•  आनंद मुखर्जी
    •  16 November 2021
    •  434

    हिंदी फ़िल्मों के कुछ गुमनाम स्टार राइटर

    पंडित मुखराम शर्मा, गुलशन नंदा, सचिन भौमिक और कादर ख़ान की याद में

    कहा जाता है कि हिंदी फ़िल्मों के लेखक को उतनी शोहरत नहीं मिलती जितनी मिलनी चाहिये। अक्सर पोस्टर से नाम ग़ायब रहता है, और प्रमोशन इवेंट में भी लेखक कम ही दिखायी पड़ते हैं। किसी फ़िल्म को फ़लाँ अभिनेता या निर्देशक की फ़िल्म के तौर पर ही देखा जाता है, लेखक का नाम अक्सर पीछे छूट जाता है। हालांकि अब बहुत से लेखकों के नाम लोग जानने लगे हैं और आशा की जा सकती है लेखन की विधा को और शोहरत मिलेगी। इस सबके पहले कुछ लेखक ऐसे भी हुये हैं जिन्हें अपने कैरियर के शिखर पर ‘स्टार’ का दर्जा मिला और जिनके नाम पर फ़िल्में बिक जाया करती थी। हिंदी फ़िल्मों की सबसे मशहूर राइटर जोड़ी सलीम-जावेद को सब जानते हैं, वे आज भी देश की बड़ी मशहूर हस्तियां हैं। लेकिन आज हम बात करते हैं कुछ दूसरे स्टार लेखकों की जिनसे शायद नयी पीढ़ी परिचित ना हो।

     

    हिन्दी सिनेमा का पहला स्टार राइटर: पंडित मुखराम शर्मा 

    उत्तर प्रदश के मेरठ शहर से मुंबई आए थे पंडित मुखराम शर्मा। मुंबई आने से पहले उन्होंने मेरठ में कुछ समय तक टीचर की नौकरी भी की थी। वहाँ वे संस्कृत पढ़ाते थे। बतौर निर्देशक यश चोपड़ा की पहली फिल्म ‘धूल का फूल’ पंडित जी ने लिखी थी, जो 1959 में रिलीज़ हुई थी। फिल्म में राजेन्द्र कुमार और माला सिन्हा की जोड़ी थी। राजेन्द्र कुमार से पहले यह फिल्म राजकुमार को ऑफ़र हुई थी लेकिन राजकुमार कहानी में परिवर्तन चाहते थे जिसके लिए लेखक राजी नहीं हुआ और ‘धूल का फूल’ राजेन्द्र कुमार को मिल गई। टिकट खिड़की पर ‘धूल का फूल’ सुपर हिट साबित हुई थी। 

    आगे चलकर पंडित जी ने यश चोपड़ा के लिए कई फिल्में लिखी। अशोक कुमार, सुनील दत्त और मीना कुमारी अभिनीत और पंडित मुखराम शर्मा लिखित ‘एक ही रास्ता’ भी सुपर हिट साबित हुई थी। बीआर फिल्म्स की ही एक हिट फिल्म ‘साधना’ के लिए पंडित मुखराम शर्मा को बेस्ट स्टोरी का फिल्मफेयर एवार्ड मिला था। ट्रॉफी के साथ पाँच हजार रुपये की नकद राशि भी मिली थी जो शर्मा जी ने एक कन्या विद्यालय को दान दे दिया था, चोपड़ा साहब और शर्मा जी जीवन के अंत तक दोस्त रहे। चोपड़ा साहब ने उन्हे भरपूर सम्मान और श्रेय भी दिया वे कहते थे पंडित मुखराम शर्मा हमारी सफलता के लेखक हैं।  

    शर्मा जी के लेखन की शुरुआत धार्मिक फिल्मों से हुई थी। 'हरिश्चंद्र', 'तारामती' और 'नल दमयन्ती' जैसी भारतीय सिनेमा की ऐतिहासिक शुरुआती फिल्मों के लेखक पंडित मुखराम शर्मा ही हैं। लेखन में सफलता मिलने के बाद शर्मा जी सामाजिक फिल्में लिखने लगे। एक दौर ऐसा भी था जब वितरक शर्मा जी के नाम से ही फिल्में खरीद लेते थे। कहा जाता है कि वितरक उन्हें फोन कर पूछते थे कि वे कौन सी फिल्म लिख रहे हैं या कौन सी फिल्म लिखाने वाले हैं। कई बार फ़िल्म के पोस्टर पर नाम तक भी लिखा गया ‘पंडित मुखराम शर्मा कृत’। पंडित मुखराम शर्मा जी के बाद ऐसी सफलता सलीम-जावेद की लेखकीय जोड़ी को मिली थी। इनके अलावा शायद ही और इनके अलावा शायद ही और किसी लेखक को ऐसी सफलता मिली है जिनके नाम से फिल्मे बिकती थी या चलती थी।

    शर्मा जी के लिखने का अंदाज़ भी दूसरे लेखकों से अलग था। पहले वे निर्देशक को कहानी सुनाते थे। कहानी पसंद आ गई तो पूरी स्क्रिप्ट लिखकर दे देते थे। बीच में कोई बातचीत नहीं। बाद में कोई बदलाव नहीं। किस्सा यूं है कि ‘साधना’ की कहानी पूरी लिख लेने के बाद पण्डित जी विमल रॉय को मिले। वे चाहते थे कि इस फिल्म का निर्देशन रॉय करें। विमल दा को कहानी पसंद भी आई लेकिन वे कहानी का अंत बदलना चाहते थे जिसके लिए शर्मा जी राजी नहीं हुए। आखिर बीआर चोपड़ा ने फिल्म का निर्माण और निर्देशन किया। यह फिल्म सुपर हिट साबित हुई।

    पंडित मुखराम शर्मा को कई पुरस्कार मिले। सन 1961 में तत्कालीन राष्ट्रपति के हाथों प्रतिष्ठित पुरस्कार संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी उन्हें मिला। लगभग 40 साल के अपने कैरियर में पंडित मुखराम शर्मा अपने समय के सबसे महंगे स्क्रिप्ट राइटर थे। उनकी कहानिया या मुद्दों पर आधारित होती थी। मिसाल के तौर पर उनकी लिखी फिल्म ‘एक ही रास्ता’ में विधवा विवाह की समस्या को उठाया गया था। आज के दौर मे किसी विधवा को पुनर्विवाह करने से शायद कोई ना रोके लेकिन जब एक ही रास्ता रिलीज हुई थी उन दिनों विधवा विवाह की बात करना भी ग़लत समझा जाता था। 29 मई 1909 को उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर मे पंडित मुखराम शर्मा का जन्म हुआ था। 25 अप्रैल 2000 को उनका निधन हुआ।

     

    साहित्य और सिनेमा दोनों के धुरंधर खिलाड़ी: गुलशन नंदा

    उपन्यास लेखन और फिल्म स्क्रिप्ट राइटिंग, दोनों के फॉर्मेट अलग है। शायद इसीलिए ऐसे कम ही लेखक हैं जो दोनों ही जगह सफल हुए हों। इनमें सबसे सफल नाम है गुलशन नंदा का। कहते हैं उनके घर के बाहर प्रकाशकों की कतार लगी रहती थी।लोकप्रिय साहित्य के इतिहास में उनका मुक़ाम इतना ऊंचा है कि हिंदी का कोई दूसरा लेखक उनके करीब भी नहीं पहुंच पाया है, ना शोहरत में, ना  बिक्री में। जितना गुलशन नंदा के उपन्यास लोकप्रिय हुए, उन पर बनी फिल्में भी उतनी ही सफल हुई। मिसाल के तौर पर ‘कटी पतंग’। फिल्म ‘खिलौना’, ‘काजल’ और ‘नील कमल’ भी गुलशन नंदा के उपन्यासों पर आधारित हैं लेकिन उपन्यास और फिल्म के नाम अलग-अलग हैं। जैसे फिल्म ‘खिलौना’ गुलशन नंदा के उपन्यास ‘पत्थर के होंठ’ पर आधारित है। यहां एक बात गौर करने लायक है कि ‘काजल’, ‘नील कमल’ और ‘कटी पतंग’ जैसी हिट फिल्मों के राइटर को मीडिया ने कभी वह सम्मान नहीं दिया जिसके वह हकदार थे। आखिर इसकी वजह क्या हो सकती है? उनके पाली हिल वाले घर में एक बार जब उनसे मुलाकात हुई थी तो यह सवाल मैंने उनसे पूछा था इस पर उन्होंने कहा कि वजह वह खुद भी नहीं जानते हैं कि मीडिया उनसे किस बात पर नाराज़ है।

    गुलशन नंदा का शुरुआती जीवन संघर्षमय रहा। उन्होंने जीवनयापन के लिए चश्मे की दुकान में नौकरी भी की। लिखने पढ़ने का शौक था। पहला उपन्यास उन्होंने ‘घाट का पत्थर’ लिखा था। गुलशन नंदा को उनके किसी दोस्त ने गुरुदत्त और विमल रॉय से मिलवाया था लेकिन वहाँ बात नहीं बनी। बात बनी एल वी प्रसाद के वहाँ जिन्हें उनके एक उपन्यास ‘पत्थर के होंठ’ की कहानी पसंद आई और उस उपन्यास की कहानी पर फिल्म ‘खिलौना’ बनी। निर्देशक यश चोपड़ा जब बीआर फ़िल्म्स से अलग होकर अपना अलग बैनर शुरू करने जा रहे थे तब उन्होंने अपनी फिल्म के राइटर के बतौर गुलशन नंदा का चुनाव किया था। और इस तरह यशराज बैनर की पहली फिल्म ‘दाग़’ गुलशन नंदा ने लिखी। यह फिल्म 1973 में रिलीज़ हुई थी।

    फिल्मों में उन्होंने बहुत नाम कमाया लेकिन उनकी एक आलोचना भी हुई कि वो मौलिक नहीं लिखते थे। यहां तक कहा गया कि उनके नॉवेलों पर हिंदी फ़िल्में बनने से पहले वे हिंदी फ़िल्में देखकर नॉवेल लिखते थे। उनकी कहानियों पर अंग्रेज़ी नॉवेलों का प्रभाव भी आलोचना के घेरे में रहा। मसलन उनकी सबसे कामयाब फिल्म ‘दाग़’ और थॉमस हार्डी के उपन्यास ‘द मेयर ऑफ़ कैस्टरब्रिज’ में समानतायें ढूँढ ली गयी। ‘कटी पतंग’ को विलियम आयरिश के नॉवेल ‘आई मैरिड ए डेड मैन’ से मिलता जुलता बताया गया। ‘जोशीला’ को जेम्स हेडले चेज़ के उपन्यास ‘वेरी ट्रांसग्रेसर’ की नकल कहा गया। बावजूद इस सबके, सच यही है कि एक दौर ऐसा रहा था जब किसी भी फिल्म को हिट कराने के दो टोटके इंडस्ट्री में बताये जाते थे: या तो राजेश खन्ना को हीरो ले लो, या गुलशन नंदा से कहानी लिखवा लो। दोनों साथ हो तो सोने पे सुहागा!

    गुलशन नंदा हिन्दी के अभी तक के इकलौते ऐसे उपन्यासकार हुए हैं जिनके उपन्यास की एक साथ तीन लाख तक प्रतियां प्रकाशित होती थी। कई सुपर हिट फिल्मों के कहानीकार और कई सुपरहिट फिल्मों के पटकथा लेखक गुलशन नंदा का जन्म 1929 को पंजाब के गुज़रांवाला में हुआ था। आजकल यह इलाका पाकिस्तान में आता है।सन 1985 में मुंबई में गुलशन नंदा का देहांत हुआ। केवल 56 साल की अल्पायु में उनका चले जाना साहित्य जगत के लिये बेहद दुखद था।

     

    सबसे ज़्यादा हिट हिन्दी फिल्मों के राइटर: सचिन भौमिक

    ‘आराधना’ से ‘क्रिश’ तक, सफल फिल्मों की लंबी लिस्ट है सचिन भौमिक लिखित फिल्मों की। एक आकलन ये है कि हिंदी सिनेमा को सबसे ज़्यादा हिट फिल्में देने वाला लेखक सचिन भौमिक ही हैं, सलीम-जावेद की जोड़ी से भी कहीं ज़्यादा।

    कोलकाता में 17 जुलाई 1930 को जन्मे सचिन भौमिक की शिक्षा कोलकाता में हुई। जब वे बीए कर रहे थे, तब ही उन्होंने बांग्ला पत्र पत्रिकाओं से लेखन की शुरुआत की। उनका पहला बांगला उपन्यास जल्द ही प्रकाशित हो गया। फिर दोस्तों की राय पर वे मुंबई आये और निर्देशकों और निर्माताओं से मिलने लगें। फिल्मों में सफल होने के बाद भी सचिन भौमिक ने बांग्ला पत्र पत्रिकाओं में लिखना जारी रखा था। 17 जुलाई 1930 को कलकत्ता में जन्मे सचिन भौमिक को पहली फिल्म ‘लाजवंती’ लिखने के लिए मिली थी। नरगिस दत्त की मुख्य भूमिका वाली यह फिल्म 1958 में रिलीज हुई थी। सुभाष घई की 'युवराज' उनकी आखिरी फ़िल्म रही, जिसमें वे सुभाष घई और विनोद पांडे के साथ सह लेखक थे। पाँच दशकों में सचिन भौमिक ने 100 से ज़्यादा फ़िल्मों की कहानियां लिखीं जबकि दो दर्जन से ज़्यादा फ़िल्मों के लिये वे सह-लेखक रहे।

    उनकी लिखी फिल्म ‘अनुराधा’ को 1960 में उस वर्ष की श्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। कांस फिल्म महोत्सव में ये फ़िल्म आमंत्रित की गयी। हालांकि ‘अनुराधा’ फ़िल्म को व्यावसायिक सफलता नहीं मिल पायी थी। इसे ऋषिकेश मुखर्जी ने निर्देशित किया था। ऋषिकेश मुखर्जी की सुपरहिट कॉमेडी फिल्म ‘गोलमाल’ की पटकथा भी सचिन भौमिक की लिखी हुई है। सचिन भौमिक ने राजेश खन्ना और शर्मिला टैगौर के साथ एक फिल्म ‘राजा रानी’ डॉयरेक्ट भी की, जो ज्यादा नहीं चली। वरना शायद सचिन भौमिक एक सफल लेखक के साथ साथ एक हिट डॉयरेक्टर भी कहलाते।

    सचिन भौमिक को फ़िल्में देखने का जुनून था। वे हर तरह की भारतीय और विदेशी फ़िल्में देखा करते थे। साथ ही, साहित्य में गहरी दिलचस्पी और ज़बरदस्त याददाश्त भी थी। किसी भी देखी हुई फिल्म के सीन उनकी स्मृति में छप जाया करते थें। कहानी लिखते हुए सामाजिक सारोकार की समझ और दर्शकों की पसंद नापसंद का वे ख़ास ख़याल रखते थे। इस सबके साथ ही कहानी सुनाने की उनकी कला, यानी उनका नरैशन भी बहुत ज़बरदस्त था, जिसके दम पर वे निर्माता निर्देशक पर अपनी धाक जमाये रखते थे। कह सकते हैं कि इन्हीं गुणों की बदौलत उनको फ़िल्म लेखन में आशातीत सफ़लता मिली। शुरु शुरु में वे हिंदी उतनी अच्छी नहीं जानते थे, एक बंगाली व्यक्ति होने के नाते। बाद में, मुंबई में हिंदीभाषी दोस्तों की मदद से उन्होंने हिंदी सीख ली। अपने सर्वश्रेष्ठ दौर में वे लकी स्क्रिप्ट राइटर माने जाते थे। उनकी कहानियों पर बहुत से फ़िल्मकारों ने अपनी पहली हिट फ़िल्में दीं। जैसे जे ओमप्रकाश के लिये उनकी पहली हिट फ़िल्म ‘आयी मिलन की बेला’। 

    वे लगातार सीखने, नये लेखकों से मिलने और नयेपन के अनुसार ख़ुद को ढ़ालने के लिये तैयार रहते थे। यही कारण था कि दौर बदलते रहे पर सचिन कभी भी फ़िल्म इंडस्ट्री में आउटडेटेड नहीं हुये। सातवें दशक में 'आन मिलो सजना' और 'आराधना' लिखने वाले लेखक ने आगे चलकर 'करण-अर्जुन', 'तू खिलाड़ी मैं अनाड़ी', 'सोल्जर' और 'कोई मिल गया' जैसी फ़िल्में भी लिख डालीं।  

    चाहे मीडिया और पब्लिक में उनका ज़िक्र ज़्यादा ना हुआ हो, पर फ़िल्मी लोगों के बीच ये ज़िक्र अक्सर होता है कि सचिन भौमिक को अपने सफ़ल राइटिंग कैरियर जितनी शोहरत नहीं मिल सकी। अपने लंबे कैरियर में उन्हें दो फ़िल्मों 1968 में 'ब्रह्मचारी' और 1969 में 'आराधना' के लिए बेस्ट स्टोरी राइटर का फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला। 12 अप्रैल 2011 को मुंबई में सचिन भौमिक का देहांत हो गया।

     

    पंचलाइन वाले डॉयलॉग के उस्ताद: कादर ख़ान

    फ़िल्म लेखन में सत्तर से नब्बे के दशक के बीच एक और शख़्स ग़ज़ब का काम करता रहा जिसका नाम है कादर खान। लेखक के साथ वे अभिनेता भी थे। कॉमेडी किरदार निभाने से लेकर विलेन बनने तक वे हर अंदाज़ में पर्दे पर नज़र आए। लेकिन वे जितना पर्दे के आगे सक्रिय रहे, उतना ही पर्दे के पीछे भी अपना हुनर दिखाते रहे। वे पटकथायें लिखते थे लेकिन माने जाते थे डायलॉग यानी संवाद लेखन के स्पेशलिस्ट।

    कादर खान ने कालेज में एक प्ले किया था जिससे दिलीप कुमार इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कादर खान को अपनी दो फिल्मों 'सगीना' और 'बैराग' के लिए साइन कर लिया। ये सत्तर के दशक के शुरुआत की बात है। इसके बाद कादर खान लंबे अरसे तक हिंदी फ़िल्मों में लगातार काम करते रहे। फिल्म 'रोटी' के लिए मनमोहन देसाई ने उन्हें संवाद लिखने के लिए 1,20,000 रुपये जैसी बड़ी रकम अदा की थी। 

    कहा जाता है कि अमिताभ बच्चन के सुपरस्टार बनने में कादर खान का बड़ा योगदान है। उनके लिखे डॉयलाग्स को जब अमिताभ पर्दे पर बोलते तो तालियों की गड़गड़ाहट से सिनमाहॉल गूंज जाता। एक ही उदाहरण से आप इसे समझ जायेंगे:  "विजय दीनानाथ चौहान, पूरा नाम। बाप का नाम, दीनानाथ चौहान। मां का नाम सुहासिनी चौहान। गांव मांडवा, उम्र 36 साल 9 महीना 8 दिन और ये सोलहवां घंटा चालू है।” साल 1990 में आई सुपरहिट फिल्म 'अग्निपथ' की इन यादगार लाइनों को अमिताभ बच्चन के बोलने से पहले कादर ख़ान काग़ज़ पर लिख चुके थे।

    कादर खान ने अमिताभ बच्चन की फिल्म 'नसीब’, ‘अग्निपथ’, ‘कुली’, 'लावारिस’, 'मुकद्दर का सिकंदर’ और ‘अमर अकबर एंथनी’ जैसी बड़ी हिट फिल्मों के संवाद लिखे। इनके अलावा, कादर खान ने 'हिम्मतवाला', 'कुली नं वन', 'मैं खिलाडी तू अनाड़ी', 'खून भरी मांग', 'कर्मा', 'सरफ़रोश' और 'धर्मवीर' जैसी सुपर हिट फ़िल्मों सहित 250 से ज़्यादा फिल्मों के संवाद लिखे हैं। जब वे अपने शिखर पर थे तब एक दौर ऐसा भी था जब कादर खान कई हीरो से ज्यादा लोकप्रिय थे और दर्शक पोस्टर पर उनका चेहरा देख टिकट खरीदते थे। कादर खान का नाम होना मनोरंजन और कॉमेडी की गारंटी माना जाता था। बाद के सालों में कुछ फ़िल्मों के लिये अश्लील और द्विअर्थी संवाद लिखने के लिये वे आलोचकों के निशाने पर भी रहे। 

    22 अक्टूबर 1937 को अफ़गानिस्तान के काबुल में जन्मे कादर खान ने मुंबई से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। 31 दिसंबर 2018 को कनाडा के टोरंटो मे कादर खान का निधन हो गया था। कादर खान को भारत के साथ कनाडा की नागरिकता हासिल थी। 2013 में, कादर खान को उनके फिल्मों में योगदान के लिए साहित्य शिरोमनी अवार्ड से नवाजा गया। उन्होंने 1982 और 1993 में बेस्ट डायलॉग के लिए फिल्मफेयर भी जीता।

    (सहयोग: दिनकर शर्मा)

    आनंद मुखर्जी स्तंभकार और पत्रकार रहे हैं। पहली लघुकथा टाइम्स ग्रुप की सारिका में सन 1979 में छपी। एक्सप्रेस ग्रुप से प्रकाशित मशहूर फिल्म साप्ताहिक स्क्रीन का हिन्दी संस्करण शुरू किया। एक्सप्रेस ग्रुप के बाद रिलायंस कम्यूनिकेशन के कंटेन्ट विभाग में लगभग 12 वर्ष तक कार्य किया। गीतों और गीतकारों में विशेष रुचि। संपर्क: anand.mukherjee07@gmail.com