•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  18 June 2021
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    “मैंने आईसीयू में बैठकर ‘विकी डोनर’ लिखी थी।”  

    अजय ब्रह्मात्मज के सवाल, लेखकों के जवाब: जूही चतुर्वेदी (भाग 1)

    जूही चतुर्वेदी ने शुजित सरकार की फिल्म ‘शूबाइट’ के संवाद लेखन से फिल्म लेखन की शुरुआत की। शुजित सरकार के साथ ही ‘विकी डोनर’, ‘पीकू’, ’अक्टूबर’ और ‘गुलाबो सिताबो’ लिखते हुए उन्होंने निर्देशक-लेखक की सृजनात्मक जोड़ी बनायी। उनकी फिल्मों के विषय अप्रचलित कथाभूमियों से लिए गए हैं, इसलिए उनके चरित्र अनोखे और अविस्मरणीय होते हैं।

    जन्म स्थान

    लखनऊ, उत्तर प्रदेश।

     

    जन्मतिथि

    3 जनवरी।

     

    शिक्षा-दीक्षा

    लखनऊ में हुई। मैं लखनऊ विश्वविद्यालय के आर्ट कॉलेज में थी। यूपी में वह एक बेहतरीन कॉलेज है। वहीं से फाइन आर्ट्स में ग्रेजुएशन किया।

    शुरुआत कैसे हुई?

    1996 में मेरी नौकरी एडवर्टाइजिंग एजेंसी में लग गई। उसकी वजह से मैं दिल्ली आ गई। मेरा काम मुख्य रूप से ड्राइंग-पेंटिंग आदि का था। फिर, 1999 में मैं मुंबई आ गई। ओगिल्वी कंपनी में काम करती थी। कुछ समय के बाद मैंने ऐड वगैरह लिखना शुरू किया। वही मेरी मुलाकात शुजित सरकार से हुई। शुजित सरकार ‘शूबाइट’ फिल्म के लिए डायलॉग राइटर खोज रहे थे। काफी लोगों से वे मिल चुके थे। उन्होंने मुझे मौका दिया कि तुम भी कोशिश कर के देखो। ऐड लिखने में भी आज़ादी रहती है, लेकिन वहां फिर क्लाइंट की जरूरतों को समझना पड़ता है। फिल्म के लिए संवाद लिखने पर पता चला कि यह लेखन काफी अलग और रोचक है। मुझे लगा कि कितनी बातें आप सोच सकते हैं, लिख सकते हैं, लोगों से शेयर कर सकते हैं। मैं ‘शूबाइट’ की शूटिंग पर भी गई थी। शूटिंग पूरी हो गई तो मैं आकर फिर से नौकरी करने लगी। वहां से लौटने के बाद लगने लगा था कि अब ऐड के अलावा कुछ और भी करना चाहिए। उसके डेढ़ साल के बाद ‘विकी डोनर’ का आइडिया आया। तब मैंने अपनी नौकरी नहीं छोड़ी थी। आशंका थी मन में कि पता नहीं लिख पाएंगे कि नहीं लिख पाएंगे? आइडिया पसंद आ जाना, उस पर लिखना एक बात है, लेकिन उस पर फिल्म बन जाना बहुत बड़ी बात है। उस समय मुझ में जरा भी कॉन्फिडेंस नहीं था कि यह हो पाएगा। ‘विकी डोनर’ हो गई और उसके बाद ‘पीकू’ भी हो गई। तब लगा कि नौकरी छोड़ी जा सकती है।

    लेखन का प्रशिक्षण और अभ्यास?

    मैंने कोई प्रशिक्षण नहीं लिया है। एडवर्टाइजिंग के दौर में ही लिखना सीखा। पीयूष पांडे हमारे बॉस थे। वहां एक माहौल था। मैं भले ही आर्ट डायरेक्टर थी, पर कॉपीराइटर के साथ बैठती थी। यह समझ में आता था कि जो सोच रहे हैं, उसे लिखी गई पंक्ति कह पा रही है कि नहीं? नहीं तो ज्यादा सटीक शब्द इस्तेमाल किया जाए। लखनऊ में रहने और पढ़ाई-लिखाई की वजह से भाषा पर पकड़ थी। इसका एहसास नहीं था, क्योंकि कभी उसकी जरूरत भी पड़ी। एडवर्टाइजिंग में उसे तराशने का मौका मिल गया। आइडिया की तो कमी नहीं थी। खुराफ़ाती दिमाग तो था ही। एडवर्टाइजिंग में यह माहौल भी होता है कि... और बढ़िया सोचो, और कुछ सोचो। मौलिक और नया सोचने की चुनौती हमेशा रहती थी। एडवर्टाइजिंग की दुनिया बहुत छोटी है। हमें पता रहता था कि कौन क्या कर रहा है और इंटरनैशनली क्या हो रहा है। बहुत ज़्यादा दबाव रहता है कि आपको सोचना है और अच्छा ही सोचना है। उस माहौल से मुझ पर बहुत फर्क पड़ा फिल्म लिखने के लिए। लिखने की तो कभी कोई ट्रेनिंग नहीं ली और ना कभी सोचा था कि मैं हिंदी फिल्मों में लिखने आऊंगी। वरुण ग्रोवर ने एक बार बहुत सही बात कही थी कि पिछली सदी के आखिरी दशक में जैसी फिल्में बन रही थीं, उन्हें देखकर लग रहा था कि क्या हम ऐसी कभी फिल्में लिख पाएंगे? हम ऐसी दुनिया से भी नहीं आ रहे थे, जहां हमने बहुत सारा विश्व सिनेमा देखा हो या कला फिल्में देखी हो। घर में फिल्मों का वातावरण भी नहीं था। औसत मध्यमवर्गीय परिवार था। ऐसा नहीं था कि पिक्चर हॉल में कोई भी फिल्म लग गई है तो जाकर देख आओ। यह सोच थी कि पिक्चर बनाने वाले तो पिक्चर बनाते रहते हैं और फिल्में लगती रहती है। इसका मतलब यह थोड़ी है कि हर फिल्म जाकर देख आओ। तब हम सोच ही नहीं पाते थे कि फ़िल्में देखनी हैं और हमें बुरा भी नहीं लगता था कि फिल्में नहीं देख पा रहे हैं। यह ख्याल ही नहीं आता था। हमारे लिए यही नॉर्मल था। घर में जो फिल्में आती थी वे देखने दी जाती थी। कई बार टीवी के सामने से हटा भी दिया जाता था। मेरे परिवार में बातें बहुत अच्छी होती थी। मेरे दादाजी शिक्षा विभाग में थे। मेरे पिता स्वयं इतिहास के प्राध्यापक थे बीएचयू में। घर में बातों का माहौल बहुत अच्छा था। मुझे लगता है कि मेरी नींव वहीँ पड़ी।

     

    कहानी लिखने का विचार कैसे आया? पहली कहानी कब लिखी थी? वह कहीं छपी थी या कोई और उपयोग हुआ था?

     

    मैंने ऐड लेखन से शुरुआत की। प्रशिक्षण तो बिल्कुल नहीं लिया था। अब लगता है कि राइटिंग मेरी अच्छी रही होगी, क्योंकि मुझे नंबर अच्छे आ जाते थे। 75% नंबर मिल जाते थे। तब यूपी बोर्ड की मार्किंग बहुत स्ट्रिक्ट हुआ करती थी। गद्य संकलन, पद्य संकलन, काव्यांजलि, पुष्पांजलि यह सब हमारे पाठ्यक्रम में था। स्कूल की मैगजीन तक में मेरी कोई कहानी नहीं छपी। मुझे ड्रॉइंग में हमेशा फर्स्ट प्राइज और सेकंड प्राइज मिला। मुझे लगता था कि ड्रॉइंग ही सब कुछ है। ऐसा होता भी है, जिसमें आप बेहतर प्रदर्शन करते हैं। उसमें ज़्यादा मन लगता है। यह लालसा ही रह गई कि स्कूल की मैगजीन में कभी छप जायें। मेरी कहानियां हमेशा रिजेक्ट हो गईं।

     

    आरंभिक दिनों में किस लेखक ने प्रभावित लिया? कोई कहानी या रचना, जिसका जबरदस्त असर रहा?

    स्कूल के दिनों में रामधारी सिंह दिनकर, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा आदि को पढ़ा था। वे हमारे पाठ्यक्रम में थे और उनकी कुछ किताबें घर पर भी थीं। परिचय तो पाठ्यक्रम से ही हुआ लेकिन रुचि बढ़ गई। फिर भी मेरा ज्यादा समय ड्रॉइंग में ही जाता था। ‘ईदगाह’ की दादी और हामिद आज भी याद हैं। उसका बहुत गहरा असर रहा। उन कहानियों के पढ़ने के बाद बहुत ही मुश्किल है कि कोई व्यक्ति अपनी हवाई कल्पनाओं में रह पाए।

     

    आपका पहला लेखन जिस पर कोई फिल्म, टीवी शो या कोई और कार्यक्रम बना हो?

    ‘शूबाइट’ के संवाद लिखे थे मैंने। ‘विकी डोनर’ को मैं अपना पहला लेखन कह सकती हूं। इस फिल्म की कहानी, पटकथा और संवाद तीनों मेंने लिखे थे।

     

    पहली फिल्म या नाटक या कोई शो, जिसकी कहानी ने सम्मोहित कर लिया?

    किसी एक फिल्म का नाम नहीं लूंगी। दूरदर्शन पर दोपहर में क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में आती थी। उन्हें सबटाइटल में देखते थे और ज़्यादा समझ नहीं पाते थे। उन्हें देखकर जो इमोशन पैदा हुआ वह याद रहेगा। बाद में उन्हें खोज कर मैंने देखा। उनमें कुछ सत्यजीत राय की फिल्में थीं। विमल राय की ‘बंदिनी’, ‘दो बीघा जमीन’ जैसी फिल्में याद रहीं। शुक्रवार की रात में भी फिल्में आती थी। उनमें ‘बाइसिकल थीव्स’ ‘डॉक्टर जिवागो’ जैसी फ़िल्में देखीं।

     

    हम लोग तो ज़्यादातर टीवी पर ही फिल्में देखते थे और कोई तरीका नहीं था। उस समय जो फिल्में अच्छी लगी थीं, ज़रूरी नहीं कि आज भी अच्छी लगे। उन दिनों में फिल्म देखना प्योर इमोशन होता है। तब बहुत क्रिटिकली हम फिल्में नहीं देखते हैं। बचपन में कुछ फ़िल्में इतना भावुक कर देती थीं, जैसे ‘दो बीघा जमीन’ या ‘दो आंखें बारह हाथ’ या ‘एक डॉक्टर की मौत’... मैंने ये सारी फिल्में टीवी पर ही देखी। कई बार रविवार शाम को भी फिल्में आती थी। मुझे याद है कि ऐसी फिल्में देखने के बाद अपने कमरे में जाकर थोड़ी देर संतुलित होने में लगता था। अगले दिन स्कूल का बैग पैक करने में समय लग जाता था फिर।

     

    चरित्र गढ़ने की प्रक्रिया पर कुछ बताएं। ज़िन्दगी के कैसे अनुभवों से आप के चरित्र बनते और प्रभावित होते हैं?

    हम लखनऊ में रहे। जिस तरह के लोग हमारे पास रहे, उनसे ही मिलना-जुलना हुआ। उनमें हर तरह के लोग रहे। ऐसा नहीं था कि सिर्फ दादा जी के दायरे में जो लोग हैं, उन्हीं से संपर्क रहा। हमारे रिक्शाचालक रामखेलावन से भी वैसा ही गहरा संपर्क रहा। उनके साथ भी वैसा ही अपनापन रहा। हमारे व्यवहार में कभी ऐसा नहीं आया कि वह मुलाजिम हैं। मेरे परिवार में ऐसा फ़र्क रखा ही नहीं गया था। इसकी वजह से बहुत सारी चीज़ों को हम लोग महसूस कर पाए। हम उनकी तकलीफें और मुश्किलें भी जानते थे। वे जब छुट्टियों में गांव जाते थे तो अपना रिक्शा मेरे यहां ही रख जाते थे। आश्वस्त रहते थे कि उनका रिक्शा सुरक्षित रहेगा। हर तबके के लोगों से मिलने-जुलने में भरोसा और सच्चाई थी। मेरा अनुभव रहा है कि हर व्यक्ति अपने स्तर पर सच्चा होता है और कुछ ना कुछ अच्छा करना चाहता है। मैं तो अपने माता-पिता की शुक्रगुज़ार हूं कि मुझे ऐसा संस्कार मिला और ऐसे लोग मिले। सभी के प्रति अच्छी सोच के साथ समान व्यवहार। मैंने तो देखा है कि रिक्शावाले को ₹5 के बदले ₹4 कोई दे तो भी वह ले लेता है। कुछ भी बुरा-भला नहीं कहता है। उसे यकीन रहता है कि शायद इतने ही पैसे आपके पास है। कुछ अधिक चाहने की आदत ही नहीं पड़ी हमारी। यही कारण है कि मेरी फिल्मों के पात्र बहुत नेगेटिव या गाली-गलौज करने वाले नहीं होते हैं। ऐसा नहीं है कि उत्तर प्रदेश में ऐसा माहौल नहीं है लेकिन मैं उन्हें नहीं ला पाती। ऐसा कुछ लिखने के पहले मेरे लिए यह जानना ज़रूरी होगा कि ऐसा क्या होता है कि कोई व्यक्ति अपराध कर बैठता है? किसी का ख़ून कर बैठता है? उस जज़्बात को समझे बिना मैं वैसे किरदार लिख नहीं पाऊंगी। मेरे लिए ऐसे चरित्र लिखना सामान्य बात नहीं होगी। मुझे तो लगता है कि जो अपराध और हत्याएं करता है, उसके लिए भी वह सामान्य बात नहीं होती होगी। मेरे चरित्र अपने अनुभव की सच्चाइयों से आते हैं।

     

    क्या आप अपने चरित्रों की जीवनी भी लिखती हैं?

    लिखने के पहले मैं बहुत वक्त लेती हूं। मैंने तो सोच-सोच के अपने बाल सफेद कर दिए हैं। पीकू, भास्कर और राणा सही में तो अस्तित्व नहीं रखते, लेकिन फिर भी मुझे इनके बारे में सब कुछ पता होना चाहिए। पीकू कोलकाता में कितने साल रही? फिर दिल्ली कब आई। दिल्ली के किस स्कूल में पढ़ी होगी? अपनी मां के साथ उसके कैसे संबंध रहे होंगे? मां से कैसी बतचीत होती होगी? पर्दे पर यह सब नहीं आता है, लेकिन मुझे पता होना चाहिए। किरदार के बारे में मुझे सब कुछ पता होना चाहिए। उसकी सारी पॉलिटिक्स पता होनी चाहिए। मैं तो अपने किरदारों के साज-शृंगार भी जानती हूं, जैसे पीकू काजल लगाती है कि नहीं लगाती है? लिखने से पहले हर चरित्र की एक इमेज हमारे सामने रहती है और उसी के अनुसार हम उसका चित्रण करते हैं। मेरे लिए जरूरी है यह जानना कि मेरे चरित्र का समाज के साथ क्या रिश्ता है? अपने आसपास के लोगों से उसे कैसे अनुभव मिले हैं? चरित्रों के मुंह से वही निकलेगा जो उन्होंने देखा है, सुना है, पढ़ा है, समझा है। संवाद लिखना तो आखिरी चरण है। वह तो टाइपिंग का काम है। मेरे लिए सबसे जरूरी अपने चरित्र का कच्चा चिट्ठा। उसकी पूरी जन्मपत्री में तैयार कर लेती हूं।

     

    क्या अपने चरित्रों के साथ आपका इमोशनल रिश्ता बनता है?

    बिल्कुल बनता है। इनके साथ इतना लंबा समय बीतता है। आपके सामान्य जीवन में काल्पनिक चरित्र प्रवेश कर जाते हैं। आप उनके बारे में लगातार सोचते रहते हैं। फिर आपके लिए तो वह हाड़-मांस के जीव हो जाते हैं। लेखक के लिए तो उनके चरित्र जीते-जागते जीव हो जाते हैं। उन चरित्रों में एक्टर और डायरेक्टर अपनी जान उड़ेल देते हैं। लिखाई में जो कमी रह जाती है, उसको भी ये लोग पूरी कर देते हैं। फिल्म के समाप्त होने के साथ किरदारों से रिश्ता रैपअप नहीं होता। ‘अक्टूबर’ लिखने के बाद डैन के जरिए मुझे जिंदगी की बहुत सारी चीज़ें पता चलीं। ‘पीकू’ और ‘गुलाबो सिताबो’ लिखने के पहले जो मैं थी, वह लिखने के बाद नहीं रही। ये किरदार हमारे अंदर से कुछ चीजें कुरेद कर लाते हैं, जो हमें पहले से नहीं मालूम होता कि हमारे अंदर है। रोज़मर्रा की जिंदगी में हमारे पास कहां फुर्सत है कि हम उन स्थितियों, परिस्थितियों और चरित्रों के बारे में सोच सकें?

     

    क्या कभी आप के चरित्र ख़ुद ही बोलने लगते हैं?

    बिल्कुल, कई बार ऐसा होता है कि मैं कुछ लिखना चाहती हूं और किरदार मुझ से बोलता है कि क्या गलत लिख रही हो? वह लिखने ही नहीं देता। वह कहता है कि हटाओ इसको, डिलीट करो। मैं तो ऐसा सोचता ही नहीं जो तुम लिख रही हो। अपने किरदारों से ऐसी नोकझोंक मुझे पसंद आती है।

     

    क्या किरदारों की भाषा अलग-अलग होनी चाहिए?

    भाषा इंसान की और फिल्मों में किरदार की बहुत बड़ी पहचान होती है। अगर उनकी भाषाएं अलग नहीं होंगी तो बहुत ही सिंथेटिक प्रभाव होगा। कुछ-कुछ किसी कंज्यूमर प्रोडक्ट की तरह सब एक ही जैसा हो जायेगा। सब के अनुभव अलग हैं, इसलिए उनकी भाषा अलग है। ‘गुलाबो सिताबो’ में बांके और मिर्जा की भाषा उनके अनुभवों की वजह से अलग अलग है।

     

    संवाद लिखना कितना आसान या मुश्किल होता है? 

    अगर अपने किरदारों को समय नहीं दिया हो तो संवाद लिखना मुश्किल होता है। फिर शब्दों के सहारे काम चलाना पड़ता है। अगर किरदारों से अच्छी जान पहचान है तो फिर आप उनकी सोच को संवादों में लिखते हैं। आप गौर करें तो मेरे किरदारों के संवादों में कोई दोहराव नहीं मिलेगा। मेरे किरदार मेरे भरोसे नहीं बोलते वह अपनी ही भाषा बोलते हैं।

     

    क्या लेखक भी अपने किसी किरदार में होता है?

    बिल्कुल होता है। जो हमारी सोच है, जो हमारे विचार हैं, वही हमारे किरदारों के द्वारा फिल्मों में आते हैं। किरदारों में कहीं-कहीं अपनी सोच हम डाल देते हैं। ‘पीकू’ में भास्कर शादी के बारे में जो मंतव्य देते हैं, वह मेरे अंदर से ही आया। कह सकते हैं कि मेरे किरदार ने मुझसे लिखवाया। कई बार लिखने के बाद खुशी होती है कि अरे वाह मैंने क्या लिख दिया? ’अक्टूबर’ में डैन के बोले संवाद मेरे जीवन के अनुभव के हैं। मैंने मां के साथ अस्पताल में काफी समय बिताया है। वेंटिलेटर कई बार धक्का देने का काम करता है... जैसे कि कई बार मोटरसाइकिल स्टार्ट नहीं होती तो आप उसे धक्का दिलवाते हैं और वह स्टार्ट हो जाती है। वेंटिलेटर वही धक्का देना है।

     

    दिन के किस समय लिखना सबसे ज़्यादा पसंद है? कोई ख़ास जगह घर में फिल्म लिखने के लिए कभी शहर भी छोड़ा है?

    कोई रूटीन नहीं है। आजकल तो बिल्कुल ही नहीं है। लेखन का अनुशासन लाने में मुझे थोड़ा वक्त लगा है। जॉब में तो एक रूटीन था। उठते थे, खाते-पीते थे, ऑफिस चले जाते थे। जॉब छोड़ने के बाद दिन का कुछ समय प्रोडक्टिव बनाने में मुझे समय लगा। मैंने महसूस किया है कि अच्छा लेखन रात में दो-तीन बजे निकलता है। फिर यह भी निर्भर करता की कहानी कितनी आगे बढ़ी है। शुरू की है तो कुछ समय मैं दिन में ही लिखती हूं। रवानी आ जाने के बाद दिन और रात का फर्क नहीं रहता। ज़्यादातर मैं अपने कमरे में बैठकर ही लिखती हूं। लिखने के लिए मेरा कोई हाई मेंटेनेंस नहीं है। लिखने के लिए कभी बाहर नहीं जाना पड़ा। हां, ‘विकी डोनर’ मैंने आईसीयू में बैठकर लिखा है। मेरी मां आईसीयू में भर्ती थी और ‘विकी डोनर’ जैसी हंसी-मज़ाक से भरी फिल्म मैंने उस माहौल में लिखी। मुझे नहीं लगता कि मैं होटल के कमरे में बैठकर या पहाड़ों पर जाकर लिख सकती हूं। रोज़मर्रा की जि़ंदगी की घपड़चौथ में ही मैं बैठकर लिख सकती हूं। मुझे नहीं लगता कि मैं कहीं शांति से बैठ कर लिख सकती हूं।

     

    कभी राइटर ब्लॉक से गुज़रना पड़ा? ऐसी हालत में क्या करती हैं?

    राइटर ब्लॉक कई बार होता है। वैसा होने पर तो लैपटॉप देखने में भी डर लगता है। मन में अपराध बोध भी होता है कि हमें लिखना है और हम लिख नहीं पा रहे हैं। धीरे-धीरे अब यह समझ में आ रहा है कि आज नहीं आया, कल नहीं आया तो दस-पंद्रह दिनों में आ जाएगा... लेकिन आ ही जाएगा। पहले मैं परेशान हो जाती थी कि देखो अटक गए। अटकना मुझे लेखन प्रक्रिया का हिस्सा लगता है। ऐसा नहीं है कि मैं केवल लिखती ही हूं। मेरे पास समय बिताने और एंटरटेनमेंट के और भी साधन है। खाना बना लेती हूं, बच्चे को बहला लेती हूं या अपने कुत्ते को नहला देती हूं। कई बार पुराने दोस्तों से बात करती हूं। इतना ज़रूर हुआ है कि रोज़ सवेरे साढ़े दस बजे मैं अपना लैपटॉप खोलकर ज़रूर बैठ जाती हूं। लिखना हो या नहीं लिखना हो। हो सकता है दो-तीन दिन कुछ ना लिख पाऊं, लेकिन चौथे दिन जरूर कुछ ना कुछ आ ही जाएगा।

     

    (शेष ‘भाग दो’ में)

    अजय ब्रह्मात्मज जाने-माने फिल्म पत्रकार हैं। पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।