•  डॉ. मनीष कुमार जैसल
    •  11 July 2021
    •  647

    अलविदा, दिलीप कुमार!

    विलक्षण अभिनेता दिलीप कुमार (11 दिसंबर 1922 - 7 जुलाई 2021) को श्रद्धांजलि

    एक अभिनेता, जो लेखक भी रहा और संजीदा पाठक भी, अपनी पूरी ज़िंदगी की कमाई हमें सौंपकर 98 की उम्र में विदा हो गया। दिलीप कुमार अब हमारे बीच नही हैं। उनकी अभिनीत लगभग 65 फ़िल्में और उन फ़िल्मों के सैकड़ों गाने, किरदार, हमारे पास उनकी स्मृतियों के तौर पर ताउम सुरक्षित रहेंगे। उनकी आत्म कथा ‘दिलीप कुमार: द सब्‍सटेंस एंड द शैडो’ उन पाठकों के लिए उपहार है जो अपनी लगन से किसी भी काम को करते हुए सफल होना चाहते हैं। सफलता का मूलमंत्र है इस किताब में।

    1944 में एक अभिनेता अपनी पहली फ़िल्म 'ज्वार भाटा' से फ़िल्मी दुनिया का सफ़र आरम्भ करता है।  फ़िल्मों में आने का बिना कोई इरादा किये भी फ़िल्मी दुनिया के शिखर पर पहुँचता है। लेकिन इसमें आस पास के लोगों का कितना योगदान होता है ये जानना भी ज़रूरी है। उनका जन्म का नाम यूसुफ़ ख़ान था पर फ़िल्मी परदे का नाम दिलीप कुमार रहा। और यह नाम उन्हीं का दिया हुआ है जिन्होंने उन्हें पहली नौकरी दी। हिंदी सिनेमा की पहली महिला अदाकारा देविका रानी, जिसने दिलीप कुमार को बॉम्बे टाकीज में नौकरी दी थी। शुरुआत में 1250 रुपए महीने से दिलीप कुमार ने शुरुआत की। दिलीप कुमार के पिता फलों के व्यापारी थें और उनका फ़िल्मी दुनिया से दूर दूर तक कोई वास्ता नही था। ऐसे में दिलीप कुमार को भी इससे कोई लेना देना नहीं था। महीने की पगार वाली नौकरी मिल रही थी सिर्फ़ इसलिए बॉम्बे टॉकीज जॉइन कर लिया। उर्दू दुनिया के मशहूर दास्ताँगो महमूद फ़ारूक़ी बताते हैं कि  परिवार में कोई इनके फ़िल्म में काम करने को लेकर कुछ रोक टोक न करे इसके लिए वो किसी बिस्किट की फ़ैक्टरी में काम करने की बात घर में बताते  थे। शाम को लौटते  समय कुछ बिस्किट के पैकेट भी घर ले जाया करते थे जिससे किसी को शक न हो।  अमिया चक्रवर्ती के निर्देशन में बनी फ़िल्म 'ज्वार भाटा' से दिलीप कुमार का फ़िल्मी सफ़र शुरू हुआ। हालाँकि उनकी पाँच फ़िल्में लगातार फ़्लॉप रही।

     
    यूँ बनाई ख़ुद की पहचान

    दिलीप कुमार जिन दिनों फ़िल्मी दुनिया में आए उन दिनों पारसी थिएटर अपने चरम पर था। तेज़ आवाज़ में बोले जाने वाले संवाद, अभिनय का एक ख़ास ढंग आपको सोहराब मोदी और पृथ्वीराज कपूर जैसे अभिनेताओं की एक्टिंग में देखने को मिलता है। ये पारसी थिएटर से ही निकले हुए  लोग थे। दिलीप कुमार को भी ऐसी संगत मिली जहाँ मोतीलाल, कुंदन लाल सहगल, अशोक कुमार, पी सी बरुआ जैसे अभिनेता नैचुरल एक्टिंग की ज़मीन तैयार कर रहे थे।  दिलीप कुमार हिंदुस्तानी सिनेमा में नैचुरल एक्टिंग के जन्मदाता तो नहीं थे लेकिन उन्हें इसे आगे बढ़ने वाले सिपाही के तौर पर ज़रूर जाना जाएगा।

     
    बॉम्बे टाकीज ने बनाया औरों से अलग

    बॉम्बे टाकीज में पढ़े लिखे लेखकों और निर्देशको को शामिल किया जाता था। ऐसे में जब दिलीप कुमार देविका रानी के कहने पर इससे जुड़े तो उन्हें फ़िल्म स्टूडियो के साथ बॉम्बे टाकीज की लाइब्रेरी में होने वाली 5000 किताबें भी सौग़ात में मिली। देविका रानी के पिता के साथ साथ बॉम्बे टाकीज के हिमांशु राय, अशोक कुमार, लीना चिटनिस,  हँसा वाडकर सरीखों की सोहबत भी मिली जो अपने आप में बौद्धिक लोग माने जाते थे।  


    बेहतरीन फ़िल्म लेखकों ने दिलाई दिलीप कुमार को ख़ास पहचान

    यूँ तो अभिनेता अपनी एक्टिंग के बल पर दर्शकों के बीच जाने पहचाने जाते हैं लेकिन उनकी फ़िल्मों के लेखक, पटकथा लेखक, संवाद लेखकों के योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता। दिलीप कुमार के मामले में भी ऐसा ही है। उन्होंने अपने फ़िल्मी कैरियर में 65 के क़रीब फ़िल्में की। और हर बार लगभग नए लोगों के लिखे हुए पर उनका अभिनय दिखता है। ऐसे में लेखक के सामने चुनौती यह भी रही होगी कि एक स्टार अभिनेता  के किरदार को कैसे लिखा जाएगा। 1957 में बनी फ़िल्म 'नया दौर' को जब अख़्तर मिर्ज़ा ने लिखा तो दिलीप कुमार बीआर चोपड़ा के साथ बैठकर उन संवादों की रिहर्सल करते थे। कुछ बदलाव चाहते तो ख़ुद कर देते। इसी फ़िल्म का एक संवाद - "जब अमीर का दिल ख़राब होता है ना तो ग़रीब का दिमाग़ ख़राब हो जाता है" काफ़ी चर्चित हुआ।

    बिमय रॉय की फ़िल्म 'देवदास' को राजेंद्र सिंह बेदी ने लिखा। संवाद हिट  हो गये। 'देवदास' के बारे में सोचते ही बेदी साहब का लिखा संवाद "कौन कमबख़्त है जो बर्दाश्त करने के लिए पीता है, मैं तो पीता हूँ कि साँस ले सकूँ"  दिलीप कुमार की आवाज़ में याद आने लगता है। फ़िल्म मशाल में जावेद अख़्तर ने जो लिखा दिलीप कुमार ने अभिनय से उसमें अलग छाप छोड़ी। एक बानगी देखिये: "हालात, क़िस्मतें, इंसान, ज़िंदगी, वक़्त के साथ साथ सब बदल जाता है।”

    भारत की सबसे चर्चित फ़िल्मों में से एक 'मुग़ल-ए-आज़म' के कई पहलुओं पर बात हो सकती है लेकिन दिलीप कुमार को याद करते हुए के आसिफ़ और अमन की पटकथा और कमाल अमरोही, वजाहत मिर्ज़ा, अहसान रिज़वी के लिखे संवादों पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया जाना चाहिए। पूरी फ़िल्म में शहज़ादे सलीम की भूमिका में दिलीप कुमार के अभिनय की जितनी तारीफ़ की जानी चाहिए उतनी ही फ़िल्म के लेखकों की भी। क्योंकि इन संवादों से ही अभिनेता अपनी ख़ास पहचान के साथ अमर हो गए।

    दिलीप कुमार अपनी अदाकारी के साथ साथ फ़िल्मों के गीतों के लिए भी जाने जाते हैं। ग्रामीण अन्दाज़ में किरदार को जीवंत रूप देने वाले कई किरदार हमारे सामने हैं। फ़िल्म 'दिल दिया दर्द लिया' 1966 का 'दिलरुबा मैंने तेरे में प्यार क्या क्या किया,' फिर 1967 की फ़िल्म  'राम और श्याम' का 'आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले', और फिर 1968 में फ़िल्म संघर्ष का गीत 'मेरे पैरों में कोई घुँघरू बँधा दे, तो फिर मेरी चाल देख ले' ने इतिहास बनाया। ये सभी गीत शकील बदायूँनी ने लिखे थें।

     
    मैथड एक्टर और ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार

    एक अभिनेता परदे पर जितना शालीन दिखता है, उतना उसे निजी ज़िंदगी में भी शालीन होना चाहिए ये दिलीप कुमार के पूरे फ़िल्मी कैरियर से जाना जा सकता है। उनकी फ़िल्मों के किरदारों का अध्ययन किया जाए तो जितनी वैराइटी हमें दिखती हैं उतनी उनकी निजी ज़िंदगी में भी थी। माँ  बाप की सेवा के साथ अपनी पत्नी सायरा की माँ, भतीजा, नानी की सेवा करने के लिए भी उन्हें याद किया जाना चाहिए। एक दर्शक के तौर दुखद क्षण तब भी महसूस होता है जब परदे पर 'मुग़ल-ए-आज़म' देख रहे दर्शक को पता चलता है कि  जिस शहंशाह ने परवर दिगार आलम से इतनी मिन्नतें करके  एक बेटे की माँग की उसी बेटे के किरदार को इतनी शिद्दत से निभाने वाले सलीम बने दिलीप कुमार की अपनी कोई औलाद नहीं है। सायरा बानों के बाद उन्होंने दूसरी शादी भी की लेकिन किन्हीं कारणों से यह रिश्ता भी टूट गया।

    दिलीप कुमार ने  फ़िल्मों में अभिनय करते समय बारीकियों पर ध्यान दिया। शुरुआत की 5 फ़िल्में भले ही फ़्लॉप हुई लेकिन उसके बाद नितिन बोस निर्देशित और सजनीकांता दास के स्क्रीनप्ले (कहानी: रवीन्द्रनाथ टैगोर) से सजी फ़िल्म 'मिलन' (बांग्ला: नोउकाडूबी) सफल रही। इसके बाद  1947 में शौक़त हुसैन रिज़वी के निर्देशन और ख़ादिम मोईद्दीन और ए सुस्मनी की लिखी फ़िल्म 'जुगनू' में सूरज के किरदार से दिलीप कुमार को पहचान मिली। यह पहली सबसे बड़ी हिट फ़िल्म बनी।

    1948 में रमेश सहगल निर्देशित और क़मर जलालाबादी की लिखी फ़िल्म 'शहीद' में स्वतंत्रता सेनानी राम की भूमिका में उन्हें दर्शकों ने ख़ूब प्यार दिया।  इस फ़िल्म में क़मर साहब के लिखे गीत ‘आना है तो आ जाओ’, बचपन की याद, बदनाम न हो जाए और राजा मेहंदी अली खान के लिखे गीत ‘वतन की  राह में’, ‘क़दम उठाकर’ चर्चित हुए थे।

    इसके बाद 1950 में कीदार शर्मा की फ़िल्म 'जोगन', 1951 में नितिन बोस की 'दीदार', जिसे आज़म बाज़िदपुरी ने लिखा, 1954 की  फ़िल्म 'अमर', 1955 की 'देवदास' ने दिलीप कुमार को मैथड एक्टर और ट्रेजेडी किंग के नाम से हिंदी सिनेमा की दुनिया में स्थापित कर दिया।  देवदास का ही एक सीन है जब  देवदास के पिता की मृत्यु हो जाती है और वो एक किनारे बैठे हुए हैं, तब एक व्यक्ति आकर उनसे कुछ पूछता है तो हाथों से ही  किए गए इशारे से वे बहुत कुछ कह जाते हैं। ये वहीं फ़िल्में हैं जिनके बल पर वो बलराज साहनी और गुरुदत्त जैसे अभिनेताओं  से अलग माने जाने लगे थें। इस सबके मुमकिन होने में पटकथा लेखकों का भी हाथ रहा।

    हालाँकि संजीत नार्वेकर से अपनी जीवनी ‘दिलीप कुमार : द लास्‍ट एम्‍परर’ में बात करते हुए दिलीप कुमार ने ख़ुद कहा है - "वह (देवदास) मेरी नसों और ग्रंथियों में समाने लगा था और मेरे अंदर की शांति छिन्न भिन्न होने लगी थी। क्योंकि मुझे ऐसा लगने लगा था कि मेरा जन्‍म ही दु:ख सहते हुए मरने के लिए हुआ है। ‘ इस ‘ट्रैजेडी किंग सिंड्रोम’ से बचने के लिए उन्होंने  लंदन के मशहूर मनोचिकित्सकों  तथा ड्रामा ट्रेनरों से संपर्क किया। उन सबकी सलाह पर उन्होंने हल्के फुल्के और कॉमिक  फ़िल्मों की तरफ रुख किया। 'आज़ाद' (1955) इसी क़िस्म  की एक उल्लेखनीय फ़िल्म  है।

     

    फ़िल्म लेखक के रूप में दिलीप कुमार

    दिलीप साहब बहुमुखी प्रतिभा के धनी थें। उन्होंने 1976 में एक फ़िल्म ‘बैराग’ लिखी जिसमें अबरार अल्वी ने उनकी लेखन में मदद की थी। इस फ़िल्म में अभिनेता के तौर पर काम कर रहे दिलीप साहब का एक संवाद भी काफ़ी चर्चित हुआ था: "प्यार देवताओं का वरदान है जो केवल भाग्यशालियों को मिलता है।" हालाँकि फ़िल्म फ़्लॉप रही और इसी फ़िल्म के बाद उन्होंने लीड रोल वाली फिल्मों से दूरी बना ली। इस फ़िल्म में उन्होंने तीन किरदार एक साथ निभाए थें।

    इसके पहले उन्होंने मित्र नौशाद के कहने पर एक कहानी लिखी थी और अपने पुराने निर्देशक मित्र नितिन बोस को सम्पर्क किया। फ़िल्म के संवाद के लिए मित्र वजाहत मिर्ज़ा को बुलाया जिन्होंने 'मदर इंडिया' और 'मुगल- ए-आज़म' संवाद लिखे थें। सिटीजंस फ़िल्म्ज़ के बैनर तले एक डकैत की ज़िंदगी पर आधारित फ़िल्म ‘गंगा जमुना’ (1961) बनाई। फ़िल्म की सबसे ख़ास बात फ़िल्म का संवाद अवधी में होना है। यह फ़िल्म उन फ़िल्मों के लिए एक आदर्श बनी जिनकी पृष्ठभूमि में डकैत या गाँव के किरदार हैं।

    यह कम ही लोगों को पता है कि दिलीप कुमार ने 1972 में ‘इरु थुरूवम’ नाम की तमिल फ़िल्म की कहानी भी लिखी थी, जिसे ए रामनाथन ने निर्देशित किया था।1992 में  एक और तमिल फ़िल्म अभिरामी को लिखा और निर्देशित भी किया। यह उनके निर्देशन की पहली फ़िल्म मानी जाती है। इसके बाद 1992 में ही एक और तमिल फ़िल्म चिन्ना मैडम की कहानी लिखी और उनसे भी निर्देशित किया। तमिल भाषा में अच्छी पकड़ का एक फ़ायदा ये हुआ कि दिलीप कुमार तमिल फ़िल्मों के एक लेखक,  निर्देशक के तौर पर अपनी अलग पहचान बना पाये। 
     

     

    बारीकियों पर ध्यान और कई भाषाओं पर पकड़

    दिलीप कुमार अपनी एक्टिंग में उन सभी तत्वों पर ख़ास ध्यान देते थें जिससे उस किरदार को परदे पर जीवंत किया जाएँ।  नितिन बोस ने अपनी फ़िल्म 'मिलन' के एक सीन जिसमें अपनी माँ की अस्थियों को गंगा में प्रवाहित करना है, उससे जुड़े उनके जज़्बात लिख कर लाने को कहा। दिलीप कुमार ने पूरी रात जागकर 6 पेज के जज़्बात लिखे भी और फिर बाद में उस सीन को फ़िल्माया गया। उनकी सफलता में बॉम्बे टाकीज में नियमित रूप से चलने वाली फ़िल्म पर चर्चाएँ, तथा उनकी ख़ुद की उर्दू ज़ुबान और साथ ही हिंदी, फ़ारसी, तमिल, गुजराती, बंगाली, मराठी, पश्तो भाषा पर पकड़ का भी अहम योगदान है।  
     

    दिलीप कुमार अभिनय के अलावा भी फ़िल्म निर्माण के सभी पक्षों पर बारीक नज़र और पकड़ रखते थें। इसी कारण उनकी अभिनीत फ़िल्मों में उनका हस्तक्षेप स्वीकार्य होता था। नया दौर में उन्होंने चोपड़ा साहब को कई सुझाव दिए तो महबूब खान की फ़िल्म 'आन' 1957 में तो उन्होंने कैमरामैन फ़रीदुल ईरानी को सलाह दी कि 'इसे 16 mm में शूट कीजिए फिर बाद में ब्लो-अप कीजिएगा।’ जब फ़िल्म लंदन में ब्लो अप के लिए गयी तो काफ़ी चर्चा हुई। उनके कुछ सहकर्मी और आलोचक उन पर दखलअंदाज़ी करने का भी आरोप लगाते थें। बहरहाल, अदाकारी और प्रॉडक्शन में गहरी दिलचस्पी के बावजूद उन्होंने 'गंगा-जमना' के अलावा किसी और फ़िल्म का निर्माण नहीं किया।

    एक और तथ्य महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तान की भी एक फ़िल्म को दिलीप कुमार प्रोड्यूस करना चाहते थे। 1958 में पाकिस्तान में बनी एक फ़िल्म 'आदमी' जिसने पाकिस्तान के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार 'निगार' जीते उसकी कहानी दिलीप कुमार के बड़े भाई अय्यूब सरवार ने लिखी थी। दिलीप इसे ख़ुद प्रोड्यूस करना चाहते थें लेकिन बाद में उनके भाई ने इसे किसी और को दे दिया।
     

    स्टार सिस्टम के अगुवा रहे, स्टूडियो सिस्टम को ख़त्म करने में भी योगदान

    21वीं सदी में जब हम फ़िल्म स्टार, मेगास्टार की बात करते हैं तो हमें एक बार पीछे मुडकर इसके इतिहास को देख लेना चाहिए। हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग देवानंद, राजकपूर और दिलीप कुमार के अभिनय, गीतों और फ़िल्मों की कहानियों के बल पर ही था। लेकिन स्टार सिस्टम के आ जाने से स्टूडियो को सबसे ज़्यादा नुक़सान हुआ। और फिर आगे चलकर फ़िल्म की कहानी और कंटेंट पर भी इसका असर देखने को मिला। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के हालात और फिर भारत पाक का विभाजन भारत में फ़िल्म उद्योग को काफ़ी नुक़सान पहुँचा चुका था। ऐसे में फ़िल्म पर पैसा लगाने  वाले लोग चर्चित और स्टार अभिनेताओं के साथ ही अधिकतर फ़िल्में साइन करना चाहते थें। कंटेंट चाहे जो हो लेकिन एक स्टार अभिनेता का होना अनिवार्य सा चलन था, जो बहुत से अर्थों में आज भी चल रहा है।
     

    परदे से दो दशक से ग़ायब लेकिन दिलों में आज भी

    1944 में 'ज्वार भाटा' से शुरू हुआ दिलीप कुमार का सफ़र 1998 में बनी  फ़िल्म 'क़िला' तक चलता है। लम्बे समय से फ़िल्मी परदे से दूर रहने वाले अभिनेता दिलीप कुमार को लोग उनकी फ़िल्मों और फ़िल्मों के संवादों से याद करते रहे हैं। लेकिन इतना लम्बे समय के बावजूद उन्हें दर्शकों ने यूँ ही नही भुलाया। सोशल मीडिया के दौर में उन्हें उनके चाहने वालों ने बहुत प्यार दिया। एक दिलीप साहब ने एक इंटरव्यू में कहा था: "तकनीकी प्रगति के साथ हम ख़ुद मशीन बन गए हैं। क़ाबिलियत की इज़्ज़त करना शायद भूल गए हैं। ज़रूरत से ज़्यादा पैसा के पीछे भागने की वजह से हमारे सम्बंध सुहाने नहीं रहें। हमारे दौर में फ़िल्में सुकून से बनाई जाती थी क्योंकि हम इसकी जवाबदेही के प्रति जवाबदेह होते होते थें। आज भागते भागते ही लोग फ़िल्म पूरी कर ले रहे हैं।”

     
    भारत-पाक दोनों के दिलीप कुमार

    पाकिस्तान के पेशावर में पैदा हुए दिलीप कुमार को पाकिस्तान आज भी यूसुफ़ ख़ान के नाम से  पुकारता है। पेशावर में फूलो वाली गली में उनका घर आज भी उनकी बचपन की यादों के साथ महकता है। उन यादों को सहेजने के लिए पाकिस्तान सरकार के पुरातत्व विभाग ने उनके घर को संरक्षित करने का आदेश भी जारी किया था। साथ ही  उन्हें निशान-ए-पाकिस्तान की पदवी से भी नवाज़ा है। वहीं भारत में भी दिलीप कुमार को दर्शकों ने सर आँखों पर रखा। भारत सरकार ने पद्म विभूषण भी प्रदान किया। दोनों देशों से ये सम्मान प्राप्त करने वाले वे इकलौते अभिनेता हैं। दोनों देशों के बीच की खाई को पाटने की कोशिश करने वालों में से एक दिलीप कुमार को, भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी पाकिस्तान के साथ वार्ता पर साथ चलने का निमंत्रण भी दिया था।

     

    अलविदा, यूसुफ़ साहब! आप दिलीप बनके हमारी यादों में ताउम्र रहेंगे।

    डॉ. मनीष कुमार जैसल आईटीएम विश्वविद्यालय, ग्वालियर, मध्य प्रदेश, में जनसंचार एवं पत्रकारिता के सहायक प्रोफेसर हैं । नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी नई दिल्ली के बुक फ़ेलो और सहपीडिया यूनेस्को के रिसर्च फ़ेलो भी रह चुके हैं। फ़िल्मकार मुजफ्फर अली पर किताब 'फिल्मों का अंजुमन: मुजफ्फर अली' प्रकाशित। सेंसरशिप और सिनेमा पर पीएचडी। नियमित आलेख और संगोष्ठियों में वाचन। संपर्क: mjaisal2@gmail.com