•  आनंद मुखर्जी
    •  08 June 2021
    •  897

    हम कब पुकारेंगे लेखक का नाम?

    अख़्तर उल ईमान और अभिलाष की याद में

    “जिनके अपने घर शीशे के बने होते हैं, वो दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते”, विदेश मंत्री रहते हुए सुषमा स्वराज ने संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) में यह संवाद दोहराया था। यह संवाद देश-विदेश मे गूँजा, पर इसके लेखक अख़्तर उल ईमान हैं, यह कितने लोग जानते हैं?


    मशहूर फ़िल्म वक़्त का यह संवाद भारत की राजनीति और कूटनीति का हथियार बनेगा, किसी ने नहीं सोचा होगा। निर्माता बी आर चोपड़ा और निर्देशक यश चोपड़ा की फ़िल्म वक़्त का यह संवाद, हिंदी सिनेमा के सबसे मशहूर संवादों में से एक है। राजकुमार जब चिनॉय सेठ (मदन पुरी) को याद दिलाते हुए कहते हैं कि जिनके अपने घर शीशे के हों, वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते, तो वाइन का ग्लास तोड़ देते हैं। 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध के माहौल में वक़्त रिलीज़ हुई थी। फिल्म में साहिर के गीत और रवि का संगीत है। फिल्म के मुख्य कलाकार है- सुनील दत्त, साधना, राजकुमार, शशि कपूर, शर्मिला टैगोर, बलराज साहनी, अचला सचदेव और मदन पूरी।


    इस संवाद को कितने ही नेताओं ने अलग अलग अंदाज़ में दोहराया है। प्रवक्ताओं से लेकर मुख्यमंत्रियों तक ने अपने विरोधियों पर तंज कसते हुए इस संवाद का इस्तेमाल किया है। ट्वीटर और सोशल मीडिया पर राजनैतिक हस्तियों के अकाउंट से ये संवाद कोट हुआ है। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब नेताओं ने इस संवाद को अपने हित में दोहराया। लेकिन कभी किसी ने लेखक को क्रेडिट नहीं दिया। इस संवाद के लेखक को किसी ने याद नहीं किया। हैरानी तब हुई जब पता चला कि विकिपीडिया के पास भी इस लेखक के बारे मे पर्याप्त जानकारी नहीं है। विकिपीडिया ने इतनी सी जानकारी दी कि वे उत्तर प्रदेश से थें और 1915 से 1996 तक हमारे बीच रहे।


    बहरहाल, अख़्तर उल ईमान ने हिंदी सिनेमा में पचास साल तक उन्होंने संवाद लेखन किया है। इत्तेफ़ाक़, क़ानून, धुँध, पाकीज़ा, पत्थर के सनम, गुमराह जैसी फ़िल्में लोगों की ज़ुबान पर आई तो उसका एक कारण अख़्तर उल ईमान का संवाद लेखन भी था। वे बेहद संजीदा और पेचीदा शायर माने गए हैं। उनकी शायरी का संकलन हिन्दी में भी सरो-सामाँ नाम से उपलब्ध है, जिसे सारांश प्रकाशन ने छापा है।


    उनकी एक नज़्म से आपका परिचय कराता हूँ। इसमें दो शब्द आयेंगे जिनमें से एक फ़रावां का मतलब है प्रचुर और तोशा का मतलब है राह ख़र्च। नज़्म का नाम है ‘सोग’।

    मरने दो मरने वालों को,
    ग़म का शौक़ फ़रावां क्यों हो


    किसने अपना हाल सुना है
    हम ही किसका दर्द निबाहें

    ये दुनिया, ये दुनियावाले
    अपनी-अपनी फ़िक्रों में हैं


    अपना-अपना तोशा सबका,
    अपनी-अपनी सबकी राहें
    वो भी मुर्दा, हम भी मुर्दा,
    वो आगे, हम पीछे-पीछे


    अपने पास धरा ही क्या है
    नंगे आँसू, भूखी आहें।

    बेनामी सिर्फ अख़्तर उल ईमान को मिली, ऐसा नहीं है। इंटरनेट पर गाने सर्च कीजिए, कई जगह आपको मशहूर गीतों के गीतकारों के नाम नहीं मिलेंगे। मशहूर फ़िल्में सर्च कीजिए, वहाँ सभी नाम मिलेंगे, एक लेखक ही हैं, जिनके नाम नहीं मिलेंगे। एक और बानगी देखिये -

    इतनी शक्ति हमें देना दाता,
    मन का विश्वास कमजोर हों ना।


    यह प्रार्थना गीत डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर लोकप्रियता के शिखर पर रहा। कई स्कूलों में इसे सुबह की प्रार्थना के बतौर बजाया जाता है। बहुत से बच्चों को और बचपन में इस गीत गा और सुन चुके बहुत से लोगों को ये गीत ज़बानी याद होगा। पर क्या कोई भी ये बता पायेगा कि ये रचना किसकी क़लम से निकली थी? इसका गीतकार कौन था?
    सन 1986 मे एक फिल्म आई थी- अंकुश। फिल्म के निर्देशक थे- एन चंद्र। उनके निर्देशन मे बनी यह पहली फिल्म थी। अंकुश के मुख्य कलाकार थे, नाना पाटेकर, निशा सिंह, राजा बुंदेला, मदन जैन और आशालता। गीतकार अभिलाष का यह भजन फिल्म अंकुश मे ही है। संगीतकार हैं कुलदीप सिंह। आवाज़ें हैं- सुषमा श्रेष्ठ और पुष्पा पगधारे की।


    जब मोबाइल मे कॉलर ट्यून का दौर आया तो यह भजन रिलायंस मोबाइल के प्लेटफार्म पर लोकप्रियता के शिखर पर पहुँच गया था। वहाँ यह नंबर एक पर था। जिसे भी फोन कीजिए उसी के मोबाइल मे सबसे पहले यही सुनाई देता था- इतनी शक्ति हमें देना दाता। जहां तक मुझे याद है रिलायंस में एक कॉलर ट्यून डाउनलोड करने के लिए ग्राहक से पहले तीस रुपये लिया जाता था। बाद मे हर महीने 15 रुपये बतौर किराया देना होता था। मोबाइल सेवा देने वाली कंपनी और ट्यून देने वाली कंपनी यानी म्यूजिक कंपनी के बीच वह कमाई बंट जाया करती थी। कॉपीराइट एक्ट के अनुसार उस कमाई में लेखक का भी हिस्सा होता है। रिलायंस में नौकरी के दौरान हम दोस्त चर्चा करते थे कि इतनी शक्ति हमें देना दाता – करोड़ों मोबाइल मे डाउनलोड हुआ है। इस लिहाज से इसके गीतकार को तो करोड़ों मिल गये होंगे। लेकिन 20 सितंबर 2020 को हमारी ग़लतफ़हमी दूर हों गई जब हमने समाचार पढ़ा कि गीतकार अभिलाष का देहांत हो गया है और चार महीने पहले उन्हें डाक्टरों ने बताया था कि वे कैंसर से पीड़ित हैं। दुर्भाग्य देखिए कि जिस गीतकार का एक गीत डिजिटल वर्ल्ड में टॉप पर था उस गीतकार के पास अपने ईलाज के पूरे पैसे नहीं थें। उन्हें लिवर कैंसर था जिसके लिये ट्रांसप्लांट में बेतहाशा खर्चा आना था। उन्हें आइपीआरएस (इंडियन परफॉर्मिंग राइट्स सोसायटी) से कुछ रॉयल्टी मिलती थी पर शायद उसमें कॉलर ट्यून के इस्तेमाल से जुड़े फ़ायदे का हिसाब नहीं था। अभिलाष को उनके गीतों की मशहूरियत के अनुसार रॉयल्टी मिली होती तो शायद वे लिवर ट्रांसप्लांट का खर्चा उठा पाते। उनके आखिरी दिनों में उनकी धर्मपत्नी ने हर तरफ मदद की गुहार की थी। इसके पहले एसडबल्यूए ने भी उन्हें मेडिकल एड प्रदान की थी।  


    एसडबल्यूए वर्षों से लेखक के क्रेडिट से जुड़े मुद्दे उठाता रहा है। एसोसिएशन की डिसप्यूट सैटलमेंट कमेटी क्रेडिट से जुड़े मामलों के लिये कोर्ट तक लड़ी है। जून 2020 में एसडबल्यूए के स्तंभकार डॉ. मनीष जैसल ने डिजिटल प्लैटफॉर्म पर लेखक का नाम ढूँढ़ने की कवायद की थी और यही नतीजा मिला था। (पढ़े: नाम गुम जायेगा? लिंक: https://www.swaindia.org/article_dyn.php?q=T1RZPQ ) इसके बाद जुलाई-अगस्त 2020 में लेखक-गीतकार वरुण ग्रोवर ने पंद्रह गीतकारों के साथ मिलकर एक मुहिम भी छेड़ी थी, जिसे लिये एक ख़ास गीत तैयार किया गया तहा, ‘हमें क्रेडिट दे दो यार!’ ( लिंक: https://www.youtube.com/watch?v=YGH6Po4W0N0 )


    तो आखिर कौन खा जाता है लेखक का हक़? और क्या लेखक का हक़ खाना इसिलिये आसान है कि गीत-संवाद सुनने वाले ख़ुद ही नहीं जानना चाहते कि उनका पसंदीदा गाना या लाइन आखिर किसने लिखा है? क्या दर्शकों को भी इंटलैक्चुअल प्रॉपर्टी राइटस् (बौद्धिक संपदा के अधिकार) के प्रति जागरूक होने की ज़रुरत हैं? सवाल कई हैं, और वाजिब हक़ पाने की लड़ाई लंबी है। सबसे पहले ज़रूरी है हम इन मुद्दों के प्रति जागरूक हों, इन्हें समझे और गीतकारों और संवाद लेखकों के नाम लेना शुरु करें।

    चलते चलते, गीतकार अभिलाष की क़लम से निकली इस बात को पूरा किया जाना चाहिये -

    इतनी शक्ति हमें देना दाता,
    मन का विश्वास कमजोर हो ना
    हम चलें नेक रस्ते पे हमसे,
    भूलकर भी कोई भूल हो ना
    इतनी शक्ति हमें देना दाता,
    मन का विश्वास कमजोर हो ना।

    हर तरफ़ ज़ुल्म है बेबसी है,
    सहमा-सहमा सा हर आदमी है
    पाप का बोझ बढ़ता ही जाए, 

    जाने कैसे ये धरती थमी है
    बोझ ममता का तू ये उठा ले, 

    तेरी रचना का ये अंत हो ना
    हम चलें नेक रस्ते पे हमसे 

    भूलकर भी कोई भूल हो ना।

    दूर अज्ञान के हो अँधेरे

    तू हमें ज्ञान की रौशनी दे
    हर बुराई से बचके रहें हम

    जितनी भी दे भली ज़िन्दगी दे
    बैर हो ना किसी का किसी से

    भावना मन में बदले की हो ना
    हम चलें नेक रस्ते पे हमसे, 

    भूलकर भी कोई भूल हो ना

    इतनी शक्ति हमें देना दाता 

    मन का विश्वास कमजोर हो ना।


    हम न सोचें हमें क्या मिला है, 

    हम ये सोचें क्या किया है अर्पण
    फूल खुशियों के बांटें सभी को, 

    सबका जीवन ही बन जाए मधुबन
    अपनी करुणा का जल तू बहा के, 

    कर दे पावन हर एक मन का कोना
    हम चलें नेक रस्ते पे हमसे, 

    भूलकर भी कोई भूल हो ना
    इतनी शक्ति हमें देना दाता, 

    मन का विश्वास कमजोर हो ना

    हम अँधेरे में हैं रौशनी दे,

    खो ना दे खुद को ही दुश्मनी से
    हम सज़ा पायें अपने किये की, 

    मौत भी हो तो सह ले ख़ुशी से
    कल जो गुज़रा है फिर से ना गुज़रे, 

    आने वाला वो कल ऐसा हो ना
    हम चले नेक रस्ते पे हमसे, 

    भूलकर भी कोई भूल हो ना
    इतनी शक्ति हमें देना दाता, 

    मन का विश्वास कमजोर हो ना।

    आनंद मुखर्जी स्तंभकार और पत्रकार रहे हैं। पहली लघुकथा टाइम्स ग्रुप की सारिका में सन 1979 में छपी। एक्सप्रेस ग्रुप से प्रकाशित मशहूर फिल्म साप्ताहिक स्क्रीन का हिन्दी संस्करण शुरू किया। एक्सप्रेस ग्रुप के बाद रिलायंस कम्यूनिकेशन के कंटेन्ट विभाग में लगभग 12 वर्ष तक कार्य किया। गीतों और गीतकारों में विशेष रुचि। संपर्क: anand.mukherjee07@gmail.com