•  आनंद मुखर्जी
    •  21 July 2021
    •  857

    ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं, फिर भी लिख गए लोकप्रिय भजन!

    साहिर लुधियानवी और राजेन्द्र कृशन के लिखे भजनों पर एक नज़र

    हिंदी फिल्मों में भजन की परंपरा रही है। कई फिल्मी भजन इतने अच्छे बन पड़े हैं कि त्योहारों के मौके पर वे लोगों के घरों मे ही नहीं बल्कि मंदिरों मे भी बजते हैं। आज हम चर्चा करेंगे दो ऐसे गीतकारों की जो ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते थे फिर भी लोकप्रिय भजन लिख गए। इसकी वजह थी अपने काम के प्रति उनकी ईमानदारी। सच है काम के प्रति समर्पण की भावना ही इंसान को सफलता दिलाती है।

    ये दो गीतकार हैं साहिर लुधियानवी और राजेन्द्र कृशन।

    तो पहले बात साहिर की -

    इस शायर का जन्म पंजाब के लुधियाना में 8 मार्च 1921 को हुआ था, एक ज़मींदार परिवार में। साहिर लुधियानवी का असली नाम अब्दुल हई है। उनकी शिक्षा लुधियाना के खालसा हाई स्कूल में हुई। कॉलेज़ के दिनों में ही वे अपनी शेरों-शायरी के लिए मशहूर हो गए थे। सन् 1943 में साहिर लाहौर आ गये और उसी वर्ष उन्होंने अपना पहला कविता संग्रह ‘तल्खियाँ’ छपवाया। वे द्वैमासिक उर्दू पत्रिका ‘सवेरा’ के सम्पादक बने। चूंकि उनके विचार साम्यवादी थे, तो इस पत्रिका में प्रकाशित उनकी किसी एक रचना को सरकार के विरुद्ध समझे जाने के कारण पाकिस्तान सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। सन् 1949 में वे दिल्ली आ गये। कुछ दिनों दिल्ली में रहने के बाद वे बंबई (वर्तमान मुंबई) आ गये जहाँ पर वे उर्दू पत्रिका ‘शाहराह’ और ‘प्रीतलड़ी’ के सम्पादक बने।

    फिल्म ‘आज़ादी की राह पर’ (1949) के लिये उन्होंने पहली बार गीत लिखे किन्तु प्रसिद्धि उन्हें फिल्म ‘नौजवान’, जिसके संगीतकार सचिनदेव बर्मन थे, के लिये लिखे गीतों से मिली।

    प्रस्तुत है साहिर के लिखे दो लोकप्रिय भजन। पहला भजन फिल्म काजल का है जिसके संगीतकार हैं रवि। इस भजन को गाया है आशा भोंसले ने। परदे पर हैं मीना कुमारी। फिल्म में राजकुमार और धर्मेन्द्र भी हैं। काजल के निर्देशक हैं राम माहेश्वरी। यह फिल्म 1965 में आई थी। भजन के बोल हैं-

    तोरा मन दर्पण कहलाये

    भले बुरे सारे कर्मों को,  देखे और दिखाये

    तोरा मन दर्पण कहलाये।

     

    मन ही देवता,  मन ही ईश्वर,  मन से बड़ा न कोय

    मन उजियारा जब जब फैले,  जग उजियारा होय

    इस उजले दर्पण पर प्राणी,  धूल न जमने पाये

    तोरा मन दर्पण कहलाये।

     

    सुख की कलियाँ,  दुख के कांटे,  मन सबका आधार

    मन से कोई बात छुपे ना,  मन के नैन हज़ार

    जग से चाहे भाग ले कोई,  मन से भाग न पाये

    तोरा मन दर्पण कहलाये।

     

    तन की दौलत, जल की छाया, मन का धन अनमोल

    तन के कारण मन की धन को मत मिट्टी में रोल

    मन की कदर भूलाने वाला हीरा जनम गवाये

    तोरा मन दर्पण कहलाये।

    इस गीत में देखा जा सकता है कि किस खूबसूरती से साहिर ने भजन की सिचुएशन का इस्तेमाल फ़िलॉसफ़ी के लिये किया है और बगैर किसी देवी देवता का ज़िक्र किये इंसानिय की बात कह दी। इस तरह उन्होंने भक्ति को नैतिकता से जोड़ दिया।

    साहिर का दूसरा भजन फिल्म ‘नील कमल’ से है। यह फिल्म 1968 में आई थी। इसके भी निर्देशक है राम माहेश्वरी और संगीतकार है रवि। भजन को गाया है आशा भोंसले ने। परदे पर हैं वहीदा रहमान। इस फिल्म में मनोज कुमार, राजकुमार और बलराज साहनी भी है। भजन के बोल हैं-

    हे रोम रोम में बसने वाले राम

    हे रोम रोम में बसने वाले राम

    जगत के स्वामी हे अंतर्यामी

    मै तुझसे क्या मांगू

    मै तुझसे क्या मांगू

    हे रोम रोम में बसने वाले राम।

     

    आस का बंधन तोड़ चुकी हूँ

    तुझपर सब कुछ छोड़ चुकी हूँ

    आस का बंधन तोड़ चुकी हूँ

    तुझपर सब कुछ छोड़ चुकी हूँ

    नाथ मेरे मैं क्यों कुछ सोचूँ

    नाथ मेरे मै क्यों कुछ सोचूँ

    तू जाने तेरा काम

    जगत के स्वामी हे अंतर्यामी

    मैं तुझसे क्या मांगू

    मै तुझसे क्या मांगू

    हे रोम रोम में बसने वाले राम

     

    तेरे चरण की धूल जो पाये

    वह कंकर हीरा हो जाए

    तेरे चरण की धूल जो पाये

    वह कंकर हीरा हो जाए

    भाग मेरे जो मैंने पाया

    इन चरणों में धाम

    जगत के स्वामी हे अंतर्यामी

    मै तुझसे क्या मांगू

    मै तुझसे क्या मांगू

    हे रोम रोम में बसने वाले राम।

     

     

    भेद तेरा कोई क्या पहचाने

    जो तुझसा हो वह तुझे जाने

    भेद तेरा कोई क्या पहचाने

    जो तुझसा हो वह तुझे जाने

    तेरे किये को हम क्या दें  

    तेरे किये को हम क्या दें

    भले बुरे का नाम

    जगत के स्वामी हे अंतर्यामी

    मै तुझसे क्या मांगू

    मै तुझसे क्या मांगू

     

    हे रोम रोम में बसने वाले राम

    जगत के स्वामी हे अंतर्यामी

    मै तुझसे क्या मांगू

    मै तुझसे क्या मांगू

    हे रोम रोम में बसने वाले राम।

    ये भजन पिछले से कितना अलग है, देखिये! इसमें भक्ति का पूरा रस है, जिसमें नायिका प्रभु श्री राम में अपनी अगाध आस्था की बात कह रही है। इसमें ईश्वर सर्वोपरि है, मनुष्य उस पर निर्भर है, जबकि पिछले भजन में मन के आधार पर मनुष्य द्वारा सही और ग़लत के बीच निर्णय करने की बात है। 59 वर्ष की अवस्था में 25 अक्टूबर 1980 को मुंबई मे दिल का दौरा पड़ने से साहिर लुधियानवी का निधन हो गया था।

     

    राजेन्द्र कृशन

    राजेन्द्र कृशन महज गीतकार नहीं थे। उन्होंने कई फिल्मों में पटकथा और संवाद भी लिखे। उनका जन्म 6 जून 1919 को जलालपुर में हुआ था। विभाजन के बाद यह क्षेत्र पाकिस्तान में चला गया है। जब राजेन्द्र कृशन आठवीं कक्षा में थे तब ही से उन्हें लिखने का शौक जागा। 1940 में वे भारत आ गाए और लगभग दो साल तक शिमला में बतौर म्यूनिसिपल क्लर्क काम किया। बाद में वे मुंबई आ गए। उन्हें 1947 में फिल्म ‘जनता’ में स्कीनप्ले लिखने का मौका मिला।

    1947 में ही राजेन्द्र कृशन को गीत लिखने का भी मौका मिला। फिल्म थी ‘जंज़ीर’। 1948 में फिल्म आज की रात के लिए उन्होंने स्क्रिप्ट के साथ गीत भी लिखे। फिल्म के मुख्य कलाकार थे सुरैया और मोतीलाल। अपने समय के सभी बड़े संगीतकारों के लिए राजेन्द्र कृशन ने गीत लिखे। लगभग सभी बड़े बैनर के साथ राजेन्द्र कृशन ने काम किया।

    प्रस्तुत हैं ईश्वर के अस्तित्व को नकारने वाले इस गीतकार के लिखे दो भजन। पहला भजन फिल्म ‘खानदान’ से। यह फिल्म 1965 में रिलीज़ हुई थी। भजन के बोल हैं-

     

    बड़ी देर भई नंदलाला

    तेरी राह तके बृजबाला।

     

    ग्वाल-बाल इक-इक से पूछे

    कहाँ है मुरली वाला रे

    बड़ी देर भई नंदलाला

    तेरी राह तके बृजबाला।

     

    कोई ना जाए कुञ्ज गलिन में

    तुझ बिन कलियाँ चुनने को

    तरस रहे हैं…

    तरस रहे हैं जमुना के तट

    धुन मुरली की सुनने को

    अब तो दरस दिखा दे नटखट

    क्यों दुविधा में डाला रे

    बड़ी देर भई नंदलाला

    तेरी राह तके बृजबाला।

     

    संकट में है आज वो धरती

    जिस पर तूने जनम लिया

    जिस पर तूने जनम लिया

    पूरा कर दे...

    पूरा कर दे आज वचन वो

    गीता में जो तूने दिया

    कोई नहीं है तुझ बिन मोहन

    भारत का रखवाला रे

    बड़ी देर भई नंदलाला

    तेरी राह तके बृजबाला।

     

    ग्वाल-बाल इक-इक से पूछे

    कहाँ है मुरली वाला रे

    बड़ी देर भई नंदलाला

    तेरी राह तके बृजबाला

    बड़ी देर भई नंदलाला

    तेरी राह तके बृजबाला।

     

    इस भजन को गाया है मोहम्मद रफ़ी ने। संगीतकार हैं रवि। परदे पर हैं सुनील दत्त।

    दूसरा भजन फिल्म ‘मालिक’ से है। यह फिल्म 1973 में आई थी। इस गाने को परदे पर राजेश खन्ना गा रहे हैं। बोल हैं-

     

    कन्हैया कन्हैया

    कन्हैया कन्हैया तुझे आना पड़ेगा आना पड़ेगा

    वचन गीता वाला निभाना पड़ेगा।

     

    गोकुल में आया, मथुरा में आया

    छवि प्यारी प्यारी कहीं तो दिखा

    अरे सांवरे देख आ के ज़रा

    सूनी सूनी पड़ी है तेरी द्वारिका

    कन्हैया कन्हैया तुझे आना पड़ेगा।

     

    जमुना के पानी में हलचल नहीं

    मधुबन में पहला सा जलथल नहीं

    वही कुंज गलियाँ वही गोपियां

    छनकती मगर कोई झान्झर नहीं

    कन्हैया कन्हैया तुझे आना पड़ेगा।

     

    कोई तेरी गैयाँ का वाली नहीं

    अमानत यह तेरी संभली नहीं

    कई कंस भारत में पैदा हुए

    कपट से कोई घर खाली नहीं

    कन्हैया कन्हैया तुझे आना पड़ेगा।

     

    दोनों ही गीत कृष्ण भक्ति की मिसाल हैं! पहले में बृजबाला का पॉइंट ऑफ़ व्यू है और दूसरे में कृष्ण में आस्था को राष्ट्रीय चरित्र की तरह रखा गया है। ये बात समान है कि दोनों में ही कृष्ण का इंतज़ार है। कहा जा साकता है कि ये एक जागरूक गीतकार का सामाजिक चेतना के लिये इंतज़ार भी है। 23 सितंबर 1987 को मुंबई मे राजेंद्र कृशन का निधन हो गया।

    ये बताने की आवश्यकता नहीं है कि साहिर और राजेन्द्र कृशन, दोनों गीतकार अपने समय मे बेहद लोकप्रिय रहे हैं। उस दौर के बहुत से अन्य लेखकों की तरह ये दोनों गीतकार भी कम्युनिस्ट, या कहें सोशलिस्ट, विचारधारा के माननेवाले थे। लेकिन जैसा कि हमने ऊपर देखा, कि जब भजन लिखने की बारी आती थी तो वे उसे भी पूरी श्रद्धा और शिद्दत से लिखते थे। ऐसा करने में ना उनकी निजी सोच आड़े आती थी, ना ही पृष्ठभूमि। बल्कि वे किसी भी और से ज़्यादा भारतीय जनमानस के भक्ति भाव को समझ सकते थे। इनके लिखे गीत शब्द चयन और क्राफ़्ट की दृष्टि से अपने आप में लिरिक्स राइटिंग का पठ्यक्रम हैं। लेकिन उसके भी ऊपर है उनका सकारात्मक दर्शन और भारतीयता की समझ। 

    यह भी खबर है कि कई बार निर्माताओं ने इन दोनों ही गीतकारों को सिर्फ़ भजन लिखने के लिए ही किसी ऐसे गीतकार की सेवा लेने का विकल्प भी दिया जो ईश्वर में आस्था रखता हो, लेकिन इन्होंने इस सुझाव को मानने से इनकार कर दिया था। दोनों ही मानते थे कि गीतकार को हर मौके के गीत लिखने को तैयार रहना चाहिए। हमने यहाँ इन्हीं दो गीतकारों की चर्चा की है, हालांकि और भी गीतकार और शायर हैं जिन्होंने बड़े लोकप्रिय भजन लिखे हैं और जिनके लिये कहा जा सकता है कि उनकी निजी आस्था उनके लिखे भजन की भावना से अलग हो सकती है।

    यही खूबसूरती है इस देश की और ख़ास तौर पर फ़िल्म इंडस्ट्री की, कि यहां अनेकों आस्थायें हैं, सोच हैं, जीवन पद्धतियां है लेकिन उनके बीच ना सिर्फ सौहार्द है बल्कि एक दूसरे को लेकर जानकारी, समझ और सम्मान की भावना भी है। अनेकता में एकता शायद इसे ही कहते हैं।  

    आनंद मुखर्जी स्तंभकार और पत्रकार रहे हैं। पहली लघुकथा टाइम्स ग्रुप की सारिका में सन 1979 में छपी। एक्सप्रेस ग्रुप से प्रकाशित मशहूर फिल्म साप्ताहिक स्क्रीन का हिन्दी संस्करण शुरू किया। एक्सप्रेस ग्रुप के बाद रिलायंस कम्यूनिकेशन के कंटेन्ट विभाग में लगभग 12 वर्ष तक कार्य किया। गीतों और गीतकारों में विशेष रुचि। संपर्क: anand.mukherjee07@gmail.com