषा अलग-अलग होनी चाहिए?
    वह ऑर्गेनिक तरीके से मेरी फिल्मों में हुआ है। मैंने अलग से ध्यान नहीं दिया। वे अपनी ज़बान लेकर आते हैं। टीवी के साथ रिमोट होता ही है। किरदारों के साथ भाषा रहती है।

    - संवाद लिखना कितना आसान या मुश्किल होता है? 
    मेरी फिल्मों में वह भी ऑर्गेनिक रहता है। मैं पटकथा और संवाद अलग-अलग नहीं लिखता। मैं संवाद समेत पटकथा लिखता हूँ।

    - दिन के किस समय लिखना सबसे ज्यादा पसंद है? कोई ख़ास जगह घर में? फिल्म लिखने के लिए कभी शहर भी छोड़ा है?
    यह डैडलाइन पर निर्भर करता है। जब वह आ जाए तो पूरे दिन लिखता हूँ। ड्राइंग रूम के सोफे पर ही पड़ा रहता हूँ। लेट कर सोचता हूँ और बैठ कर लिखता हूँ। मैं अपने कमरे में ही लिखता हूँ। लिखने के लिए कहीं नहीं जाता। मैं स्थान नहीं बदल पाता।

    - कभी राइटर ब्लॉक से गुज़रना पड़ा? ऐसी हालत में क्या करते हैं?
    मैं तो इसी बात के लिए मशहूर हूँ कि आलसी लेखक हूँ। लिखना मेरे लिए थकाऊ काम है।

    - लेखकों के बारे कौन सी धारणा बिल्कुल गलत है?
    एक तो यही कि किरदार ख़ुद बोलने लगते हैं। यह भी गलत धारणा है कि उन्हें पैसों से परहेज होता है। पूरी इंडस्ट्री धंधे के अनुसार चलती है, लेकिन लेखन शुद्ध कला मान लिया गया है। लेखक भूखा क्यों रहे?

    - लेखक होने का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
     बहुत सारी जिम्मेदारियों से बच जाते हैं। जैसे बिजली नहीं रहने पर मान लिया जाता है कि मुझे फ़्यूज़ बदलना नहीं आता होगा।

    - फिल्म के कितने ड्राफ्ट्स तैयार करते हैं?
    मेरी अभी तक की सारी राइटिंग शूट होने के दौरान पूरी हुई है। इसका मुझे कोई गर्व नहीं है। फिल्म स्क्रिप्ट पढ़ने के लिए नहीं होती। वह देखने के लिए होती है। धनुष, अक्षय या खान साहेब को देख-मिल कर उनका बेहतर इस्तेमाल करने का मन रहता है, इसलिए ड्राफ्ट पहले से तैयार नहीं रहता। मैं हर फिल्म की शूटिंग के समय सैट पर रहता हूँ और तैयारी से सभी चरणों में सभी विभागों में घुसा रहता हूँ। स्क्रिप्ट बदलता रहता हूँ।

    - अपने लेखन कैरियर की अभी तक की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?
     छोटे शहर की कहानियां लेकर मैं आया। 2011 के पहले यह दुनिया फिल्मों में थी ही नहीं। उसका सामजिक-आर्थिक कारण है।

    - कई बार कलाकार दृश्य और संवादों में बदलाव करते हैं। क्या यह उचित है?
    मुझे लगता है कि फिल्म डायरेक्टर का ही मीडियम है। उन्हें कोई भी दिक्कत होती है तो मर्म संभालते हुए बदलाव कर देता हूँ। डायरेक्टर को सहूलियत रहनी चाहए। उसकी बात ही आखिरी होनी चाहिए, उनके हिसाब से ही होना चाहिए।

    - कहा जाता है लेखन एकाकी काम है। अपने अनुभव बताएं।
    है तो। चिकचिक में कोई कैसे लिख पायेगा? मैं कॉफ़ी हाउस या रेस्टोरेंट में सुकून मह्सून नहीं करता। एकांत तो मिलना ही चहिये।

    - आप के आदर्श लेखक कौन हैं?
    मुझे जूही चतुर्वेदी बहुत पसंद हैं। कमाल लिख रही है। एकदम अलग चीज़ लेकर आती है। मैं उनमें परिवर्तन भी देख रहा हूँ। उनकी ‘अक्टूबर’ और ‘गुलाबो सिताबो’ देखें। क्या मूड है!

    - लेखकों की स्थिति में किस बदलाव की तत्काल ज़रुरत है?
    बहुत सारे। ओटीटी के आने से मुख़्तलिफ़ राइटिंग को जगह मिलने लगी है। एक तरह से बेहतरी की तरफ बढ़ रहे हैं हम। फिल्म लेखन की अपनी सीमायें है। ओटीटी ने उन्हें तोड़ दिया है।

    - साहित्य और सिनेमा के रिश्तों पर क्या कहेंगे?
    अभी तो किताबों पर अनेक फ़िल्में बन रही हैं। ऐतिहासिक तौर से सिनेमा और साहित्य जुड़ा रहा है। साहित्य की पढाई के बिना आप लेखक बन ही नहीं सकते। साहित्य हमारे लेखन में आता ही है। इम्तियाज़ अली के यहाँ ‘गुनाहों का देवता’ है। श्रीराम राघवन की फिल्मों में जेम्स हेडली चेज़ का फील रहता है। फ़िल्मी लेखन की खुराक साहित्य से ही आती है। ज़रूरी नहीं कि हर कोई किसी किताब को लेकर काम करे।

    - इन दिनों क्या लिख रहे हैं?
    अभी ‘अतरंगी रे’ और ‘रक्षाबंधन‘ पर काम कर रहा हूँ। उसके अलावा 5-6 कहानियों पर दूसरे लेखकों के साथ काम कर रहा हूँ।

    - लेखक का प्रेम में रहना ज़रूरी है क्या?
    प्रेम का आशय स्त्री-पुरुष संबंध से है तो उसका होना और टूटना दोनों ही लेखन के काम आता है। प्यार पर विश्वास तो रखना ही पड़ेगा।

    - क्या लेखक अपनी परवरिश और परिवेश से बाहर के किरदारों को लेकर फिल्म लिख सकते हैं?
    बिल्कुल लिख सकते हैं। आनंद को प्रेम कहानियां पसंद हैं, इसलिए लिख रहा हूँ। मेरी पसंद तो ह्यूमन ड्रामा है। राजकुमार संतोषी इसी वजह से मेरे पसंदीदा निर्देशकों में हैं। ‘रक्षाबंधन’ उसी ज़ोन की है।
     
    - क्या किसी अन्य निर्देशक के लिए लिखना चाहेंगे?
    इम्तियाज़ अली, श्रीराम राघवन, राजकुमार हिरानी और मणि रत्नम के लिए लिखना चाहूँगा। अगर मेरे पास कभी ऐसी कोई कहानी होगी तो बेहिचक उनके पास जाऊँगा। 

    - फिल्म लेखन में आने के इच्छुक प्रतिभाओं को क्या सुझाव देंगे?
    ईमानदारी सबसे ज़रूरी है। चल रही चीजों पर लिखना ज़रूरी नहीं है। मौलिक लिखें। अगर आप दूसरों से अलग नहीं लिखेंगे तो दिक्कत होगी। मान लीजिये कि अगर आप ‘पीकू’ जैसी कोइ फिल्म सोच रहे हैं तो उसे ड्राप कर दीजिये, क्योंकि वो जूही लिख चुकी हैं। अपनी कहानी चुनें। फैंटम बनने की ज़रुरत नहीं है।

    अजय ब्रह्मात्मज जाने-माने फिल्म पत्रकार हैं। पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।