•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  29 October 2021
    •  360

    "लिखते समय लेखक ऋषि हो जाता है।"

    अजय ब्रह्मात्मज के सवाल, लेखकों के जवाब: संजय छेल

    संजय छेल ने छोटी उम्र से लेखन की शुरुआत की। उनकी पहली कहानी की तारीफ़ हुई तो फिर उन्होंने एकांकी और फिर कई नाटक लिखे। सबसे पहले वह ‘नुक्कड़’ के लेखन से जुड़े। अनेक धारावाहिकों के लेखन के बाद उन्होंने निर्देशन भी किया। फ़िल्मी लेखन की शुरुआत ‘पहला नशा’(1993) से हुई। अनेक फ़िल्मों के लेखन के बाद उन्होंने ‘ख़ूबसूरत’ फ़िल्म का निर्देशन किया। फ़िल्मों के साथ हाई वह पत्र-पत्रिकाओं में नियमित स्तम्भ लिखते हैं।

    जन्म स्थान:

    द्वारका, गुजरात। मेरी मां वहां प्रोफ़ेसर थीं। पिता मेरे मुंबई में ही रहते थे। पैदाइश के तुरंत बाद मैं मुंबई आ गया था। बचपन मुंबई में बीता। पढ़ाई-लिखाई भी यहीं पर की।

     

    जन्मतिथि:

    14 अक्टूबर 1967

     

    शिक्षा दीक्षा:

    मैंने तरह-तरह की पढ़ाई की है। केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाईं की है। जेवियर्स से मैंने फिल्म डिप्लोमा कोर्स किया डेढ़ साल का। अभी मैं गुजरात के कुछ शहरों में फिल्म लेखन और सामान्य लेखन के पढ़ाने जाता हूं। एक अफसोस रह गया कि मैं भाषा में पीएचडी नहीं कर पाया। हो सकता है कभी भविष्य में कर लूं।

     

    प्रशिक्षण और अभ्यास:

    मैंने लेखन का कोई प्रशिक्षण नहीं लिया है। मेरी मां गुजराती और संस्कृत की प्रोफेसर रही हैं। उनकी वजह से घर में भाषा का एक माहौल था। मेरे पिता गुजराती और हिंदी रंगमंच के कला निर्देशक थे। उन्होंने छह-सात सौ नाटकों के सेट डिजाइन किए। गुजराती, हिंदी, मराठी, अंग्रेजी सभी भाषाओं के नाटकों के लिए काम किया उन्होंने। मुंबई की कोई ऐसी रंग संस्था नहीं होगी, जिसके लिए उन्होंने काम ना किया हो। उनका नाम छेल परेश है। 35 से ज्यादा फिल्मों में भी उन्होंने कला निर्देशन किया। घर में नाटक का माहौल था। बचपन से ही नाटक देखने जाता था। मेरे मानस पर संवाद और कहानियों का बहुत असर रहा। मां से भाषा का संस्कार मिला और पिता से नाटक की जानकारियां मिलीं। स्कूल के दिनों से ही मैं लिखने लगा था। कॉलेज में आते-आते लेख और एकांकी लिखने लगा था। 19 साल की उम्र में गुजराती के अखबार ‘समकालीन’ में मेरा स्तंभ छापने लगा था। उन्हीं दिनों मैंने रमेश तलवार को असिस्ट करना शुरू कर दिया था। अहमदाबाद दूरदर्शन के लिए मैं गुजराती में धारावाहिक लिखता था। वे धारावाहिक कहानियों पर आधारित होते थे। दूरदर्शन के मेट्रो चैनल पर हिंदी धारावाहिक आने लगे तो मैंने ‘नुक्कड़’ टीवी शो लिखा। उसके बाद तो धारावाहिकों और फिल्मों का सिलसिला ही चल निकला।

     

    मुंबई में किस इलाके में रहे हैं आप?

    विले पार्ले ईस्ट में रहा करता था। वह सुसंस्कृत इलाका माना जाता है। पु. ल. देशपांडे और विजय तेंदुलकर वहां रहा करते थे। परेश रावल हमारे लोकल हीरो थे। बाद में मैं वर्सोवा इलाके में रहने लगा।

     

    कहानी लिखने का विचार कैसे आया और पहली कहानी कब लिखी थी?

    18 साल की उम्र में पहली कहानी लिखी थी। भवन कॉलेज में कहानियों की एक प्रतियोगिता थी। उसमें मुंबई और गुजरात के कॉलेज से बहुत सारी कहानियां आई थीं। उस प्रतियोगिता में मेरी कहानी प्रथम आई थी। वह कहानी भारतीय विद्या भवन की गुजराती पत्रिका ‘नवनीत समर्पण’ में छपी थी। अपना नाम छपा देख कर बहुत खुशी हुई। फिर मैंने दूसरी-तीसरी कहानी लिखी। बचपन से कहानियां और उपन्यास पढ़ा करता था। हमारे घर में अच्छी लाइब्रेरी थी। हमारे स्कूल की प्रिंसिपल भी हमें प्रेरित करती थीं। वे हमें कहानी और नाटक प्रतियोगिताओं के लिए भेजती थीं। वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भी हम लोग जाते थे। परेश रावल हमारे कॉलेज से ही निकले थे। हम लोगों के स्कूल में इंटरक्लास प्रतियोगिताएं भी होती थीं। विले पार्ले ईस्ट में लायंस जूहू नाम का स्कूल है। हमारी प्रिंसिपल इंदु बेन पटेल अमेरिका से पढ़ कर आई थीं। कला और साहित्य में रुचि रखने वालों छात्रों को वे अतिरिक्त कक्षाएं लेकर पढ़ाती थीं। घर और स्कूल दोनों जगह का माहौल मुझे बहुत रास आया। 18 से 20 साल की उम्र तक में मेरी अनेक कहानियां छप चुकी थीं। 20 की उम्र में राजेंद्र यादव ने ‘हंस’ पत्रिका में मेरी कहानी छापी थी। वहां से हौसला बढ़ गया। फिर तो मैं ‘कथादेश’ और ‘ज्ञानोदय’ में भी छपने लगा।

     

    आरंभिक दिनों में किस लेखक ने आप को प्रभावित किया?

    मुझे पु. ल. देशपांडे ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। हिंदी में शरद जोशी और हरिशंकर परसाई का लेखन मुझे अच्छा लगता है। प्रेमचंद और मंटो का नाम नहीं लूंगा, क्योंकि वे तो सभी के प्रिय हैं। राही मासूम रज़ा की कहानियां मुझे अच्छी लगती रही हैं। जब कहानियां लिखने लगा तो उदय प्रकाश ने प्रभावित किया। राजेंद्र यादव और कमलेश्वर को मैं पढ़ता रहा हूं। कमलेश्वर को तो मैंने फिल्मों की वजह से जाना। मैं अंग्रेजी, हिंदी, मराठी, गुजराती का साहित्य पढ़ता रहा हूं। बहुत सारे लेखकों का प्रभाव मेरे ऊपर है। उन सभी का लिखा हुआ, पढ़ा हुआ और सुना हुआ ही मेरे अंदर रिसता रहता है और उसी से कुछ ना कुछ नया निकलता रहता है।

     

    पहली फिल्म नाटक या कोई शो जिसकी कहानी ने आपको बहुत प्रभावित किया हो?

    ‘आनंद’ फिल्म मुझे बहुत पसंद आई थी। बाद में मैंने टीवी पर उसे ठीक से देखा था। ‘गाइड’ भी अच्छी लगी थी। ‘अमर अकबर एंथनी’ से सिनेमा का मैजिक थोड़ा समझ में आया। स्कूल के दिनों में ‘अर्द्धसत्य’ देखी थी। उस फिल्म ने मुझे झकझोर दिया था। गुलज़ार साहब की फिल्में अच्छी लगती रही हैं। फिल्मों में किरदारों का मानवीय पक्ष मुझे सबसे अधिक पसंद आता है। विजय तेंदुलकर की राइटिंग प्रेरक रही है। गुजराती में कांति मडिया ने बड़े रंगमंच पर विशाल नाटक किए हैं। 2016 में मैंने कांति मडिया पर एक 700 पृष्ठों की एक किताब संपादित की है। रंगमंच के किसी कलाकार पर गुजराती में यह अपने ढंग का पहला काम है। इस्मत चुगताई ने मधु राय के एक नाटक का अनुवाद ‘नीला कमरा’ नाम से किया था। मैंने उसमें काम भी किया था। उसे शफ़ी ईनामदार ने निर्देशित किया था। इस्मत आपा की चमत्कृत भाषा ने मुझे मुग्ध कर दिया था। मेरी समझ में आया था कि संवाद लेखन भी अभिव्यक्ति का एक माध्यम है। जबरदस्त संवाद हो तो वह सामान्य पटकथा को भी उत्कृष्ट बना सकता है।

     

    आपका पहला लेखन जिस पर कोई टीवी शो, सीरियल या फिल्म का निर्माण हुआ हो?

    मैंने एक एकांकी लिखी थी क्रॉसवर्ड पज़ल। वह इंटर कॉलेज प्रतियोगिता में शामिल हुई थी। बाद में तो उसका कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। वह पत्रिका में छपी और टेलीविजन पर भी उसे पेश किया गया। मैंने अपनी एक कहानी का इस्तेमाल ‘नया नुक्कड़’ के एक एपिसोड में किया था, जिसके निर्देशक अजीज़ मिर्ज़ा थे। ‘हंस’ में छपी मेरी कहानी ‘पोस्टर’ को अनुभव सिन्हा ने ₹5000 देकर खरीदा था कि उस पर कोई प्रोग्राम बनाएंगे। बाद में कुछ हुआ नहीं। कहानी से पहली कमाई वही थी।

     

    ज़िंदगी के कैसे अनुभवों से आपके चरित्र बनते और प्रभावित होते हैं?

    मैं मुंबई का लड़का हूं। मेरे सीमित अनुभव हैं। मुंबई की सड़कों और गलियों में पला-बढ़ा हूं। नाटकों की दुनिया में मेरा जीवन बीता है। मध्यवर्गीय जीवन रहा मेरा। मैं कभी उत्तर भारत नहीं गया। मैंने खेत नहीं देखे हैं। मैंने कभी साइंस फिक्शन भी नहीं पढ़ा है। मेरी समझ और जानकारी टीवी, फिल्म, नाटक और मुंबई की सड़कों से आई है। मुंबई की सड़क ही मेरा कैनवास है। मुंबई के लोगों से बनी रंगोली मुझे सबसे अच्छी लगती है। देश-विदेश की तमाम यात्राओं के बावजूद में कह सकता हूं कि मुंबई के लोग बहुत रंगीन होते हैं। यहां हर आदमी के पीछे एक कहानी है। वे सभी मुझे जीवंत किरदार लगते हैं।

     

    चरित्र गढ़ने की आपकी प्रक्रिया क्या होती है?

    मैं रंगमंच और सीरियल में छोटा-मोटा एक्टर भी रह चुका हूं। मैंने कुछ नाटक भी निर्देशित किए हैं। मेरी समझ में आ गया है कि एक्टर को दृश्य में कुछ करने के लिए चाहिए होता है। मैं फिल्मों की बात कर रहा हूं। फिल्मों के किरदार एकांगी नहीं होने चाहिए। अगर वे एकआयामी होंगे तो आनंद नहीं आएगा। उनमें दो-चार तत्व होने चाहिए। हमें हर किरदार को गाढ़ा बनाना पड़ता है। उसे कोई न कोई खूबी या कमी देनी होती है। कोई कहानी ही चरित्र का निर्माण करती है। ऊपर से हम देखते हैं कि एक्टर को क्या परफॉर्म करने में मज़ा आएगा? कैसे वह किरदार रोचक बनेगा और मुझे लिखने में कितना मजा आएगा? मेरे जीवन के किसी हिस्से से या मेरे देखे हुए किसी किरदार से मिलता-जुलता है कि नहीं? मैं जीनियस नहीं हूं। मैं कल्पना से किरदार नहीं गढ़ सकता। मुझे किरदार गढ़ने होते हैं तो मैं उन्हें खुद ही परफॉर्म करके देख लेता हूं। मेरा शिद्दत से मानना है कि राइटर को पहले एक्टर होना चाहिए। उसे रंगमंच, सीरियल या फिल्मों में जाकर थोड़ा अभ्यास करना चाहिए। छोटी-मोटी भूमिकाएं करनी चाहिए। किरदार निभाना चाहिए और शूटिंग देखनी चाहिए। चार दीवारों के बीच में बैठकर लिखना तो बहुत ही निजी और व्यक्तिगत अभ्यास है। विवरण लिखने से कुछ खास बात नहीं बनती है। आप के चार पृष्ठों के विवरण को कैमरामैन एक मिनट में पर्दे पर ला देगा। जब तक आप शूटिंग नहीं देखेंगे, उसका अनुभव नहीं होगा या फिर परफॉर्म नहीं करेंगे तो आप अच्छे राइटर नहीं बन सकते। यह सब करने के बाद ही लेखक में आत्मविश्वास आता है और वह एक अच्छे  नैरेटर के तौर पर विकसित होता है।
     

    क्या आप अपने किरदारों की जीवनी लिखते हैं?

    बहुत विस्तार में तो नहीं लेकिन कुछ मूलभूत बातें लिख लेता हूं।

     

    क्या अपने किरदारों से क्या आपका कोई इमोशनल रिश्ता बनता है?

    बहुत बार बन जाता है। जब बन जाता है तो वह फिल्म चलती है। मैं खुद के लिए लिखूं या औरों के लिए, जब तक किरदारों से इमोशनल रिश्ता नहीं बनेगा, तब तक कहानी नहीं बनेगी। इमोशनल रिश्ता तो बनना ही चाहिए। किरदारों में कहीं ना कहीं मैं नजर आता हूं, तभी तो वह मेरी राइटिंग होती है। मैंने ऐसे भी लेखक देखे हैं, जिन्होंने 40-50 फिल्में लिख ली हैं, लेकिन उनकी अपनी कोई पहचान नहीं है। क्यों ऐसा है? उन सभी ने किरदारों में खुद को नहीं डाला है। कुछ राइटर सत्यजीत रे, महेश भट्ट और यश चोपड़ा के साथ काम कर चुके हैं, लेकिन उनके लिखे दृश्यों को देखने के बावजूद आप नहीं जान पाएंगे कि यह उन्हीं का लिखा हुआ है। वहीं गुलज़ार साहब को देखो। नाम मत लिखो उनका, फिर भी दृश्य देखते ही समझ में आ जाता है कि यह गुलज़ार साहब की राइटिंग होगी। आपके लेखन में आपकी छाप होनी चाहिए।

     

    क्या आपके किरदार कभी खुद ही बोलने लगते हैं?

    ऐसे चमत्कार कई बार हुए हैं। अमूमन क्लाइमैक्स में ऐसा होता है। तब तक किरदार हमारे अंदर और हम किरदार के अंदर घुस चुके होते हैं। फिर किरदार हमें गाइड करने लगते हैं।

     

    आप इसे कितना जरूरी मानते हैं कि किरदारों की भाषा अलग-अलग होनी चाहिए?

    बिल्कुल अलग होनी चाहिए। किरदार के पेशे और पृष्ठभूमि के हिसाब से भाषा बदल जानी चाहिए। कुछ बड़े लेखकों से यह शिकायत भी है कि वह हर किरदार में अपनी ही भाषा बोलते हैं। ज़िंदगी में जितने किरदार हैं, उतनी भाषाएं हैं, उतने लहजे हैं। लेखक हमेशा किरदार के द्वंद को जीता है। वह तनी हुई रस्सी पर चलता है। एक तरफ अपनी छाप भी छोड़नी है और दूसरी तरफ किरदार को जीवंत भी बनाना है। किरदारों की ज़िंदा भाषा होनी चाहिए। आप मंटो की कहानियां ले लें और उनके लिखे किरदारों को देखें। आप स्पष्ट समझ जाएंगे की यह राइटिंग मंटो की है। भाषा उनके किरदारों के साथ बदलती जाती है। पढ़ना और लिखना सीखना है तो मैं तो कहूंगा कि आप मंटो को पूरा पढ़ जाइए।

     

    संवाद लिखना कितना आसान है या मुश्किल काम है?

    फिल्मों की कहानी लिखना आसान काम है। उसकी पटकथा और संवाद लिखना मुश्किल काम है। मैं पटकथा और संवाद को बहुत अलग नहीं मानता। पटकथा लिखते समय जरूरी पॉइंट लिख दिए जाते हैं। हमारे यहां दृश्य बहुत ही स्कैची होते हैं। फिल्मांकन के लायक दृश्य वास्तव में संवाद लेखक ही लिखता है। उसमें एक्टर के हाव-भाव, एक्टर की गतिविधि, कई बार तो कैमरा एंगल और कट पॉइंट भी बताना पड़ता है। दृश्य में ट्रांजिशन भी संवाद लेखक लिखता और बताता है। संवाद लेखक आर्किटेक्ट होने के साथ इंटीरियर डेकोरेटर भी है। कहानीकार सिविल इंजीनियर होता है। हिंदी फिल्मों में संवाद लेखक की बड़ी भूमिका होती है। अगर कहानी और पटकथा रोचक नहीं है तो वह संवादों से दृश्यों को रोचक बनाता है।

     

    दिन के किस समय लिखना पसंद करते हैं?

    किसी भी समय। अंतिम तारीख आ जाती है तो समय भी नहीं देखते। मैंने तो लोकल ट्रेन में, फ्लाइट में और किचन में भी बैठकर लिखा है। ऑफिस नहीं होने पर भी अच्छी फिल्में लिखी हैं और ऑफिस हो जाने के बाद बुरी फिल्में भी लिखी हैं। ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता कि आप कहां लिख रहे हैं? हां, व्यवधान कम हो, फोन बंद हो लोगों का आना-जाना ना हो तो थोड़ा आनंद आता है लिखने में।

     

    लिखने के लिए कोई खास जगह भी है आपकी?

    मैं तो कहीं भी राइटिंग पैड लेकर बैठ जाता हूं। अगर ऑफिस में हूं तो टेबल कुर्सी है। फिल्म के दृश्य पहले हाथ से कॉपी पर लिख लेता हूं। पहले उसे फैला कर लिख लेता हूं। सारे पॉइंट जोड़ देता हूं। फिर उनमें से श्रेष्ठ को चुनकर दृश्य तैयार करता हूं। लिखने के बाद में पढ़ता हूं। पढ़ने पर अगर लगता है कि कुछ लंबा हो रहा है तो काट देता हूं। इसके बाद ही टाइप करता हूं। टाइप करने के बाद भी एक बार पढ़ता हूं और ज़रूरी काट-छांट करता हूं।

     

    लिखने के लिए कभी शहर भी छोड़ते हैं क्या?

    एक-दो बार ऐसा हुआ है, लेकिन यह ज़रूरी नहीं है। बाज दफ़ा डायरेक्टर कहते हैं कि चलो घूम आएंगे और लिख भी लेंगे।

     

    कभी राइटर ब्लॉक से भी गुजरना पड़ा?

    अगर ऐसा होता है तो क्या करते हैं? अभी तक तो बचा हुआ हूं। लॉकडाउन में राइटर्स ब्लॉक तो नहीं हुआ, लेकिन काम रुक गया था कि पता नहीं कब फ़िल्म बनेगी तो चलो आराम करते हैं। हम तो श्रमजीवी लेखक हैं। हमें लगातार काम करना होता है। मैं लगभग 30 सालों से फिल्म इंडस्ट्री में काम कर रहा हूं। 30-35 फिल्में लिखी हैं। हम इसे अफ़ोर्ड नहीं कर सकते। मेरे ख्याल में राइटर्स ब्लॉक अमीरों के चोंचले जैसा है।

     

    लेखकों के बारे में कौन सी धारणा बिल्कुल ग़लत है?

    यह बिल्कुल ग़लत धारणा है कि लेखक बहुत ज्ञानी होते हैं। ये भी सही नहीं है कि लेखक को हर बात की जानकारी रहती हैं। एक ये भी धारणा बना दी गई है कि वे साधारण जीवन जीना पसंद करते हैं। अपनी गरीबी उन्हें अच्छी लगती है। ऐसी बात नहीं है। लेखक भी दूसरे लोगों की तरह बहुत लालची होते हैं। बड़े कमीने भी होते हैं। यही लेखक जब लिखने बैठता है तो ऋषि हो जाता है। उसका आत्मिक उत्थान हो जाता है। वह बेहतर इंसान हो जाता है।

     

    लेखक होने का सबसे बड़ा फ़ायदा क्या है?

    ढ़ेर सारे फायदे हैं। अगर आप फ्रीलांस राइटिंग करते हैं तो आप खुद के बॉस होते हैं। ठीक है कि हम डायरेक्टर, प्रड्यूसर और एक्टर के लिए काम करते हैं, लेकिन वहां भी हमारी मनमर्ज़ी चलती है। इज्ज़त बहुत मिलती है हमें। लेखक के बिना फ़िल्म का सेट नहीं लग सकता। लेखकों के अहं की पुष्टि होती रहती है। हम एक ही ज़िंदगी में कई ज़िंदगियां जी लेते हैं। कई किरदार जीते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि पूरी दुनिया देख ली है। पूरी दुनिया कोई नहीं देख सकता। पर लेखक अपने ख्यालों में पूरी दुनिया देख चुका होता है। कई इंसानो का जीवन वह जी चुका होता है। लेखक परकाया प्रवेश करता है। लेखक रूटीन जिंदगी नहीं जीते। लेखक और  निर्देशक रूटीन ज़िंदगी की बोरियत से बच जाते हैं।

     

    अपनी फिल्मों के कितने ड्राफ्ट तैयार करते हैं अमूमन?

    कई ड्राफ्ट तैयार होते हैं। तीन-चार तो अमूमन हो ही जाते हैं। निर्देशक और कलाकार की मांग हुई तो और भी होते हैं। शूटिंग के समय भी लिखना पड़ता है। मैंने ‘ख़ूबसूरत’ फिल्म के सात ड्राफ्ट तैयार किए थे। सेट पर जाने के बाद भी उसके ड्राफ्ट हुए। मैं यहां डेविड धवन की चर्चा करना चाहूंगा। वह हमारे लिखे सीन से ही एक अलग ड्राफ्ट तैयार कर लेते हैं। वह हमारे सीन को छोटा-बड़ा और आगे-पीछे करके ज़्यादा बेहतर बना देते हैं। रामगोपाल वर्मा आधा सीन सुनकर कहते थे, आगे मैं कर लूंगा, तुम छोड़ दो। अजीज़ मिर्ज़ा ज़्यादा से ज़्यादा लिखने की सलाह देते थे। कुंदन शाह कभी खुश नहीं होते थे। उनकी और कुछ और कुछ की फरमाइश बनी रहती थी। मैंने खुद चार फिल्में डायरेक्ट की हैं और उन्हें लिखा भी है। मैं अपने लेखन से संतुष्ट नहीं रहता, अपने सहायकों को देता रहता हूं देखने के लिए। शूटिंग के दिन तक मैं लिखता रहता हूं। स्क्रिप्ट पत्थर की लकीर नहीं होती कि एक बार जो लिख दिया तो लिख दिया। हमारे लिखे सीन को एडिट करते समय एडिटर तो लेखन ही करता है। कई बार एक्टर का एक लुक हमारे लिखे सीन को बेहतर या बदतर कर देता है। फिल्मों में कुछ ना कहना भी कहना होता है। कई बार लेखक शब्दों के प्यार में रहते हैं। एडिटर ऐसी स्क्रिप्ट को बचा लेता है। शाहरुख ख़ान और परेश रावल ऐसे एक्टर हैं, जो दो शब्दों और एक्सप्रेशन में आपके पूरे वाक्य को कह जाते हैं। वे लाघव जानते हैं। रंगीला करते समय मैंने सीखा कि कैसे टपोरी किरदार को भी गरिमापूर्ण बनाया जा सकता है। एक्टर, डायरेक्टर और एडिटर भी हमारी स्क्रिप्ट लिखते हैं। ठीक है कि हमें लेखक का क्रेडिट मिलता है, लेकिन सच्चाई यही है कि फिल्म का कोई एक लेखक नहीं होता है। यह वास्तव में सामूहिक प्रयास है।

     

    अभी तक के अपने लेखन कैरियर की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?

    कई फिल्मों ने मुझे नाम, यश और शोहरत दी। ‘रंगीला’, ‘दौड़’, ‘यस बॉस’ लोग याद करते हैं। ‘ख़ूबसूरत’ फिल्म से मुझे बहुत नाम मिला। उसके दृश्य आज भी लोगों को याद हैं। ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ के पहले मैंने संजय दत्त की इमेज बदली थी उस फिल्म से। ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ का मुझे बहुत फ़ख़्र है कि मैंने उस दौर में वह फिल्म लिखी। मीडिया घरानों की प्रतिद्वंदिता के बारे में मैंने तब फ़िल्म लिखी थी। ज्योति बसु ने उस फिल्म को देखकर कहा था अच्छी कोशिश है। ‘पार्टनर’ फिल्म में मुझे अलग ढ़ंग से मज़ा आया। डेविड धवन, गोविंदा और सलमान थे। मैंने उसके हर संवाद में तुकबंदी की थी। ‘मान गए मुग़ल -ए- आज़म’ नहीं चली थी, लेकिन वह भी मुझे बहुत पसंद है। ‘नया नुक्कड़’ में मैंने अपने वामपंथी रुझान के हिसाब से लेखन किया था। ‘फिल्मी चक्कर’ में पुराने कलाकारों के ऊपर व्यंग्य किया था। टाडा के एपिसोड पर मुझे पुलिस डिपार्टमेंट से फोन आया था। संतोष सिवन की चिल्ड्रन फिल्म ‘हेलो’ लिखते हुए बहुत आनंद आया था। फिल्म का अंत देख कर आज भी रोना आता है। चिल्ड्रन फिल्म सोसायटी की अकेली फ़िल्म थी, जो थिएटर में लगी थी।

     

    एक्टर और डायरेक्टर कई बार आप की स्क्रिप्ट बदल देते हैं। इस संबंध में आपकी क्या राय है?

    कई बार वह ज़रूरी भी होता है। कई बार बहुत ज़रूरी नहीं होता। मैं अपनी फिल्मों के सेट पर रहना पसंद करता हूं। एक तरह से कहें तो मैं अपनी फिल्मों का स्क्रिप्ट राइटर और गार्ड दोनों होता हूं। मैं यही कहता हूं कि अगर कुछ बदलना है तो मुझे साथ लेकर बदलें।
     

    कहते हैं लेखन एकाकी प्रक्रिया है?

    लेखन शुरू करने के दिनों में ही यह पता चल जाता है। फिर भी हम आगे बढ़ते हैं। हमें किसी ने ज़बरदस्ती लेखक तो बनाया नहीं है। लेखन के एकाकीपन से हर लेखक परिचित होता है और वह इससे गुज़रता भी है।

     

    फिल्मों में आपके आदर्श लेखक कौन हैं?

    मुझे विजय तेंदुलकर सबसे अच्छे लगते हैं। संवादों में गुलज़ार साहब। मुझे कादर ख़ान की भी कई फिल्में बहुत पसंद है। गीतकारों में मजरूह साहब और आनंद बक्शी इन दोनों से बहुत प्रभावित रहा हूं। कमलेश्वर भी हैं। बृजेंद्र गौड़ थे पुराने जमाने में। पंडित मुखराम शर्मा का भी नाम लेना चाहूंगा।

     

    लेखकों की स्थिति में किस बदलाव की तत्काल जरूरत है?

    मुझे लगता है कि और पैसे मिलने चाहिए। क्रेडिट मिलना चाहिए और अधिकार भी मिलने चाहिए।

     

    साहित्य और सिनेमा के रिश्ते पर क्या कहेंगे?

    साहित्य प्रवहमान नदी है और सिनेमा उससे निकला अंजुली भर पानी। सिनेमा के लेखक अपने लेखन में साहित्य की मदद लेकर कमाल कर सकते हैं। साहित्य अमरबेल है। साहित्य सिनेमा से गहरी विधा है और उसका प्रभाव ज्यादा लंबे समय तक रहता है। फिल्में शुक्रवार और सप्ताहांत के लिए होती हैं। साहित्य हमेशा के लिए होता है। 

     

    आप साहित्यकार भी हैं। अपनी किस रचना पर फिल्म बनाना चाहेंगे?

    मेरी कुछ कहानियां हैं ऐसी। कहानियां लिखने के अभ्यास से मुझे फिल्म लेखन में काफी मदद मिली है। सिनेमा का भी असर मेरे साहित्य पर है। वह ज्यादा दृश्यात्मक होता है। सिनेमा के अभ्यास के बाद मैं विवरणों से बच गया हूं। संवाद लेखन गरीबों का तार होता है।

     

    किसी दूसरे लेखक की किसी फिल्म का कोई सीन या संवाद जो आपको याद रह गया हो, या आप जिसका उल्लेख करना चाहें?

    वैसे ही दृश्य और संवाद तो मेरे लेखन की प्रेरणा हैं। उनके बारे में कैसे बता दूं? मैं पुराने लेखकों के बेहतरीन काम को देख कर के अपने लेखन का परिष्कार करता हूं। हमारे पाठ्यपुस्तक तो वही है।

     

    आपकी फिल्मों में गाने और इंटरवल पॉइंट कौन तय करता है?

    यह मिली-जुली सरकार होती है।

     

    ओटीटी पर आ रही फिल्मों में कोई इंटरवल नहीं होता है। क्या इससे लेखन आसान हुआ है?

    उससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। वैसे वह काम आसान कर देता है। हिंदी फिल्मों में चार अंक होते हैं। इंटरवल के पहले दो, इंटरवल के बाद दो।

     

    इन दिनों क्या लिख रहे हैं?

    दो वैब सीरीज लिख रहा हूं। एक सटायर फिल्म लिखी है ‘लव यू लोकतंत्र’। इसकी शूटिंग लगभग पूरी हो चुकी है। इसमें नए-पुराने चेहरे हैं। मैंने खुद के लिए एक सोशल थ्रिलर लिखी है। वह मुझे खुद बनाना है।

     

    किस भाषा में लिखते हैं?

    स्क्रिप्ट के संवाद हिंदी में होते हैं और विवरण अंग्रेजी में होता है।

     

    कौन सा सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करते हैं?

    मैं तो हाथ से लिखता हूं। मेरे सहायक उसे सॉफ्टवेयर में डाल देते हैं।

     

    फिल्म लेखन में जो आना चाहते हैं उन्हें क्या सलाह देंगे?

    फिल्म लेखन बहुत ही मुश्किल काम है। यह बहुत समय लेता है। यह साधना है। इसके साथ ही संपर्क और सहयोग भी चाहिए। लेखन में आने वाले मित्रों को हर प्रकार के आघात के लिए तैयार रहना चाहिए। अपमान और इंकार सहने की शक्ति होनी चाहिए। बहुत बार लिखने की और उसे परिवर्द्धित करने की शक्ति होनी चाहिए। कम पैसे में अन्याय और अपमान के साथ कई बार यह काम करना पड़ता है।

     

    क्या-क्या तैयारी करके आयें?

    पहले तो बहुत सारी फिल्में देखें। बहुत सारी पटकथाएं पढ़ें। फिल्म लेखन पर आई किताबें पढ़ें। हर तरह की फिल्में देखें। कोशिश करें कि रोज़ एक-दो फिल्म ज़रूर देख लें। फिल्मों में लेखन के साथ-साथ तकनीक और टेकिंग पर भी ध्यान दें। हो सके तो छह महीने साल भर किसी थिएटर के साथ जुड़ जाए। मुमकिन हो तो किसी निर्देशक के साथ कुछ समय सहायक के तौर पर काम करें। फिल्म की तकनीक और सेट की जानकारी हो जाने से आपको लेखन में सहूलियत होगी।

     

    और कुछ कहना चाहेंगे?

    अंत में स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन से आग्रह है कि वैबसाइट पर फिल्म लेखन से संबंधित और सामग्री होनी चाहिए। फिल्मों के उदाहरण होने चाहिए। कुछ फिल्मों की स्क्रिप्ट भी रहे। पुराने लेखकों से आर्काइवल बातचीत रखी जाए। नए लोगों के लिए निरंतर मार्गदर्शन का उपाय करना चाहिए। उसके लिए जरूरी ट्यूटोरियल होने चाहिए।

    अजय ब्रह्मात्मज जाने-माने फिल्म पत्रकार हैं। पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।