•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  03 August 2021
    •  621

    लेखन वास्तव में पुनर्लेखन है।

    अजय ब्रह्मात्मज के सवाल, लेखकों के जवाब: रजत अरोड़ा

    रजत अरोड़ा अपने संवादों के लिए मशहूर हैं। ‘द डर्टी पिक्चर’,’वंस अपऑन अ टाइम इन मुंबई’ आदि फ़िल्मों से ख़ास मुकाम हासिल कर चुके रजत अरोड़ा ने रोहन सिप्पी की फ़िल्म ‘ब्लफ़ मास्टर’ से फ़िल्म लेखन की शुरुआत की।  इसके पहले टीवी के लिए वह ‘सीआईडी’ और ‘आहट’ जैसे शो में लेखन का पूरा अभ्यास कर चुके थे। उनके संवाद फ़िल्म ख़त्म होने के बाद भी याद रहते हैं और हिंदी सिनेमा की इस रोचक परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। फ़िलहाल रजत अरोड़ा दो-तीन फ़िल्मों पर काम कर रहे हैं।

      

    जन्म स्थान

    दिल्ली। दिल्ली में पला-बढ़ा और फिर मुंबई आ गया। जिंदगी के पहले 20 साल दिल्ली में गुजारे और और अब 20 साल मुंबई में हो गए।

     

    जन्मतिथि

    23 जुलाई 1975

     

    शिक्षा-दीक्षा

    स्नातक। एशियन एकेडमी ऑफ फ़िल्म एंड टेलीविजन से डिप्लोमा किया।।

     

    प्रशिक्षण और अभ्यास?

    लेखन का प्रशिक्षण तो कोई नहीं लिया, लेकिन अभ्यास अभी तक चल रहा है। हम लोग जब मुंबई आए थे उस समय तक स्क्रिप्ट राइटिंग की पढ़ाई नहीं होती थी। मुंबई आने के बाद मुझे धारावाहिकों के लिखने का काम मिल गया। लिखने के साथ ही मेरा प्रशिक्षण होता रहा।

     

    मुंबई कब पहुंचे?

    मैं 1996 में मुंबई आ गया था।

     

    कहानी लिखने का विचार कैसे आया और पहली कहानी कब लिखी थी?

    ऐसा लगता था कि मैं लिख सकता हूं। वहीं से लिखने का विचार आया। शुरू से ही फिल्मों का बहुत शौक रहा। मेरी अपनी पढ़ाई-लिखाई फिल्मों की ही रही। सलीम-जावेद और कादर खान का काम देख कर मज़ा आता था। मेरा ज़्यादा ध्यान लिखने पर ही था। कोई अभ्यास या प्रशिक्षण नहीं था। शौक था और लगता था कि यह एक चीज़ है, जो मैं कर सकता हूं। थोड़ा आत्मविश्वास था कि अगर काम मिला तो मैं ज़रूर कर लूंगा। मौके मिले और मैं आगे बढ़ता गया।

     

    आरंभिक दिनों में किस लेखक या रचनाकार ने प्रभावित किया? उनकी कोई कहानी या रचना, जिसने आप पर असर छोड़ा हो?

    बहुत सारे लोग हैं। किसी एक का नाम लेना हथेली में से सिर्फ एक उंगली का ज़िक्र करना होगा। छोटी कविता से लेकर बड़े उपन्यास तक समान रूप से प्रभाव डालते हैं। मैं कई बार कहता हूं कि हम लोग 120-130 पेज में फिल्म की स्क्रिप्ट लिखते हैं, लेकिन एक गीतकार सिर्फ दो पंक्तियों में फिल्म का सार बता देता है।

    ‘होनी को अनहोनी कर दे, अनहोनी को होनी,

    एक जगह जब जमा हो तीनों अमर अकबर एंथोनी’

    इन दो पंक्तियों  में ‘अमर अकबर एंथोनी’ की पूरी कहानी है कि नहीं?

    ‘हम बने तुम बने एक दूजे के लिए

    उसको कसम लगे जो मर कर एक पल भी जिए’ पूरी फ़िल्म का सार है।

     

    पहली फिल्म या नाटक या कोई शो जिसकी कहानी ने आपको बहुत सम्मोहित किया हो?

    ऐसा सम्मोहन ‘गाइड’ फिल्म के साथ हुआ। अभी भी मुझे ऐसा लगता है कि यह कहानी सातवें दशक में बनी कैसे? फिल्म देखने के बाद मैंने नॉवल पढ़ा था और दोनों ही बहुत ही बढ़िया हैं। दोनों में फर्क है लेकिन दोनों अपनी-अपनी विधा में श्रेष्ठ स्थान रखते हैं। ‘गाइड’ देखते हुए लगता है कि इसमें सब कुछ परफेक्ट है। ‘गाइड’ के गाने की प्लेलिस्ट सुन लो तो आपको पूरी फिल्म की कहानी पता चल जाएगी। ‘गाइड’ के बाद ‘शोले’। इस फिल्म ने बताया कि  सिनेमा कितना पावरफुल मीडियम है! ऐसी फिल्में मनोरंजन करने के साथ असर भी डालती हैं।

     

    आपका पहला लेखन जिस पर कोई फिल्म, टीवी शो या और कोई कार्यक्रम बना हो?

    मेरा पहला लेखन ‘आहट’ के लिए था। उस धारावाहिक के मैं संवाद लिखता था। वहीं से मेरी शुरुआत हुई। उसके बाद ‘सीआईडी’। इन दोनों के साथ मैंने लिखना शुरू किया। ‘रिश्ते’ नाम से एक शो  आता था, उसके लिए भी लिखा मैंने। मैंने लंबे समय तक ‘सीआईडी’ की राइटिंग की। उसके लेखन में बीपी सिंह के गाइडेंस में बहुत कुछ सीखा। श्रीधर राघवन भी हमारे साथ थे।

     

    जिंदगी के कैसे अनुभवों से आपके किरदार बनते या प्रभावित होते हैं?

    ‘कोई भी किरदार ऐसा क्यों है’ और ‘ऐसी हरकत क्यों कर रहा है’ की खोज करने पर किरदार गढ़ा जाने लगता है। अगर कोई टैक्सी ड्राइवर अपनी पत्नी से झूठ बोलकर टैक्सी चला रहा है तो उसके किरदार में थोड़ी मायूसी और थोड़ा गुस्सा होगा। उसमें एक आक्रोश होगा कि मैं वह नहीं कर पा रहा हूं, जो मुझे करना है। उसके गुस्से को हम मनोरंजक तरीके से जब पर्दे पर ले आते हैं तो किरदार आकार लेने लगता है। उसी से किरदार का विकास होता है और उसी से संवाद भी मिलते हैं।  

     

    क्या आप अपने किरदारों की जीवनी लिखते हैं?

    बिल्कुल लिखते हैं। ईमानदारी की बात करूं तो पहले इतना नहीं होता था। पहले हम जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ाते थे, वैसे-वैसे हमारा किरदार खिलता जाता था। एक अंदाज़ा रहता था कि इस किरदार की यह जर्नी है। यहां से चलकर वहां तक पहुंचेगा और यह पूरा सफ़र हम कहानी के जरिए कहते थे। अब समय बदलने के साथ ऐसा लगता है कि किरदार की जीवनी लिख लें। उससे कहानी को मदद मिलती है। किरदार और कहानी जुड़े हुए हैं। दोनों एक-दूसरे के साथ ही आगे बढ़ते हैं।

     

    अपने किरदारों के साथ क्या आपका कोई इमोशनल रिश्ता बनता है?

    बहुत ज़्यादा। जैसे ‘द डर्टी पिक्चर’ में मुख्य किरदार की मौत का दृश्य। वह मैं तीन महीनों तक नहीं लिख पाया था। मैंने निर्देशक मिलन लूथरिया को भी कहा था कि आप फिल्म की शूटिंग चालू कर दो। मैं अभी नहीं लिख पा रहा हूं। बाद में लिखकर दे दूंगा। अभी मैं समझ नहीं पा रहा हूं। यह किरदार मेरे साथ इतने लंबे समय तक रहा है। मुझे ही ऐसा लग रहा था कि यह किरदार मरना नहीं चाहिए। फिर शूटिंग सिर पर आ गई तो लिखना पड़ा और तभी यह लाइन मिली ‘ज़िंदगी जब मायूस होती है, तभी महसूस होती है।’ मैंने इसी संवाद से सीन की शुरुआत की।

     

    क्या आपके किरदार कभी खुद बोलने भी लगते हैं?

    वे तो ख़ुद ही बोलते हैं। मैं तो उनकी तरह बात ही नहीं करता हूं। अभी मैंने कुछ पीरियड फिल्में लिखी। उनके संवादों की भाषा तो मैं बोलता ही नहीं हूं। वे सभी आठवें दशक के किरदार थे। हमें लगा कि भाषा में अगर बदलाव नहीं किया तो हमारी फिल्म भी बाकी गैंगस्टर फिल्मों की तरह लगेगी। दर्शकों को भी फ़िल्म की भाषा पसंद आई। किरदार तो खुद ही बोल रहे थे। मैं बस ज़रिया था।

     

    आप इस बात पर कितना ध्यान देते हैं कि फिल्म के किरदारों की भाषा अलग अलग होनी चाहिए?

    मैं इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं देता। मेरा मानना है कि फिल्मों की भाषा ऐसी होनी चाहिए जो दर्शकों की समझ में आए। हिंदी में फिल्म बनाते समय हमें इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि मेरे किरदार चाहे जहां से या जिस भी पृष्ठभूमि से आ रहे हों, वे ऐसी भाषा बोलें जो पूरे देश के दर्शक समझ सकें। अगर हम एक किसी इलाके की भाषा चुन लें तो वह बाकी दर्शकों के लिए ज़्यादती होगी। दर्शक डिक्शनरी लेकर फ़िल्म देखने नहीं जाते। मैं अपनी फिल्मों की भाषा ऐसी रखता हूं, जो सबकी समझ में आ सके। उसमें अपनी बात पूरी ईमानदारी से कहने की कोशिश रहती है।

     

    आप संवादों के लिए बहुत मशहूर हैं। संवाद लिखना कितना आसान या मुश्किल है आपके लिए?

    पहले बहुत आसान था। मशहूर होने के बाद बहुत मुश्किल हो गया। पहले किसी की कोई अपेक्षा नहीं थी। अभी सब लोग नाम देखकर उम्मीद रखते हैं। हर दृश्य में पंच बनाना मुश्किल काम होता है। हो जाए तो मज़ा आता है। अब मेरी जो छवि बन गई है या मुझसे जो उम्मीद रखी जाने लगी है उसे पूरा करने में मज़ा आता है।

     

    दिन के किस समय लिखना पसंद करते हैं? क्या घर में कोई ख़ास जगह है, जहां बैठकर आप लिखते हैं?

    कोई भी समय हो सकता है और कोई भी जगह हो सकती है। लिखने का मेरा कोई रूटीन नहीं है। लिखना दरअसल दिमाग में होता है। उसे कागज़ पर उतारना तो एक अलग काम है। सोच के लिए कोई निश्चित जगह नहीं होती है। कई बार तो रात के दो बजे अचानक किसी पंक्ति का ख्याल आता है तो लगता है कि इसे लिख लूं, कहीं सुबह तक भूल न जाऊं? लिखने की मानसिक प्रक्रिया चलती रहती है।अंतिम तारीख पास आते ही वह कागज़ पर उतरने लगता है।

     

    कभी फिल्म लिखने के लिए भी शहर छोड़ा है? क्या आप ने कहीं बाहर जाकर लिखने का काम किया है?

    बहुत बार किया है।अभी लॉकडाउन में तो हर कोई घर में ही बैठकर लिख रहा है। निस्संदेह बाहर जाकर लिखने में एक इत्मीनान रहता है। आप किसी से मिलने नहीं जाते और ना कोई आपसे मिलने आता है। बाहर जाकर मैंने लेखन किया है, लेकिन वह ज़रूरी शर्त नहीं है। स्क्रिप्ट लॉक हो जाने के बाद अगर निर्देशक के साथ कहीं बाहर जाकर दो-तीन दिनों तक स्क्रिप्ट को संवारने का काम हो तो वह बहुत अच्छा होता है।

     

    कभी राइटर्रस ब्लॉक से गुजरना पड़ा। अगर हां तो फिर क्या करते हैं आप?

    जब मेरा काम करने का मूड नहीं रहता है तो राइटर्स ब्लॉक हो जाता है। और जब लगता है कि बिना काम किए चलेगा नहीं तो ब्लॉक खत्म हो जाता है। जब महीने के बिल चुकाने पड़ते हैं, तब लगता है कि राइटर्स ब्लॉक हमारे लिए नहीं हो सकता। सचमुच कहीं अटक जाने पर कोई फिल्म देख लेते हैं, कोई टीवी शो देख लेते हैं या कोई किताब पढ़ लेते हैं। उस काम से ध्यान भटका कर फिर लौटने पर ब्लॉक खत्म हो जाता है।

     

    लेखकों के बारे में कौन सी धारणा बिल्कुल गलत है?

    लेखकों के बारे में यह धारणा बिल्कुल गलत है कि उन्हें अच्छी तरह ट्रीट नहीं किया जाता। मेरा मानना है कि यह बहुत ही घिसी-पिटी बात है और लोग इसे बढ़ा-चढ़ा कर बोलते-बताते हैं। ऐसी बातें कर के हम नए लेखकों का दिल छोटा कर देते हैं। नए लोगों को लगता है कि सब यहां पर चोर हैं। आपका आईडिया चुरा लेंगे। आपको अच्छी तरह ट्रीट नहीं करेंगे। वे इन बातों में यकीन करने लगते हैं। मेरे साथ तो अब तक ऐसा कभी कुछ नहीं हुआ। काम अच्छा करते हैं तो प्रशंसा होती है और ज़्यादा काम मिलता है। काम अच्छा नहीं हो पता है तो आगे काम नहीं मिलता है। निर्माता-निर्देशक यह सोचकर नहीं बैठे होते हैं कि बुलाओ लेखक को, उसके साथ बुरा ट्रीट किया जाए।

     

    लेखक होने का सबसे बड़ा फायदा क्या है?

    सबसे बड़ा फायदा यह है कि सुबह सात बजे नहीं उठना पड़ता। लेखक एक दुनिया बनाता है। इसकी वजह से लेखक फिल्म यूनिट के बाकी सदस्यों से दो कदम आगे रहता है। लेखक के दिमाग में जो चल रहा है, वह अभी तक दूसरों के दिमाग में नहीं आया है और वही पर्दे पर आने वाला है। यह संतुष्टि रहती है कि यह मेरी रची हुई दुनिया है। फिल्म चले या न चले यह बिल्कुल दीगर बात है।

     

    किसी फिल्म के कितने ड्राफ्ट तैयार करते हैं अमूमन?

    तीन-चार तो हो ही जाते हैं। लॉक स्क्रिप्ट और बाउंडेड स्क्रिप्ट को बहुत महत्व दिया जाता है, लेकिन मुझे लगता है कि ऐसा कुछ हो नहीं पाता है। फिल्म बनने तक सुधार जारी रहता है और काटना-जोड़ना चलता रहता है। ऐसा नहीं होता कि ताला मार कर रख दिया कि अब इस पर नहीं सोचना है। बेहतर आइडिया तो कभी भी आ सकता है।

     

    अपने राइटिंग कैरियर की अभी तक की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?

    आपने कहा कि मेरे संवाद बहुत पॉपुलर होते हैं। अपनी पहचान और जगह बना पाना बहुत बड़ी बात होती है। फिल्म इंडस्ट्री में घुसते समय कहां पता था कि मैं इतने बड़े-बड़े लोगों के साथ काम कर लूंगा। मुझे अपनी स्क्रिप्ट के लिए बड़े अभिनेता और बड़े निर्माता मिल जाएंगे। मेरी पहली फिल्म ही रमेश सिप्पी के साथ थी।

     

    संवाद लिखने का हुनर कैसे विकसित हुआ?

    मुझे एक ही ख्याल रहता है कि मेरे किरदार बोरिंग ना हो। और मैं जो बोल रहा हूं, वह पहले से सुना हुआ ना हो। इन दोनों वजह से मैं बहुत मेहनत करता हूं। नए तरीके से जो कहने की कोशिश करता हूं, वही बातें दर्शकों को अच्छी लग जाती है।

     

    संवादों के लिए मशहूर किन फिल्मों का नाम लेना चाहेंगे?

    सलीम जावेद की फिल्मों के संवाद। मुझे तो ऐसा लगता है कि वह अलग से संवाद लिखते ही नहीं थे। ‘अब तेरा क्या होगा कालिया?’ में ऐसी कौन सी बड़ी बात है? लेकिन वह सबको याद है। ‘गाइड’ के संवाद ‘दिन ढल जाए’ गीत के पहले जो संवाद आते हैं। राजकुमार संतोषी की फिल्मों में अच्छे संवाद होते हैं। राजकुमार हीरानी के अलग किस्म के संवाद हैं। पुराने समय में हृषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों के संवाद अलग किस्म के होते थे।

     

    संवाद शब्दों की कलाकारी है या इमोशन का खेल है या कलाकार की अदायगी?

    सबसे पहले इमोशन का खेल है। उसे  निखारते हैं शब्द और अदाकारी। इमोशन के साथ दर्शक जुड़ जाता है तो पूरी लाइन उसे समझ में आ जाती है। ‘आनंद’ फिल्म में जब वह कहता है कि ‘तुझे क्या आशीर्वाद दूं? मैं तो यह भी नहीं कर सकता कि तुम्हें मेरी उम्र लग जाए।’ इस संवाद में इमोशन है। हमें रोना आ जाता है।

     

    कई बार आपके लिखे दृश्य और संवादों को कलाकार या निर्देशक बदल देते हैं? क्या यह उचित है? आपका अनुभव?

    कोई यूं ही शगल के लिए नहीं बदलता। बदलाव इसलिए किया जाता है कि वह वर्क नहीं कर रहा होता है। हर व्यक्ति फिल्म के लिए ही काम कर रहा है तो कोई भी बदलाव वह फिल्म की अच्छाई के लिए ही बताता है। फिल्म लेखन टीमवर्क भी है। कई बार लगता है कि मेरी अच्छी लाइन कट गई, लेकिन कोई बात नहीं मैं उस लाइन का कहीं और इस्तेमाल कर लेता हूं। मेरे संवाद तो किसी ने नहीं बदले, बस कुछ दृश्यों में कभी-कभी तब्दीली करनी पड़ी है।

     

    लेखन को एकाकी प्रक्रिया कहते हैं। आपका अनुभव क्या कहता है?

    बहुत ज्यादा एकाकीपन है, क्योंकि हम अपनी ही सोच के साथ लड़ रहे होते हैं। लिखने के दरमियान हम और किसी से उसे शेयर भी नहीं कर सकते। दिमाग में अधपकी बात को बता पाना भी मुश्किल है। अकेलापन हो जाता है उसकी वजह से। इसे घरवाले या दोस्त भी नहीं समझ पाते।

     

    फिल्मों में आपके आदर्श लेखक कौन हैं?

    फिर वही एक बात हो जाएगी कि मैं किसी एक का नाम नहीं ले पाऊंगा। सब अपने-अपने विधा के माहिर रहे हैं। मैंने उन सभी से सीखा है।

     

    एक बहस चलती रहती है कि हमारी फिल्में साहित्य से कुछ नहीं लेती हैं। साहित्य सिनेमा के रिश्ते पर कुछ कहेंगे आप?

    बहुत सारी ऐसी फिल्में हैं, जो हमारे साहित्य पर बनी हैं। कई बार लेखक और निर्देशक सीधे नहीं लेते। हिंदी की कितनी सारी फिल्में रामायण और महाभारत से प्रभावित हैं। छठे सातवें दशक की फिल्में भी अब हमारे लिए साहित्य का हिस्सा हैं। आधुनिक दुनिया में सिनेमा भी साहित्य है।

     

    इन दिनों क्या लिख रहे हैं?

    मैं दो-तीन फिल्मों पर काम कर रहा हूं। वीनस की एक फिल्म है, जिसमें अहान शेट्टी काम कर रहे हैं। एक साजिद नाडियाडवाला के साथ और दूसरी एकता कपूर के साथ लिख रहा हूं।

     

    किस सॉफ्टवेयर पर लिखते हैं और लिखने के लिए किस भाषा का इस्तेमाल करते हैं?

    मैं कोई सॉफ्टवेयर इस्तेमाल नहीं करता। फाइनल ड्राफ्ट आज तक मेरी समझ में नहीं आया। लिखना ही एक सॉफ्टवेयर है। मैं रोमन हिंदी में लिखता हूं। अंग्रेज़ी भी होती है।

     

    ओटीटी के पॉपुलर होने के साथ फिल्म लेखन में भी कोई परिवर्तन आया है क्या?

    आया ही है। अब और ज़्यादा, और बेहतर काम करना पड़ेगा।

     

    लॉकडाउन का क्या सबक रहा आपके लिए?

    आप कहीं भी लिख सकते हैं। लिखने में व्यस्त रहने की वजह से ग़लत ख्याल नहीं आए। दिमाग उलझा रहे तो डर कम लगता है। काम करने का अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा था।

     

    आपकी टेबल पर कौन सी किताबें हमेशा रहती हैं?

    कविताओं और शायरी की किताबें रहती है। फ़िल्म लेखन की किताबें होती हैं। पल्प फ़िक्शन बहुत पढ़ता हूँ।

     

    फिल्म लेखन में जो आना चाहते हैं, उन्हें क्या सलाह देंगे?

    फिल्में देखें, साहित्य पढ़ें और यह दोनों ही काम ज़्यादा से ज़्यादा करें। हिंदी की पुरानी फिल्में देखें और अपनी परंपरा से परिचित हों। आखिरी बात कि लेखन वास्तव में पुनर्लेखन है। पहले ड्राफ्ट के समय का उत्साह आखिरी ड्राफ्ट तक रहना चाहिए।

     

    अजय ब्रह्मात्मज जाने-माने फिल्म पत्रकार हैं। पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।