•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  02 July 2021
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    अच्छे एक्टर आपकी लिखी पंक्तियों से जादू पैदा कर देते हैं!

    अजय ब्रह्मात्मज के सवाल, लेखकों के जवाब: जूही चतुर्वेदी (भाग 2)

    जूही चतुर्वेदी ने शुजित सरकार की फिल्म ‘शूबाइट’ के संवाद लेखन से फिल्म लेखन की शुरुआत की। शुजित सरकार के साथ ही ‘विकी डोनर’, ‘पीकू’, ’अक्टूबर’ और ‘गुलाबो सिताबो’ लिखते हुए उन्होंने निर्देशक-लेखक की सृजनात्मक जोड़ी बनायी। उनकी फिल्मों के विषय अप्रचलित कथाभूमियों से लिए गए हैं, इसलिए उनके चरित्र अनोखे और अविस्मरणीय होते हैं। उनसे बात हुई तो होती चली गयी। इसिलिये दो हिस्से किये। इस इंटरव्यू ने संतुष्ट किया। ये भाग दो है।  भाग 1 पढ़ने के लिये यहां क्लिक करें।

    लेखकों के बारे में कौन सी धारणा बिल्कुल ग़लत है?

    यह कि क्रिएटिव लोग हैं तो कुछ भी करते होंगे। अजीब सी जीवनशैली होगी। ऐसा कुछ नहीं होता। लेखकों की भी ज़िंदगी बेहद नियमित होती है। दिन का काफी समय मेरा सोशल स्टडीज, मैथ, इंग्लिश, साइंस करवाने में निकलता है। यही मेरी सच्चाई है। मुझे अपने पिताजी का बीपी भी चेक करना होता है। लेखक अलग और अजूबे लोग नहीं होते हैं। मैं तो जानती हूं कि हिमांशु हों या वरुण (ग्रोवर) हों... सब बड़े नॉर्मल लोग हैं। हमारे पैर ज़मीन पर टिके हुए हैं। वरुण तो बोरीवली से ट्रेन लेकर चर्चगेट चला जाता है। वह ऐसा ही है। इतना सामान्य है।

     

    लेखक होने का सबसे बड़ा लाभ क्या है?

    आप हमेशा अपनी दुनिया में रह सकते हैं और किसी को पता भी नहीं चलेगा। हमारे दिमाग के अंदर एक समानांतर दुनिया चल रही  होती है। उसमें किसी और व्यक्ति का कोई दखल नहीं है। हम अपनी दुनिया रचते रहते हैं। हर तरह की सोच रखते हैं। हम अकेले बैठे खुद को एंटरटेन कर सकते हैं। हमें किसी की ज़रूरत भी नहीं होती है। हम कभी अकेले होते ही नहीं हमारे साथ बहुत सारे किरदार चल रहे होते हैं।

     

    कहते हैं लेखन एकाकी काम है। आपका अनुभव बतायें।

    एकाकी इसलिए है कि आपके जीवन के जो बाकी काम हैं, उनसे अलग होना पड़ता है। आप अपने आप अपने खोमचे में बैठकर अंधेरा कर लैपटॉप निकालकर अपने लेखन में रम जाते हैं। कई दिनों तक आप लोगों से, अपने दोस्तों से नहीं मिल पाते हैं। ख़ुद को लोगों से तो काटना ही पड़ता है। कई बार ऐसा होता है कि हम रातों को सो नहीं पाते। चेहरे पर हवाइयां उड़ रही होती हैं। आपको इस प्रक्रिया से गुज़रना ही पड़ता है। वही इसकी जरूरत भी होती है। लेखन में शारीरिक, मानसिक और इमोशनल निवेश होता है। आप हंसते-खेलते लेखन नहीं कर सकते। अगर आप ऐसा करेंगे तो वह दिख जाएगा। आपको देना ही पड़ता है। मुझे नहीं मालूम कि और कोई तरीका होता है क्या? ऐसे समय में आप ख़ुद को अकेला महसूस करते हैं। आपको लग सकता है कि बाकी सब मज़े कर रहे हैं। सब दीवाली की पार्टी कर रहा हैं और मैं यहां बैठ कर लिख रही हूं। इन दिनों राइटर्स रूम होता है तो वहां मिल बैठकर आप लिखते हैं, लेकिन वहां भी सभी अपना-अपना लैपटॉप लेकर अकेले ही लिखते हैं।

     

    आपकी और शुजित सरकार की जोड़ी है। निर्देशक से क्रिएटिव रिश्ता बना हुआ है। लेखक-निर्देशक की ऐसी जोड़ी हो तो आपके लेखन में निर्देशक की कितनी और कैसी भूमिका होती है?

    सबसे पहले तो मैं उनको आईडिया सुना देती हूं। फिर वह थोड़ा समय लेते हैं। सोच कर बताते हैं। शुरुआत से ही अगर विजन एक जैसा रहे तो फिर इसी प्रकार का अंतर्विरोध नहीं आता। अगर आपको पता है कि ‘पीकू’ का आखिरी उद्देश्य क्या है तो बीच में आप क्या लिखेंगे? कैसे पहुंचेंगे? इन छोटी बातों में निर्देशक की भूमिका नहीं होती। उसे मालूम है कि एक विषय जो तय हो गया है, उस पर मैं लिख रही हूं। यह दिमाग में रहता है कि हम क्यों लिख रहे हैं? हम एक-दूसरे को याद दिलाते रहते हैं। निर्देशक को यह विश्वास होता है कि विषय जो तय हो गया है, उसी के अंतर्गत कुछ लिख रही होऊंगी। हां, उसी लेखन में मैं अपने निर्देशक को कई बार चौंकाती हूं। कई बार यह भी बात होती है कि ऐसा क्या था जो नहीं कर पाए? हम लोग लगातार नहीं मिलते हैं। हां, उनको कुछ नया ख्याल आया या मुझे कुछ नया ख्याल आया तो ज़रूर एक-दूसरे को बता देते हैं। कई बार ऐसा होता है कि हमने सोच तो लिया होता है, लेकिन उसे लिखने में दिक्कतें होती हैं। हम अटक जाते हैं। फिर हम बातें करते हैं। कई बार लिखने के बाद भी चीजें बदलती हैं।

     

    कई बार कलाकार दृश्य और संवादों में बदलाव करते हैं। क्या यह उचित है?

    मेरे साथ तो ऐसा हुआ नहीं है। मुझे लगता है कि अगर आपने अपने लेखन पर पूरा ध्यान दिया है, तो अच्छे एक्टर आपकी लिखी पंक्तियों से जादू पैदा कर देते हैं। अब जैसे इरफान थे (उनके लिए ‘थे’ बोलना ही बड़ा अजीब लगता है); उनके लिए ज़रूरी नहीं होता था कि वह पूरा वाक्य बोलें। वे बहुत सारी बातें अपने एक्सप्रेशन से कह देते थे। संवाद बोलते समय उन्होंने कुछेक शब्द इधर-उधर कर भी दिए तो ऐसा नहीं लगता है कि वह कुछ गलत कर गए हैं। अमिताभ बच्चन के साथ अलग बात है। बिल्कुल अलग प्रक्रिया है उनकी। वह लिखे हुए संवाद का एक शब्द भी नहीं बदलते हैं।  ऐसा नहीं हुआ कि वे अपना संवाद बोलने लगेंगे। शूटिंग के पहले हम लोग अपनी स्क्रिप्ट पर साल-डेढ़ साल लगा चुके होते हैं और यह तय कर चुके होते हैं कि यह किरदार यही बोलेगा। इसके अलावा और कुछ नहीं बोलेगा। कम से कम 100 बार तो स्क्रिप्ट पढ़ चुके होते हैं। निर्देशक को भी लगभग कंठस्थ हो चुका रहता है, इसलिए अगर कोई कलाकार कुछ अलग बोलता है तो निर्देशक के कान खड़े हो जाते हैं। आखिर कोई वजह तो होगी ना कि एक किरदार केवल हां या ना बोल रहा है। चौबीस शब्दों का वाक्य नहीं बोल रहा है।

     

    अपने लेखन कैरियर की अभी तक की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानती हैं?

    मैं लगातार इवॉल्व हो रही हूं। मेरा विकास हुआ है। मुझे अब लगता है कि मैं कुछ भी नहीं लिख दूंगी। बाकी लेखकों को पढ़ा है। सही की जानकारी है। कुछ भी उटपटांग नहीं बोलना है। ज़िंदगी में कुछ भी उटपटांग लिखना नहीं है। जिंदगी और लोगों की समझ आई है। यह सब लेखक होने की वजह से हुआ है, क्योंकि हमारा बहुत सारा समय अपनी सोच और उसके दर्शन में जाता है। हम अपने अकेलेपन में बेहतर इंसान हो रहे होते हैं। लेखन मेरे लिए ख़ुद के विकास का बहुत बड़ा स्रोत है।

     

    आपके आदर्श लेखक कौन हैं?

    गुलज़ार साहब तो सभी के आदर्श लेखक हैं। सईद मिर्ज़ा। वरुण (ग्रोवर) ने अभी तक फिल्म एक ही लिखी है, लेकिन लेखन में उनकी गहराई तो गीतों से में भी व्यक्त होती है। उनके पास कौशल भी है। स्वानंद किरकिरे हैं। ये लोग गीत लिखें, स्क्रिप्ट लिखें, संवाद लिखें, फिल्म लिखे सब बहुत अच्छा होता है। इनकी बुद्धि, इनके सोचने का तरीका, मुझे बहुत प्रेरक लगता है।

     

    साहित्य और सिनेमा के रिश्ते पर क्या कहेंगी?

    हमें सोचना होगा कि यह सवाल क्यों आता है? जिस सच्चाई के साथ गोदान लिखा गया होगा या अपनी कहानियां लिखते समय प्रेमचंद जिस उथल-पुथल में रहे होंगे, जिस बारीकी से उन्होंने अपना सब कुछ उँड़ेल दिया होगा कहानियों में, वह उनके लेखन में दिखाई पड़ता है। मुझे लगता है कि वैसी मेहनत फिल्म लेखक नहीं कर रहे हैं। जब सिनेमा में साहित्य की ऊंचाई नहीं दिखती है तो लोग साहित्य की कमी महसूस करते हैं। उसका आग्रह करते हैं। आप उपन्यास लिख रहे हों या फिल्म लिख रहे हों, आपको यह ईमानदारी तो बरतनी पड़ेगी। अगर मैं अपनी फिल्म को साहित्य की ऊंचाई तक ना ले जा सकूं तो क्यों लिख रही हूं? अगर मैं अपनी फिल्म में कुछ ऐसी बातें ना कह दूं तो फिर कोई फायदा नहीं। मेरी फिल्म में पीकू बोलती है कि एक उम्र के बाद मां-बाप को ज़िंदा रखना पड़ता है। वह जिम्मेदारी मेरी है और मैं यह करूंगी। ऐसी बातें कह पाने का जो मुझे मौका मिला है। इस तरह की सोच अपनी राइटिंग में डालती हूं। यह स्क्रिप्ट में नहीं मिले तो निर्देशक कह सकता है कि क्यों न किसी साहित्यिक कृति को लेकर फिल्म बनाई जाए। साहित्य में एक सच्चाई होती है, इसलिए लोग चाहते हैं कि उसका एडाप्टेशन हो। जीवन का दर्शन रहता है साहित्य में। फिल्म  उसी सच्चाई से लिखी जाए तो उसमें भी साहित्य का मज़ा आ सकता है। मेरे ख्याल से दोनों ही समानधर्मा हैं। बेहतर सिनेमा साहित्य ही है। विश्व की क्लासिक फिल्में देख लें। वह साहित्य का दर्जा रखती हैं। फ़र्क इतना ही है कि साहित्य शब्दों में किताबों में छपा रहता है और सिनेमा थ्रीडी अनुभव दिला देता है। सोच में तो साहित्य और सिनेमा में फर्क नहीं रहना चाहिए।  इंगमार बर्गमैन और तारकोवस्की जैसे फिल्मकारों की फिल्में देखिये तो आपको एहसास होगा कि वह सब साहित्य ही है। भारत में ही सत्यजीत रे की फिल्में साहित्य के स्तर की हैं।

     

    विदेशों भाषाओँ में, बांग्ला में, दक्षिण की भाषाओँ में साहित्य पर आधारित फ़िल्में बनती रहती हैं। क्या हिंदी में साहित्य पर कम फिल्में  बनी हैं?

    हिंदी फिल्म मैं एडवरटाइजिंग की पॉलिसी चलती है। जब हम लिखते थे तो हमें कहा जाता था इसका टारगेट ऑडियंस 9 से 90 साल तक के लोग हो सकते हैं।  वही हमारी फिल्मों का भी एप्रोच है। उसमें शादी के लायक एक गाना भी होना चाहिए। उसमें डिस्को गाना भी आ जाए। एक ही फिल्म बच्चों के लिए भी हो जाए, जवानों के लिए भी हो जाए और बुजुर्गों के लिए भी हो जाए। एक उत्पाद सभी के काम आए। अगर ऐसी मांग होगी और यही सब काम करना होगा तो फिर तो ऐसा ही लेखन होगा जो सबकी समझ में आ जाए। फिल्म को हमने सीलिंग फैन बना दिया है कि कमरे में जितने लोग बैठे हैं, सब को हवा लगे। अगर हम कोशिश करें तो हम साहित्य पर आधारित फिल्में बना सकते हैं। जिनकी समझ में नहीं आएगा, वे उसे समझने की कोशिश करेंगे। हमारे फिल्मकारों ने स्तर बढ़ाने का प्रयास ही छोड़ दिया है। हमारे फिल्मकारों को बहुत हड़बड़ी रहती है। किसी के पास इतना समय नहीं है कि वह ऐसी कोशिश करें। हमें तो साल के बावन हफ्तों में दो ढाई सौ फ़िल्में लानी होती हैं। हिंदी फिल्में शताब्दी और राजधानी का खाना हो गई हैं। जो बेहद स्वादिष्ट ना होने के बावजूद सभी को ठीक लगती हैं। कोई भी ऐसा नहीं मिलेगा जो कहेगा कि बहुत पसंद आया लेकिन कोई भी ऐसा नहीं मिलेगा जो कहे कि बहुत बुरा था। अगर कोई फिल्म देख कर कहे कि बहुत बेकार थी तो वह भी एक ख़ास ओपिनियन है। ज्यादातर हिंदी फिल्में ‘ठीक है’ कैटेगरी में आती है। हमारे स्टार तो ना कपड़े बदलेंगे, ना बाल बदलेंगे, ना चेहरा बदलेंगे तो फिर कैसे अलग चीजें क्रिएट की जाएंगी? लेखक भी कहां से लेकर आए? कुछ अलग लिखे भी तो बनते समय कुछ और हो जाती है। लेखक, निर्देशक और कलाकार इस तरह का समय नहीं खर्च करना चाहते हैं। ख़ुद के प्रति आश्वस्त नहीं होते कि अगर ऐसा कुछ करेंगे तो लोग देखने आएंगे। इसीलिए हर कोई मांग की तरफ भागता है। चाहे वह फिल्म का रीमेक हो या कुछ और। मुझे लगता है कि वह भी आसान नहीं है। उसमें भी बहुत मेहनत है। किसी अच्छी बुक को उठा कर आप बेकार फिल्म बना दें तो वह भी लानत है।

     

    ओटीटी पर आई फिल्में बगैर इंटरवल की होती है। इससे क्या स्क्रिप्ट के लेखन में भी फर्क आ रहा है? अब आप को इंटरवल पॉइंट के बारे में नहीं सोचना होता होगा।

    मैंने अपनी फिल्मों में कभी भी इंटरवल पॉइंट नहीं लिखा है। फिल्म एक बार पूरी बन जाने के बाद मैं, एडिटर और शुजित बैठकर तय करते हैं कि कहां इंटरवल पॉइंट रखा जाए। शुजित तो चाहते भी नहीं इंटरवल हो। मेरी फिल्मों में तो गाने भी नहीं होते हैं। लिपसिंक वाले तो गाने ही नहीं रहते हैं। मेरी फिल्मों में ज्यादातर बैकग्राउंड गाने ही होते हैं। वह शुजित और फिल्म के संगीत निर्देशक तय करते हैं कि क्या जाएगा साथ में। हिंदी फिल्मों में गाने भी एक ज़रूरत बन गए हैं।

     

    दूसरों की फिल्मों का कोई यादगार दृश्य जो पटकथा और संवाद की ख़ूबियों की वजह से आप बताना चाहें? उत्कृष्टता के पाठ के लिए।

    एक दृश्य तो नहीं। ‘उड़ान’ बहुत ही बारीकी से लिखी गई थी। रीमा दास की ‘विलेज रॉकस्टार’ में ऐसे कई दृश्य आते हैं। उसमें इतनी सच्चाई है, इतना रियल है, उससे ज़्यादा रीयल क्या हो सकता है? एक सीन की बात तो नहीं कर सकती लेकिन ‘उड़ान’ और ‘विलेज रॉकस्टार’ जैसी फ़िल्में देखनी चाहिए। इस लिहाज से ‘महानगर’, ‘अपराजितो’, सत्यजित राय की कोई भी फिल्म देख सकते हैं। ‘अपराजितो’ फिल्म के कई दृश्य याद आते हैं। ‘महानगर’ में लिपस्टिक लगायी नायिका को उसका पति घूरकर देखता है। वह कुछ नहीं बोलती है। पर्स से लिपस्टिक निकालती है और खिड़की खोल कर फेंक देती है। हीरो को एकटक देखती है और चली जाती है। सत्यजित राय कितनी बातें कह जाते हैं। नायिका आर्थिक रूप से स्वतंत्र है। उसके लिए ज़रूरी नहीं है कि वह पति से सवाल-जवाब में उलझे। कहां से आई? क्यूँ तुम्हें नहीं पसंद है? कुछ भी बोलती-पूछती नहीं है। पति पत्नी के संबंध की ग्रंथि को दृश्य से बता दिया जाता है। पति की नौकरी छूट गई है। वह कुछ कमा रही है। पति के घूरने में सारे सवाल हैं कि अभी अब बाहर जा रही है, पैसे कमा रही है तो..। उस दृश्य में बहुत सारी चीजें कह दी जाती हैं।

     

    इन दिनों क्या लिखा?

    कोशिश की है। एक फिल्म लिखी है। अभी तक किसी ने उसे पढ़ा नहीं है। उसे खत्म कर रही हूं। एक सीरीज़ भी लिख रही हूं। कुछ पुराने काम भी खत्म कर रही हूं। आप सभी जानते हैं कि मेरी स्पीड बहुत नहीं है। यही कोशिश है कि लिखना न भूल जाऊं। हम लेखक तो वैसे ही लॉकडाउन में रहते हैं। ऐसा नहीं है कि लॉकडाउन में सब कुछ बंद ही हो गया था। यूँ हमारे आसपास की पूरी दुनिया ही बदल गई है और इससे हम बतौर लेखक कैसे बेअसर रह सकते हैं? हम भी उधर से गुज़रे हैं। लॉकडाउन की जो स्थिति थी, जब सारे प्रवासी मजदूर गांव लौट रहे थे पैदल। कैसे भूल सकती हूँ? 2020 में तो पूरी दुनिया ही एक्सट्रीम हो गई है हर चीज़ में। मैं कोशिश करती हूं कि ये चीज़ें बहुत ज़्यादा अंदर तक असर ना डालें। इससे हमारी नियमित ज़िंदगी बहुत ही डिस्टर्ब हो जाती है। मैं अपने घर की क्लाउन हूं। मैं ही चार्ली चैपलिन हूँ।

     

    फिल्म लेखन में आने के इच्छुक प्रतिभाओं को क्या सुझाव देंगी?

    अभी हर कोई बहुत जल्दबाज़ी में है। ऐसा नहीं होगा कि आज आपने कहानी पूरी की, कल आपने मेल किया, परसों किसी ने पढ़ लिया और तुरंत फिल्म बन गयी। कुछ लोग इतनी जल्दी करते हैं कि भाई यह लिख दिया है, आप पढ़ लीजिए, सुझाव दीजिए, लिखकर फिर भेज दूंगा। मुझे लगता है कि कुछ समय तक अपने पास स्क्रिप्ट रखनी चाहिए। एक बार, दो बार, दस-बीस बार पढ़ लेना चाहिए। एक लेखक को विनम्र होना ही चाहिए। ऑब्जर्व करना आना चाहिए। चुप रहकर आप लोगों की बातें सुनें और समझें। कई बार ऐसा लगता है कि तलवार लेकर बैठे रहते हैं। आपने बात पूरी ही नहीं की और वे काट देते हैं। सभी को यह बताना है कि उसे आप से ज़्यादा मालूम है। यह ख्याल रहे कि आपको विकिपीडिया नहीं बनना है। आजकल तो गूगल करें तो सब पता चल जाएगा कि कौन सी फिल्म कब रिलीज़ हुई थी? आपका योगदान क्या है? आप क्या चीजें जोड़ रहे हैं? यह सबसे महत्वपूर्ण है। लेखक वास्तव में दार्शनिक होता है। दार्शनिक स्तर पर आपकी फिल्म... आपका लेखन क्या दे पा रहा है? लिखना तो सिर्फ एक क्रिया है। आप सिर्फ क्रिया बनकर न रह जाएँ। आपको अवधारणा बनना है। आपको सोच बनना है। आपको टाइपराइटर नहीं बनता है। आपके अंदर यह लालसा होनी चाहिए कि आप समाज में कुछ योगदान करेंगे और उसे बदलेंगे। मैं ऐसी ही लालसा रखती हूं। मुझे कोई नया विषय दे और कहे कि सोचो तो मैं सोचने में महीनों लगा सकती हूं। मेरे लिए उससे बड़ी मिठाई नहीं हो सकती। मेरा ज़्यादा समय सोचने में जाता है। लिखने में तो मैं बहुत आलसी हूं। काफी सोचने के बाद फिर मैं आखिरी दो-तीन महीनों में ही टाइपिंग करना शुरू करती हूं। बगैर सोचे में एक शब्द भी नहीं लिख सकती। यह मेरी प्रक्रिया है। यही सुझाव है। 

    अजय ब्रह्मात्मज जाने-माने फिल्म पत्रकार हैं। पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।