•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  16 November 2021
    •  600

    'रजनीगंधा' के बहाने मन्नू भंडारी का स्मरण

    साहित्य और सिनेमा के संबंधों की जटिलतायें

    साहित्य और सिनेमा के परस्पर संबंधों के अध्ययन और विमर्श में आमतौर पर साहित्यकार अपनी रचनाओं पर बनी फिल्मों से असंतुष्ट पाए जाते हैं। प्राय: यही कहा जाता है कि फिल्म रूपांतरण में उनकी रचना की आत्मा की हत्या हो गई। इस आम असंतुष्टि से अलग अनेक साहित्यकार यह मानकर चलते हैं कि सिनेमा और साहित्य अभिव्यक्ति के दो माध्यम हैं। दोनों में कहानी और किरदार होते हैं। साहित्यिक अभिव्यक्ति शब्दों पर निर्भर करती है, जबकि सिनेमाई अभिव्यक्ति दृश्य, श्रव्य, शब्द और अन्य कलाओं का उपयोग करती है। सिनेमा साहित्य के चरित्रों को माध्यम की विशेषताओं से गहराई और विस्तार देता है। यह निर्देशक की साहित्यिक समझ और संवेदना के साथ उसके रूपांतरण के कौशल पर निर्भर करता है। अनेक निर्देशक साहित्य के चरित्रों को हल्का और उल्टा कर देते हैं। कृति का परिप्रेक्ष्य ही बदल जाता है।

    हिंदी साहित्य और हिंदी सिनेमा का रिश्ता प्रेमचंद के समय से बना हुआ है। प्रेमचंद की अनेक कृतियों पर फिल्में बनी हैं, जिन्हें अलग-अलग निर्देशकों ने निर्देशित किया है। प्रेमचंद स्वयं अजंता मूवीटोन के निमंत्रण पर फिल्म लिखने के लिए मुंबई आए थे। उन्होंने ‘द मिल/ मजदूर’ के लिए अलग से कहानी लिखी थी। फिल्म की वैचारिकता से सचेत होकर तत्कालीन सेंसर बोर्ड ने फिल्म में परिवर्तन के सुझाव दिए थे। इन परिवर्तनों से प्रेमचंद नाखुश थे, क्योंकि फिल्म में लेखक का स्वर ही बदल गया था।

    प्रेमचंद, सुदर्शन, भगवतीचरण वर्मा, उपेंद्रनाथ अश्क, अमृतलाल नागर, फणीश्वरनाथ रेणु, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी, कमलेश्वर, राही मासूम रज़ा आदि साहित्यकारों की रचनाएं हिंदी की अनेक सफल और प्रयोगात्मक फिल्मों का आधार रहीं। इनमें से एक मन्नू भंडारी हैं। उनकी कहानियों और उपन्यासों पर तीन फ़ीचर फिल्में और अन्य कहानियों पर अनेक टेलीफिल्में बनी हैं।

    मन्नू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर आधारित बासु चटर्जी की फिल्म ‘रजनीगंधा’ हिंदी सिनेमा के इतिहास की एक महत्वपूर्ण फिल्म है। मुख्यधारा की कमर्शियल फिल्में और पैरेलल सिनेमा की आर्ट फिल्मों के बीच की ये फिल्में दर्शकों के मनोरंजन और निर्माताओं के व्यवसाय के लिहाज से उल्लेखनीय रही हैं। ‘रजनीगंधा’ के निर्देशक बासु चटर्जी का साहित्य से पुराना लगाव था। शैलेंद्र की मशहूर फिल्म ‘तीसरी कसम’ में वे निर्देशक बासु भट्टाचार्य के सहायक थे। बासु चटर्जी की फिल्म के लेखक फणीश्वरनाथ रेणु से खूब छनती थी। फणीश्वरनाथ रेणु ने धर्मयुग के लिए लिखे ‘तीसरी कसम के सेट पर तीन दिन’ लेख में उनका उल्लेख किया है। ऐसा लगता है कि अपने साहित्यिक रुझान की वजह से बासु चटर्जी हिंदी साहित्य और साहित्यकारों के संपर्क में रहे।

    बासु चटर्जी ने 1969 में राजेंद्र यादव के उपन्यास ‘सारा आकाश’ पर इसी नाम से फिल्म निर्देशित की थी। इस फिल्म में राकेश पांडे, मधु चक्रवर्ती, जलाल आगा, ए के हंगल और मणि कौल आदि ने मुख्य भूमिकायें निभाई थीं। बासु चटर्जी को उनकी पत्नी मन्नू भंडारी की रचनाएं भी पसंद थीं। उन्होंने मन्नू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया तो मन्नू भंडारी चौंकी थी। उनकी जिज्ञासा थी कि भला डायरी शैली में लिखी उनकी उनकी कहानी को फिल्म में कैसे रूपांतरित किया जा सकेगा? उनकी कहानी कानपुर में घटित होती है। बासु चटर्जी ने उन्हें आश्वस्त किया है कि आप यह चुनौती हमारे लिए छोड़ दें। आप केवल फिल्म बनाने की अनुमति दे दें। मन्नू भंडारी ने ‘सारा आकाश’ के रूपांतरण और फिल्मांकन को करीब से देखा था। वह बासु चटर्जी की साहित्यिक अभिरुचि और संवेदना से वाकिफ़ थी। उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दे दी।

    ‘यही सच है’ कहानी पढ़ चुके पाठकों ने जब ‘रजनीगंधा’ देखी तो उन्हें सुखद आश्चर्य हुआ कि एक संवेदनशील निर्देशक कहानी के कथ्य को बड़ी सफाई से पर्दे पर रूपांतरित कर सकता है। बासु चटर्जी ने मुख्य रूप से तीन परिवर्तन किए थे। तृषा गुप्ता ने अपने एक लेख में इनका ज़िक्र किया है। उन्होंने नायिका के चरित्र, असमंजस और फैसले में कोई छेड़छाड़ नहीं की। बासु चटर्जी ने एक किरदार का नाम बदला था। उन्होंने  निशिथ का नाम नवीन कर दिया था। कहानी की कथाभूमि कानपुर और कलकत्ता की है। उन्होंने इन्हें दिल्ली और मुंबई में तब्दील कर दिया था। इन दो के अलावा तीसरी तब्दीली संवाद में थी और यह तब्दीली रोचक है । ‘कवि जैसे लंबे बाल’ को ‘हिप्पी जैसे लंबे बाल’ कर दिया गया था। यही सच है कहानी में रजनीगंधा फूल का उल्लेख है। यह फूल नायिका को बहुत पसंद है और नायक उसे मुलाकात में रजनीगंधा का पुष्पगुच्छ भेंट किया करता है। योगेश ने फिल्म के शीर्षक को लेकर एक गीत में प्रेमिल भाव दिया है, जिसमें नायिका की चाहत और दुविधा भी जाहिर होती है। ‘रजनीगंधा फूल तुम्हारे’ गीत को ध्यान से सुनें।

    बासु चटर्जी के लिए यह फिल्म बनाना आसान नहीं था।

    उन्होंने पहले इस फिल्म के लिए शशि कपूर, शर्मिला टैगोर और अमिताभ बच्चन के बारे में सोचा था। यह योजना पूरी नहीं हुई तो उन्होंने बंगाल के कलाकारों अपर्णा सेन और सुमित भांजा के बारे में सोचा। अपर्णा सेन चाहती थीं कि साथ में कोई प्रसिद्ध कलाकार हो। वह कास्टिंग भी संभव नहीं हुई तो अमोल पालेकर विद्या सिन्हा और दिनेश ठाकुर चुने गए। अमोल पालेकर और दिनेश ठाकुर थिएटर की पृष्ठभूमि से आए थे, जबकि विद्या सिन्हा मॉडल थीं। अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा की यह पहली फिल्म थी। मुंबई में 20 दिनों का शेड्यूल 16 दिनों में ही पूरा कर लिया गया था। दिल्ली के 15 दिनों के शेड्यूल में थोड़ी अड़चन आ गई थी। फिल्म के निर्माता सुरेश जिंदल समय पर पर्याप्त पैसों का इंतजाम नहीं कर सके, इसलिए इस फिल्म के निर्माण और रिलीज़ में 2 साल का समय लग गया। 1974 में रिलीज़ होने के बाद रजनीगंधा दर्शकों द्वारा खूब पसंद की गई। इस फिल्म ने बीच के सिनेमा की संभावना की राह दिखाई। हिंदी फिल्मों में प्रचलित प्रेमत्रिकोण को ‘रजनीगंधा’ ने मध्यवर्गीय वास्तविक परिवेश दिया। कलाकार भी अभिनय और अभिव्यक्ति में सहज और वास्तविक थे।

    बासु चटर्जी ने ‘रजनीगंधा’ के बाद ‘स्वामी’ बनाते समय मन्नू भंडारी की मदद ली। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की कृति पर आधारित ‘स्वामी’ के संवाद मन्नू भंडारी ने लिखे थे। उन्होंने अपने उपन्यास ‘आपका बंटी’ पर फिल्म बनाने का अधिकार कला विकास मोशन पिक्चर्स को दिए थे। निर्माता धर्मेंद्र गोयल के लिए निर्देशक शिशिर मिश्रा ने ‘समय की धारा’ नाम की इस फिल्म में शत्रुघ्न सिन्हा और शबाना आजमी मुख्य कलाकार थे। इस फिल्म को देखने के बाद असंतुष्ट मन्नू भंडारी ने कोर्ट केस कर दिया था। वह अपने उपन्यास के फिल्मी रूपांतरण से असंतुष्ट थी। उनका मानना था कि उपन्यास के मूल भाव में बदलाव आ गया है, जो उन्हें मंजूर नहीं है। कोर्ट में लंबा मामला चला और फिर फैसला आया। इससे फिल्म के प्रदर्शन में देरी हुई।

    एक ही लेखक एक निर्देशक के फिल्मी रूपांतरण से संतुष्ट और खुश हुआ तो दूसरे निर्देशक के फिल्मी रूपांतरण  असंतुष्टि और नाखुशी जाहिर की। तात्पर्य यही है कि फिल्म निर्देशक साहित्यिक कृति के मूल भाव को कितनी संजीदगी से पटकथा में बदलता और उसका फिल्मांकन करता है। अगर उससे चूक होती है तो लेखक के असंतुष्टि प्रकट हो जाती है। बहुत कम लेखक साहित्यिक कृतियों की फिल्मी तब्दीली को लेकर प्रभावित नहीं होते। डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की ‘पिंजर’ और ‘मोहल्ला अस्सी’ के लेखकों अमृता प्रीतम और काशीनाथ सिंह ने उन्हें खुली छूट दी और उनके फिल्मी रूपांतरण से सहमति दिखाई।

    मन्नू भंडारी ने कभी अपने इंटरव्यू में कहा था कि आज के निर्देशक हिंदी साहित्य नहीं पढ़ते, इसलिए नए लेखकों की कृतियों पर निर्देशक फिल्में नहीं बना रहे हैं।

    उन्हें याद करते हुए इस लेख में सिनेमा और साहित्य के संबंधों की जटिलताओं पर भी विचार का मौका मिला।

    अजय ब्रह्मात्मज जाने-माने फिल्म पत्रकार हैं। पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।